कई वर्षों से हमारा चेहरा फोन अनलॉक करने, तस्वीरों में पहचान करने और हमारी पहचान वेरिफाई करने का काम करता रहा है. अब कई कंपनियां दावा कर रही हैं कि वे इससे भी बड़ा काम कर सकती हैं. उनका कहना है कि चेहरे का स्कैन करके शरीर के अंदर क्या चल रहा है, इसका पता लगाया जा सकता है.
भारत में रेडक्लिफ लैब्स ने हाल ही में फेस स्कैन नाम का एक टूल लॉन्च किया है. इसमें यूजर को अपने चेहरे का एक छोटा-सा वीडियो रिकॉर्ड करना होता है. कुछ ही सेकंड में यह हार्ट रेट, तनाव के स्तर, सांस लेने के पैटर्न और हृदय संबंधी स्वास्थ्य से जुड़े वेलनेस इंडिकेटर के बारे में जानकारी देता है.
इसके पीछे का विज्ञान भविष्य की तकनीक जैसा लगता है लेकिन है काफी सरल. हर धड़कन के साथ त्वचा के नीचे रक्त प्रवाह में बहुत हल्के बदलाव होते हैं. इससे त्वचा के रंग और चेहरे की बेहद सूक्ष्म गतिविधियों में परिवर्तन आता है. इन्हें आंखों से नहीं देखा जा सकता लेकिन स्मार्टफोन कैमरे के जरिए AI आधारित सॉफ्टवेयर इन्हें पहचान सकता है. इन संकेतों का विश्लेषण करके यह सिस्टम शरीर से जुड़े कई ऐसे शारीरिक बदलावों का अनुमान लगाता है जिन्हें पारंपरिक रूप से अलग-अलग मेडिकल उपकरणों से मापा जाता है.
हालांकि स्वास्थ्य की निगरानी फेस स्कैन तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल का सिर्फ एक हिस्सा है. आज अगर आप किसी प्रीमियम डर्मेटोलॉजी क्लीनिक में जाएं तो इलाज शुरू होने से पहले आपको चेहरे की इमेजिंग मशीन के सामने बैठने के लिए कहा जा सकता है. VISIA जैसी प्रणालियां अलग-अलग रोशनी में चेहरे की तस्वीरें लेती हैं और झुर्रियां, त्वचा का रंग यानी पिगमेंटेशन रोमछिद्र यानी पोर्स, UV से हुआ नुकसान और स्किन की बनावट का विश्लेषण करती हैं.
इन नतीजों की मदद से डर्मेटोलॉजिस्ट इलाज को व्यक्ति के मुताबिक तय करते हैं और समय के साथ उसकी प्रगति पर नजर रखते हैं. यह तकनीक अब सेलिब्रिटी स्किनकेयर का भी अहम हिस्सा बन चुकी है. अभिनेता, मॉडल और इन्फ्लुएंसर्स का इलाज करने वाले कई एस्थेटिक क्लीनिक अब लेजर, केमिकल पील और एंटी-एजिंग प्रक्रियाओं की सलाह देने से पहले फेस इमेजिंग का इस्तेमाल करते हैं. जो तकनीक पहले सिर्फ विशेषज्ञ क्लीनिकों तक सीमित थी वह अब धीरे-धीरे आम वेलनेस सेवाओं का हिस्सा बनती जा रही है.
इस तकनीक के समर्थकों का मानना है कि इससे लोगों को बीमारी होने से पहले ही अपनी सेहत पर ध्यान देने की प्रेरणा मिल सकती है. खासकर उन देशों में जहां जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का पता अक्सर लक्षण दिखने के बाद ही चलता है. अगर किसी स्कैन में तनाव का स्तर ज्यादा या हृदय संबंधी स्वास्थ्य के खराब संकेत मिलते हैं तो व्यक्ति समय रहते डॉक्टर से सही जांच कराने का फैसला कर सकता है.
हालांकि इस तकनीक की कुछ महत्वपूर्ण सीमाएं भी हैं. चेहरे से स्वास्थ्य जांच करने वाले ज्यादातर स्कैन वेलनेस टूल हैं, डायग्नोस्टिक टेस्ट नहीं. ये डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या हृदय रोग की पुष्टि नहीं कर सकते. इनकी सटीकता रोशनी, कैमरे की गुणवत्ता, त्वचा के रंग, चेहरे की गतिविधियों और इस्तेमाल किए जा रहे एल्गोरिदम पर निर्भर करती है. विशेषज्ञों का कहना है कि इनके नतीजों को सिर्फ संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए, अंतिम मेडिकल नतीजे के रूप में नहीं.
निजता भी एक बड़ी चिंता है. चेहरे से जुड़ा डेटा बायोमेट्रिक डेटा होता है और अगर यह किसी गलत हाथ में पहुंच जाए तो पासवर्ड की तरह बदला नहीं जा सकता. जैसे-जैसे फेस स्कैनिंग तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे लोगों की सहमति, डेटा को सुरक्षित रखने, उसे साझा करने और उसकी दीर्घकालिक सुरक्षा को लेकर भी सवाल बढ़ रहे हैं.

