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छात्रों को गणित की तरह 'मेंटल हेल्थ' भी पढ़ाया जाना चाहिए!

'प्रोजेक्ट मनोबल' के तहत दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शुरू होगी मानसिक स्वास्थ्य की पढ़ाई ताकि छात्र अपनी भावनाओं को समझ सकें और जरूरत पड़ने पर दूसरों से मदद मांग सकें

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 30 जुलाई , 2026

दशकों से स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य (मेंटल हेल्थ) को ऐसी समस्या माना गया जिस पर तभी ध्यान दिया गया कोई छात्र एंग्जायटी, बुलिंग, किसी अपने को खोने का दुख या व्यवहार से जुड़ी समस्या का सामना कर रहा हो.

हालांकि, अब यह समस्या तेजी से बढ़ रही है जिसे देखते हुए शिक्षक और नीति-निर्माता एक अलग सवाल पर विचार कर रहे हैं कि अगर मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य या गणित की तरह पहले से पढ़ाया जाए तो क्या हो?

यही सोच दिल्ली सरकार के हालिया शुरू किए  'प्रोजेक्ट मनोबल' के केंद्र में है. इसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य की व्यवस्थित शिक्षा शुरू करना है. यह कार्यक्रम केवल संकट की स्थिति में काउंसलरों की मदद पर निर्भर रहने के बजाए छात्रों को अपनी भावनाओं को समझने, तनाव से निपटने और यह पहचानने का ज्ञान व कौशल देना है कि उन्हें या उनके साथियों को कब मदद की जरूरत है.

यह पहल दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बदलते नजरिए को भी दिखाती है.

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि स्कूलों को बच्चों में बचपन से ही भावनात्मक मजबूती विकसित करने में मदद करनी चाहिए. रिसर्च बताती हैं कि सामाजिक और भावनात्मक सीख (सोशल एंड इमोशनल लर्निंग) से जुड़े कार्यक्रम क्लास में बिहेवियर, पढ़ाई में प्रदर्शन और भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता बेहतर बनाते हैं. साथ ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए मदद लेने से जुड़ी झिझक भी कम होती है.

हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सिर्फ टाइम-टेबल में मानसिक स्वास्थ्य को एक विषय के रूप में शामिल कर देने भर से छात्र मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हो जाएंगे. कोलकाता के मनोवैज्ञानिक अभिरूप मुखर्जी कहते हैं, "अगर इसे सही तरीके से पढ़ाया जाए तो मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य की तरह पढ़ाया जाना चाहिए. एक जीवन कौशल के रूप में, न कि थेरेपी के रूप में."

मुखर्जी कहते हैं, "पाठ्यक्रम में भावनात्मक समझ, तनाव प्रबंधन, स्वस्थ रिश्ते, डिजिटल वेलबीइंग और जरूरत पड़ने पर मदद कब लेनी चाहिए जैसे विषय शामिल होने चाहिए. इन्हें उम्र के अनुसार और प्रमाण आधारित तरीके से पढ़ाया जाना चाहिए, न कि मानसिक बीमारियों के क्लीनिकल निदान के रूप में. सबसे जरूरी बात यह है कि इसके लिए ट्रेंड टीचर्स हों, जरूरत पड़ने पर छात्रों की एक्सपर्ट्स तक पहुंच की व्यवस्था हो. साथ ही, माता-पिता की भी भागीदारी हो ताकि जरूरत के समय छात्रों को सही सहायता मिल सके."

यह अंतर समझना जरूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य की शिक्षा का उद्देश्य मनोवैज्ञानिकों या काउंसलरों की जगह लेना नहीं है और न ही शिक्षकों से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे छात्रों की मानसिक बीमारी की पहचान करें. इसके बजाए क्लासरूम ऐसी जगह बने, जहां बच्चे रोजमर्रा के जरूरी कौशल सीखें. जैसे अपनी भावनाओं को समझना, विवाद सुलझाना, परीक्षा के तनाव से निपटना, ऑनलाइन दुनिया में गलत व्यवहार की पहचान करना. बच्चों को पता होना चाहिए कि समस्या गंभीर होने पर उन्हें कहां से मदद लेनी है.

विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें माता-पिता की भी अहम भूमिका है. बच्चे दिन का सिर्फ एक हिस्सा स्कूल में बिताते हैं. ऐसे में अगर घर पर इमोशनल हैल्थ से जुड़ी बातों को बढ़ावा नहीं मिलेगा तो इसका पूरा असर देखने को नहीं मिलेगा. परिवार में खुलकर बातचीत करना, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी झिझक कम करना और तनाव से स्वस्थ तरीके से निपटने की आदत अपनाना ऐसा माहौल बना सकता है, जहां बच्चे अपनी भावनाओं के बारे में खुलकर और बिना डर के बात कर सकें.

'प्रोजेक्ट मनोबल' की सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि इसकी शुरूआत की गई है, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षक इसे क्लास में कैसे पढ़ाते हैं. अगर इसे सही तरीके से लागू किया गया तो यह इमोशनल हैल्थ को भी पढ़ने-लिखने और गणित की तरह एक बुनियादी जीवन कौशल बना सकता है. 

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