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मर्सिये की विरासत और मीर अनीस का मज़ार

मीर बबर अली ‘अनीस’ ने 19वीं सदी में मर्सिया लिखना शुरू किया और मर्सिये को उर्दू साहित्य में वह स्थान दिला दिया जो ग़ज़ल और मसनवी को हासिल था

Meer Anees and his mazar
मीर अनीस की एक पुरानी फोटो और उनका मजार
अपडेटेड 7 मार्च , 2026

इस्लाम धर्म के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद को अपने नवासे हुसैन से बेहद मुहब्बत थी. हुसैन अपने नाना की गोदियों में बड़े दुलार और नाज़ से पले थे लेकिन नाना के बाद उनकी ज़िंदगी मुसीबतों में घिरती चली गई. यहां तक कि 680 ईस्वी में कर्बला (ईराक़) में हज़रत हुसैन को उनके 72 साथियों के साथ बेदर्दी और बेरहमी के साथ शहीद कर दिया गया.

उसी समय से अरबी फ़ारसी काव्य में इस दुःखद घटना के वर्णन की शुरुआत हुई जिसको मर्सिया अर्थात शोकगीत कहा गया. हिंदुस्तान में भी स्थानीय भाषाओं में मर्सिया लिखने की पुरानी परंपरा रही है. स्थानीय भाषाओं और यहां के रीति-रिवाजों का मर्सिये के निर्माण और इसकी उन्नति में खास योगदान है.

इसके फलस्वरूप मर्सिये का जो उर्दू में रूप निकल कर आया है वह अपने आप में एक अनोखा रूप है. और इसी रूप के प्रथम श्रेणी के सर्वप्रिय कवि मीर अनीस हैं.

19वीं सदी में मीर बबर अली ‘अनीस’ ने मर्सिया लिखना शुरू किया और मर्सिये को उर्दू साहित्य में वह स्थान दिला दिया जो ग़ज़ल और मसनवी को प्राप्त था. यह उर्दू साहित्य को मीर अनीस का महान योगदान है. मीर अनीस के इस योगदान को उर्दू के बाहर हिंदी साहित्य में भी सराहा गया. उदाहरण के लिए रामानुज लाल श्रीवास्तव ने 1970 में 'महाकवि अनीस' और उनका काव्य  नामक पुस्तक प्रकाशित की.

इस पुस्तक में रामानुज ने अनीस के विभिन्न मर्सियों से एक ऐसा मर्सिया सम्पादित किया कि जिसके पढ़ने से मीर अनीस की कविता शैली और कर्बला की दुःखद घटना से पाठक भलीभांति अवगत हो जाता है. इस के अतिरिक्त जबलपुर से प्रकाशित होने वाली प्रेमा  नामक मासिक पत्रिका के करुण-रसांक में महादेव प्रसाद जी श्रीवास्तव सामी  का एक विशेष लेख शामिल था जिसमें उन्होंने करुणा रस के उदाहरण के लिए मीर अनीस के मर्सिये के छंदों को प्रमुख स्थान दिया था.

उर्दू मर्सिये को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए मीर अनीस ने अपनी शायरी और अपने व्यक्तित्व दोनों को एक कर दिया था. शायद इसी का असर था कि उनकी हर बात में बड़ी नफ़ासत और रख-रखाव पैदा हो गया था. उनके खाने, कपड़े, टोपी, छड़ी और हुक़्क़े के तंबाकू का इंतेज़ाम बड़ी सावधानी और सतर्कता से किया जाता था. मीर अनीस के बारे में जो बयान मिलते हैं उनसे एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती है जो अत्यंत संवेदनशील और नाज़ुक मिज़ाज है.

मीर अनीस का जन्म फ़ैज़ाबाद में 1803 में हुआ था और क़रीब 40 साल की उम्र में वे लखनऊ आ गए थे. मीर अनीस का आख़िरी घर चौक इलाक़े में था. इस घर के पास एक बग़ीचा भी था, जिसे मीर अनीस ने ख़रीद कर अपने घर के लिए क़ब्रिस्तान में बदल दिया था. मीर अनीस की मृत्यु 1874 में हुई तो उन्हें इसी क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया.

मीर अनीस की मृत्यु के लगभग 34 वर्ष के बाद 1908 में अहसन लखनवी की वाक़ेयात-ए अनीस  प्रकाशित हुई. अहसन ने अनीस की क़ब्र की स्थिति पर खेद व्यक्त करते हुए लिखा: "इंक़लाब-ए ज़माना पुरानी यादगारों को मिटा रहा है. शायद कोई वक़्त आ जाए कि इन बुज़ुर्गों की क़ब्रों पर फ़ातेहा पढ़ने वाला न हो."

इस क़ब्रिस्तान की उस समय की एक तस्वीर मौजूद है जिसमें यह एक जीर्ण-शीर्ण इमारत है जिसमें चार दीवारों से घिरा एक कमरा है. इसकी छत भी पूरी नहीं बनी है और कोई दरवाज़ा भी नहीं है. इमारत के चारों ओर घास-फूस और झाड़ियां हैं. इस तस्वीर को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अहसन लखनवी की चिंता सही थी कि अनीस का मज़ार कुछ ही दिनों में ढह जाएगा और लोग भूल जाएंगे कि मीर अनीस यहीं दफ़न थे.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सय्यद मसूद हसन रिज़वी ‘अदीब’ (1893-1975) ने मीर अनीस के मज़ार के निर्माण के लिए अथक परिश्रम किया और सफ़ल हुए. सौभाग्यवश, मुझे मसूद हसन रिज़वी की निजी डायरियां मिल गईं. इन डायरियों में मीर अनीस के मज़ार के निर्माण के संबंध के विवरणों से ही मैंने यह रूदाद तैयार की है. अनीस के मज़ार के संबंध में ‘अदीब’ की डायरी में सबसे पहली तारीख़ 10 नवंबर 1933 है, जिसमें उन्होंने लिखा है: “मज़ार-ए अनीस के मुत्तालिक़ मश्वरा.”

इसके बाद 1958, 1960 और 1961 की डायरियों में नगर पालिका को नक़्शा प्रस्तुत करने और मरम्मत पर ख़र्च आदि का उल्लेख है. इंजीनियर ने मज़ार के निर्माण की लागत 40,000 रुपए आंकी थी. ज़ाहिर है, उस समय यह रक़म बहुत ज़्यादा थी. यही कारण है कि मीर अनीस का मज़ार बनाने में उन्हें 40 साल लग गए थे.

‘अदीब’ ने मीर अनीस के मज़ार के निर्माण की दिशा में कई क़दम उठाए थे, जैसे 1965 में मीर अनीस के घर पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया था, अख़बार में अपीलें प्रकाशित कीं, और एक छोटी सी पुस्तक शायर-ए आज़म अनीस  भी लिखी थी, जिसका उद्देश्य था कि इसकी बिक्री से प्राप्त धन का उपयोग मज़ार के निर्माण में किया जा सके.

मसूद हसन रिज़वी ‘अदीब’ के प्रयासों के परिणामस्वरूप कश्मीर सरकार ने इस कार्य के लिए 10,000 रुपए का दान दिया था. एक समय में सीमेंट राशन से मिलती थी इसलिए सीमेंट की अधिक बोरियां प्राप्त करना आसान काम नहीं था. ‘अदीब’ ने इस के लिए बहुत प्रयास किए और जिस दिन सीमेंट की बोरियां आईं वह दिन उनके लिए ईद जैसा था. लगभग 40 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद मीर अनीस के मज़ार का निर्माण कार्य पूरा हुआ. अब इस मक़बरे के ऊंचे, दोहरे और नाज़ुक दर वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं जो मीर अनीस की नफ़ासत के शायान-ए शान है.

1975 में मीर अनीस की 100वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य पर मर्सिये का एक शानदार कार्यक्रम आयोजित किया गया था. कार्यक्रम में मीर अनीस के परिवार के सदस्य भी उपस्थित थे जिनमें मीर मुहम्मद हादी साहब ‘लायक़’ का नाम विशेष है जिन्होंने मज़ार के निर्माण कार्य में ‘अदीब’ की बहुत मदद की थी. यह सभी के लिए ख़ुशी का दिन था लेकिन हादी साहब पूरे कार्यक्रम के दौरान रोते रहे क्योंकि ‘अदीब’ वहां मौजूद नहीं थे. ‘अदीब’ अपने घर "अदबिस्तान" में मृत्युशय्या पर ख़ामोश लेटे हुए थे. इस कार्यक्रम के कुछ ही महीने के बाद 29 नवम्बर 1975 को मसूद हसन रिज़वी ‘अदीब’ का देहांत हो गया.

मसूद हसन रिज़वी 'अदीब' की 40 साल की कोशिशों से मीर बबर अली 'अनीस' का यह शानदार मज़ार बन कर तैयार हुआ था. समय और परिस्थितियों के कारण मीर अनीस का मज़ार आज फिर से दुर्दशा को पहुंच गया है. इस मज़ार की मरम्मत करके अपने अतीत के वैभव के प्रति आदर व्यक्त करने की आवश्यकता है.

(प्रो. तिमसाल मसूद अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उर्दू के प्रोफ़ेसर हैं)

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