महाराष्ट्र के पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय के विशेषज्ञों को पुणे के पास मोरगांव स्थित मयूरेश्वर मंदिर में दो तांबे की पट्टियां (ताम्रपट) मिली हैं. यह खोज राज्य के इतिहास पर नई रोशनी डाल सकती है. यह मंदिर महाराष्ट्र के अष्टविनायकों, यानी भगवान गणपति के आठ प्रतिष्ठित तीर्थस्थलों में से एक है.
यह पहली बार है कि किसी अष्टविनायक मंदिर में कोई अभिलेख मिला है. इससे न केवल मंदिर की ऐतिहासिकता और प्राचीनता का पता लगाने में मदद मिल सकती है बल्कि भगवान गणपति की पूजा और गणपत्य संप्रदाय की प्राचीनता को समझने में भी सहायता मिल सकती है. गणपत्य संप्रदाय भगवान गणेश को सर्वोच्च मानता है.
पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय के सहायक निदेशक विलास वहाने ने बताया कि ये तांबे की पट्टियां मंदिर में चल रहे संरक्षण से जुड़े कामों के दौरान मिलीं. गर्भगृह में काम के दौरान संगमरमर, ग्रेनाइट और पीतल-तांबे से बने प्रभावल (प्रभामंडल या मेहराब) को हटाया गया जिन्हें बाद के समय में मंदिर में जोड़ा गया था.
प्रभावल हटाने पर पत्थर से बनी मूल मेहराब सामने आई. उसमें दो तांबे की पट्टियां जड़ी हुई थीं. वहाने ने बताया, "प्रारंभिक अध्ययन से पता चलता है कि इनमें से एक पट्टिका शक 1457 (1628 ईस्वी) की है और दूसरी 1632 (1710 ईस्वी) की. इनमें मंदिर के जीर्णोद्धार और उसके लिए दिए गए दान का उल्लेख है." इनमें पुणे के पास चिंचवड़ में रहने वाले और भगवान गणेश के भक्त रहे संत मोरया गोसावी के मंदिर का भी उल्लेख है.
माना जाता है कि मोरगांव का वर्तमान मंदिर पेशवा काल में बना होगा क्योंकि पुणे के पेशवा भगवान गणेश के भक्त थे. लेकिन इस खोज से मंदिर की तिथि को और पीछे, मराठा काल तक ले जाने में मदद मिल सकती है. पेशवा 1713 के बाद ही मराठा संघ के प्रमुखों के रूप में सत्ता में आए थे.
राज्य सरकार ने अष्टविनायक मंदिरों के संरक्षण और विकास के लिए 148 करोड़ रुपए की योजना शुरू की है. इसके तहत उन आठ में से सात मंदिरों को शामिल किया जाएगा जिनमें स्थापित भगवान गणेश की मूर्तियों को स्वयंभू माना जाता है. इनमें मयूरेश्वर मंदिर (मोरगांव, पुणे जिला), सिद्धिविनायक मंदिर (सिद्धटेक, अहिल्यानगर/पूर्व अहमदनगर जिला), बल्लालेश्वर मंदिर (पाली, रायगढ़ जिला), वरदविनायक मंदिर (महाड, रायगढ़ जिला), चिंतामणि मंदिर (थेऊर, पुणे जिला), गिरिजात्मज मंदिर (लेण्याद्री, पुणे जिला), विघ्नेश्वर मंदिर (ओझर, पुणे जिला) और महागणपति मंदिर (रांजणगांव, पुणे जिला) शामिल हैं.
इस विकास योजना पर काम जनवरी के आसपास शुरू हुआ था और इसके एक साल में पूरा होने की उम्मीद है. इसमें आठ में से सात मंदिर शामिल होंगे. लेण्याद्री का मंदिर इसमें शामिल नहीं है क्योंकि वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्थल है और पुणे से लगभग 100 किलोमीटर दूर एक गुफा में स्थित है. आमतौर पर सिद्धिविनायक यात्रा मोरगांव से शुरू होती है और अन्य मंदिरों का दर्शन करने के बाद फिर मोरगांव में ही समाप्त होती है. इससे बारामती के पास स्थित इस मंदिर के महत्व का पता चलता है.
वहाने ने कहा कि तांबे की इन पट्टियों को पढ़ने और समझने के लिए वे ASI से संपर्क करेंगे. इन पर देवनागरी और संस्कृत में लेख अंकित हैं.
निदेशालय कोल्हापुर स्थित श्री अंबाबाई/महालक्ष्मी मंदिर में भी संरक्षण कार्य कर रहा है. वहां एक योगिनी की मूर्ति के नीचे पत्थर के अभिलेख मिले हैं. ये अभिलेख देवनागरी और हले कन्नड़ (कन्नड़ भाषा का एक शास्त्रीय रूप) लिपि में हैं. 2023 में भी मंदिर में एक पत्थर का अभिलेख मिला था. अब तक कुल आठ अभिलेख मिले हैं. ये मंदिर के निर्माण काल, शाही संरक्षण और इतिहास पर नई जानकारी दे सकते हैं. इन्हें पढ़ने के लिए निदेशालय मैसूरु स्थित एपिग्राफिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया से संपर्क करेगा.
यह मंदिर देवी मां के प्रमुख ‘शक्ति पीठों’ में से एक माना जाता है. मुंबई से लगभग 370 किलोमीटर दूर स्थित कोल्हापुर का यह मंदिर शिलाहार काल (11वीं शताब्दी) का माना जाता है. कहा जाता है कि इसका निर्माण राजा गंडरादित्य के समय पूरा हुआ था.

