
हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो को देखकर मुमकिन है, आप भी परेशान हुए हों. इस वीडियो में रेलवे स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने जा रहा एक मजदूर कहता है, "अब लौटकर नहीं आऊंगा मेरे दोस्त." उस मजदूर की आवाज में ऐसी कसक थी कि वह अपने जैसे लाखों प्रवासी मजदूरों के दुखों का प्रतीक बन गया.
वह मजदूर दोबारा किसी को नहीं मिला, इसलिए यह बहुत साफ नहीं हुआ कि उसने ऐसा क्यों कहा? ऐसी क्या परिस्थिति थी, जिसके कारण उसे ऐसा कहना पड़ा? उस मजदूर से तो हमारी भी मुलाकात नहीं हुई, मगर जिस ट्रेन से वह चला था, उस ट्रेन के पटना पहुंचने पर उसके साथी मजदूरों ने जो बताया, उससे पूरी बात काफी हद तक समझ आ गई.
वह वीडियो 19 अप्रैल, 2026 का है, गुजरात के उधना जंक्शन का, जो सूरत का एक स्टेशन है. इस जंक्शन की तस्वीरें और वीडियो अक्सर मीडिया में वायरल होती हैं, खास तौर पर तब जब सूरत और आसपास के इलाके से प्रवासी मजदूरों का जत्था बड़ी संख्या में बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड की तरफ लौटता है.
एक तरह से यह स्टेशन 'प्रवासी मजदूरों का ट्रांजिट प्वाइंट' बन गया है. यहां से इन इलाकों के लिए पांच रेलगाड़ियां नियमित चलती हैं और कुछ खास मौकों पर स्पेशल ट्रेनें भी चलाई जाती हैं. फिर भी ऐसे मौके पर इस स्टेशन के बाहर लंबी-लंबी कतारें दिखती हैं, कई दफा दो-दो किलोमीटर लंबी. मजदूरों की कतारें आसपास के मोहल्ले तक पहुंच जाती हैं.

आपने अगर यह वायरल वीडियो देखा होगा तो आपने यह भी देखा होगा कि मजदूर बैरिकेड तोड़कर अंदर आ रहे थे और भगदड़ मची थी. इसी बीच वह युवक अपने ट्रॉली बैग के साथ आया था और उसने कहा था, "अब लौटकर नहीं आऊंगा मेरे दोस्त..." वह युवक उधना-हसनपुर स्पेशल ट्रेन पर सवार होने पहुंचा था. वह ट्रेन 19 अप्रैल को दिन में 11 बजे चली थी और उसके पटना के पाटलिपुत्र स्टेशन पहुंचने का वक्त अगले दिन दोपहर 2.15 बजे था. मगर वह ट्रेन रात के एक बजे पहुंची. उस वक्त तक कई मजदूर अलग-अलग स्टेशनों पर उतर चुके थे. जो बचे थे और आगे हाजीपुर, मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर जाने वाले थे, उनमें से ज्यादातर कुछ ही घंटे पहले खाली हुई सीटों पर निढाल पड़े थे.
उस ट्रेन में सवार राकेश ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, "हम लोग 24 घंटे पहले से लाइन में खड़े थे. स्टेशन पहुंचे तो फिर टिकट की कतार में खड़े हुए. वहां दो घंटे और खड़े होने पर जब हमारा नंबर आया तो हम लोगों को मना कर दिया गया. कहा गया कि यूपी और बिहार जाने वालों को टिकट नहीं दिया जा रहा है."
उनके साथ खड़े मौला शाह ने कहा, "सिर्फ लोकल लोगों को टिकट दिया जा रहा था, ऐसे में जो भारी भीड़ घर लौटने के लिए बेताब थी वह उग्र हो गई. उसने बैरिकेड तोड़ दिया. उसके बाद पुलिस ने लाठी चला दी." राकेश कहते हैं, "हम लोग तो बिना टिकट के यहां तक आए हैं. टिकट मिला ही नहीं."
यूपी-बिहार वालों को टिकट क्यों नहीं दिया जा रहा था, इसके जवाब में एक यात्री सुभान अली कहते हैं, "पहले से बहुत भीड़ थी. शायद रेलवे वालों को लगा होगा कि टिकट नहीं देंगे तो ट्रेन में भीड़ कम होगी. हम लोग लौटकर अगली तारीख को आएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं."
कोई तीज-त्योहार नहीं, फिर क्यों थी भीड़
इस ट्रेन से लौटे सरफराज आलम कहते हैं, "दोहरी दिक्कत थी. वजह एक ही थी, गैस की किल्लत." वे अपनी बात को विस्तार देते हैं, "देखिए, गैस सिलेंडर की परेशानी तो आप लोगों को पता ही है, हम लोग वहां ब्लैक में सिलेंडर लेकर खाना पकाते हैं. वह सिलेंडर जो पहले 15 से 16 सौ में मिल जाता था, अब पांच से छह हजार में मिलने लगा था. हम जिस फैक्टरी में काम करते हैं, वहां भी गैस की जरूरत होती है. हम लोग थैले की कच्ची सिलाई करने का काम करते हैं. उसमें जो कपड़े की प्रिंटिंग होती है, वह भी गैस से होती है. ऐसे में उस काम में भी दिक्कत होने लगी. काम धीमा होने लगा तो बैठकर क्या करते. हम लोग घर लौट रहे हैं."
उनके पास खड़े दीपक कुमार जो मुजफ्फरपुर के रहने वाले हैं, कहते हैं, "काम-धंधा कुछ था नहीं, तकरीबन एक महीने से बैठकर खा रहे थे. क्या करते, आप ही बताइए?"
उन लोगों से थोड़ी विस्तृत बात करने पर समझ आया कि पेट्रोलियम संकट ने सूरत और आसपास के उद्योगों पर भी असर डाला है, जिससे मजदूरों को काम मिलना कम हो गया है. ऐसे में जो मजदूर हर महीने 15-16 हजार रुपए कमा लेते थे, उनकी कमाई अब आठ से नौ हजार रह गई है. कुछ लोग तो चार से पांच हजार भी मुश्किल से कमा रहे हैं. इसके साथ सिलेंडर महंगा होने की वजह से उनके खाने-पीने का बजट भी गड़बड़ा रहा था. ऐसे में उन्होंने वापस लौटना जरूरी समझा.
किन उद्योगों में काम करने आते हैं बिहारी मजदूर
दरअसल सूरत और आसपास के इलाके में कई तरह के उद्योग संचालित होते हैं. इनमें टेक्सटाइल उद्योग सबसे बड़ा है, जिसमें पावरलूम चलाने, डाइंग करने और प्रिंटिंग करने का काम है. इसके अलावा वहां डायमंड कटिंग, कंस्ट्रक्शन और दूसरे छोटे उद्योग भी हैं. आईआईएम बेंगलुरु के एक अध्ययन के मुताबिक सूरत और आसपास के औद्योगिक परिसरों में तकरीबन 40 लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं. इनमें सबसे बड़ी संख्या बिहार के मजदूरों की है, इनकी संख्या सात लाख के करीब मानी जाती है.

इन सब मजदूरों के वहां पहुंचने और लौटने के लिए एक स्टेशन तय कर दिया गया है, उधना जंक्शन. वहां अक्सर भारी भीड़ और अव्यवस्था दिखती है. कई यात्री शिकायत करते हैं कि उस स्टेशन पर पीने के पानी और शौचालय तक की सुविधा नहीं होती.
ईरान युद्ध की वजह से जो पेट्रोलियम संकट खड़ा हुआ, उसकी वजह से गैस की दिक्कत भी हुई. इसका असर सूरत के टेक्सटाइल उद्योग पर खास तौर पर पड़ा. वहां आंशिक बंदी होने लगी, कई जगह हफ्ते में दो दिन तक काम बंद रहने लगा. कुछ फैक्टरी मालिकों ने खुद अपनी तरफ से मजदूरों को घर भेजना शुरू किया.
ज्यादातर मजदूरों के पास कोई स्थाई पता नहीं है, इसलिए वे गैस कनेक्शन नहीं ले पाते. ऐसे में वे ब्लैक में गैस सिलेंडर खरीदते हैं, जिसकी कीमत पांच से छह हजार हो गई है. जो मजदूर छोटे सिलेंडर पर खाना पकाते हैं, उन्हें गैस की लागत चार से पांच सौ रुपए प्रति किलो पड़ रही है. यह दोहरा संकट उन्हें घर वापस होने के लिए मजबूर कर रहा है.
रिपोर्ट्स बताती हैं कि उधना स्टेशन पर रोज 10 से 15 हजार प्रवासी मजदूर जुट रहे हैं. मगर ट्रेनों में इतने मजदूरों के बैठने की व्यवस्था नहीं है. कुछ स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं, मगर उनकी संख्या जरूरत के हिसाब से काफी कम है. ऐसे में वहां रोज अव्यवस्था और भगदड़ की स्थिति बन रही.
अपने घर समस्तीपुर लौट रहे शिवम कहते हैं, "एक तो काम का संकट, फिर खाने-पीने का संकट और फिर घर लौटने के लिए 24-24 घंटे लाइन में खड़ा रहना. इसके बाद कहां दिमाग कंट्रोल में रहता है. इतनी मेहनत करके स्टेशन पहुंचिए और वहां टिकट देने से मना कर दे, प्लेटफॉर्म पर जाने नहीं दे तो अच्छा-खासा आदमी बौखला जाता है. हम सब लोग बौखलाए थे. बिहारी मजदूर बाहर उपद्रव नहीं करता है, लेकिन करना पड़ा, बैरिकेड तोड़ना पड़ा. उसी फ्रस्ट्रेशन में वह मजदूर बोला होगा- अब लौटकर नहीं आऊंगा मेरे दोस्त."
ट्रेन पर सवार कई मजदूरों ने इस वायरल वीडियो को देखा है. मगर किसी को यह पता नहीं कि वह मजदूर उन्हीं के साथ सफर कर रहा था. कई लोगों ने पूछने पर यही बताया. एक मजदूर ने कहा, "होगा भी तो रास्ते में उतर गया होगा. प्रयागराज से ट्रेन खाली होने वाली थी."
तो क्या अब ये मजदूर लौटकर सूरत नहीं जाएंगे? वहां डाई और पेंटिंग का काम करने वाले मिंटू कुमार कहते हैं, "जाएंगे नहीं तो खाएंगे क्या? जाना तो पड़ेगा ही. हम कोरोना में भी लौटे थे तो यही सोचते थे कि लौटकर नहीं जाएंगे. लेकिन गए. जाना पड़ा."
मौला शाह कहते हैं, "यहां कौन सी ऐसी इंडस्ट्री है, जो इतने सारे मजदूरों को 15 हजार रुपया महीना देकर काम कराए. होती तो नहीं जाते. मगर है नहीं तो जाना ही पड़ेगा. सूरत नहीं जाएगा तो बेंगलुरु जाएगा, वहां से मन भर गया तो गुड़गांव जाएगा. कहीं न कहीं तो जाएगा ही बिहारी मजदूर."
इतनी ही देर में ट्रेन पाटलिपुत्र स्टेशन से चल पड़ती है. वे मजदूर जो 38-40 घंटे पहले परेशान और दुखी थे, अब मुस्कुराते हुए हाथ हिलाते नजर आते हैं. प्रवासी बिहारी मजदूरों की यही कहानी है.

