
दिल्ली की 38 वर्षीय बैंकिंग पेशेवर रिद्धिमा रावत लंबे समय से मुहांसों से परेशान थीं लेकिन इनका इलाज उनके लिए उलझन भरा अनुभव बन गया. इंस्टाग्राम पर एक त्वचा रोग विशेषज्ञ (डर्मेटोलॉजिस्ट) ने ऐसी क्रीम लगाने की सलाह दी, जिसके बारे में दावा किया गया था कि कुछ ही हफ्तों में उसका असर दिखने लगेगा.
दूसरे डर्मेटोलॉजिस्ट ने जोर देकर कहा कि एक अलग फॉर्मूलेशन ज्यादा असरदार है, जबकि तीसरे ने उन्हीं इनग्रेडिएंट के इस्तेमाल से बचने की चेतावनी दी जिन्हें दूसरे विशेषज्ञ बढ़ावा दे रहे थे. हर वीडियो भरोसेमंद लगता था. इनमें मेडिकल के लिहाज से असरदार होने का हवाला दिया गया था और भ्रामक दावों के साथ इलाज से पहले और बाद की नाटकीय तस्वीरों के जरिए भरोसा दिलाया जा रहा था.
आखिरकार रावत ने देखी गई क्रीमों में से एक मंगवा ली लेकिन इससे उनकी त्वचा पर लालपन (redness) और जलन (irritation) और बढ़ गई. वे कहती हैं, “हर डॉक्टर अलग-अलग समाधान बेचता हुआ लग रहा था. मुझे लगा कि ब्यूटी इन्फ्लुएंसर्स की बात सुनने के बजाय काबिल डर्मेटोलॉजिस्ट की सलाह मानना ज्यादा सुरक्षित होगा.” इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह थी कि उनके लिए वास्तविक मेडिकल सलाह और सावधानीपूर्वक तैयार की गई बिक्री की पिच के बीच अंतर कर पाना मुश्किल था.
ऐसे अनुभव साफ करते हैं कि डॉक्टरों के विज्ञापनों और खुद के प्रचार पर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की ओर से लगाई गई नई पाबंदियां बेहद जरूरी हैं और सही समय पर उठाया गया कदम हैं. 6 अक्टूबर को जारी दिशा-निर्देशों के तहत डॉक्टरों और अस्पतालों को मरीजों को आकर्षित करने के लिए इलाज से जुड़े भ्रामक दावों, मरीजों के अनुभवों, सिफारिशों और इलाज में सफलता की प्रचार वाली कहानियों का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया है.
इनमें स्पॉन्सर्ड मटेरियल, इन्फ्लुएंसर्स के साथ मिलकर किया जाने वाला प्रचार, ऑनलाइन समीक्षाओं में हेरफेर और AI जेनरेटिड प्रमोशन भी शामिल हैं. डॉक्टर तथ्यात्मक चिकित्सा जानकारी साझा करना जारी रख सकते हैं लेकिन विज्ञापन को शिक्षा के रूप में पेश नहीं कर सकते.

यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र तेजी से उपभोक्ता बाजार जैसा होता जा रहा है. त्वचा में नाटकीय बदलाव और वजन घटाने के वादों से लेकर महंगी कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं तक, सोशल मीडिया इलाज बेचने का एक ताकतवर माध्यम बन गया है. कई अस्पताल समूह भी पेशेवर तरीके से तैयार किए गए वीडियो का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें आधुनिक सुविधाओं, सफल प्रक्रियाओं और मरीजों के अनुभवों को दिखाया जाता है.
इस तरह की जानकारी मरीजों को जागरूक कर सकती है लेकिन इससे अवास्तविक उम्मीदें भी पैदा हो सकती हैं. साथ ही लोग डॉक्टरी जरूरत के बजाय किसी इलाज की लोकप्रियता और उसके प्रचार को देखकर उसे चुनने के लिए प्रेरित हो सकते हैं.
AI ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है. इंटरनेट पर डॉक्टरों के AI जेनरेटेड अवतार, मरीजों की तरफ से फर्जी तारीफें और मेडिकल पेशेवरों की नकल करने वाले डीपफेक वीडियो सामने आए हैं जो अक्सर संदिग्ध और भ्रामक इलाजों को बढ़ावा देते हैं.
वास्तविक लगने वाली आवाजों, अस्पतालों के भरोसेमंद बैकग्राउंड और आधिकारिक लगने वाले अंदाज में दी गई जानकारी के कारण यह पहचानना मुश्किल हो सकता है कि ऐसा कंटेंट नकली है. पहले से ही किसी स्वास्थ्य समस्या को लेकर परेशान व्यक्ति के लिए किसी मेडिकल पेशेवर का प्रत्यक्ष समर्थन विशेष रूप से प्रभावशाली हो सकता है.
इसके नतीजे केवल अनावश्यक खर्च तक ही सीमित नहीं हैं. एक मरीज के लिए जो इलाज सही है, वह दूसरे को नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि जल्दी समाधान के रूप में विज्ञापन में दिखाई गई प्रक्रियाओं के ऐसे जोखिम हो सकते हैं जिन्हें प्रमोशनल वीडियो शायद ही कभी साफ-साफ बताते हैं. जब डॉक्टर बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों के जरिए लोगों का ध्यान खींचने की होड़ में लग जाते हैं तो मरीज लोकप्रियता को ही डॉक्टर की काबिलियत समझने की भूल कर सकते हैं. ऐसे में वे डॉक्टर की योग्यता, क्लिनिकल साक्ष्यों और व्यक्तिगत परामर्श के महत्व को नजरअंदाज कर सकते हैं.
हालांकि यहां एक अंतर को बनाए रखना जरूरी है. सोशल मीडिया डॉक्टरों को गलत जानकारी का खंडन करने, बीमारियों के बारे में समझाने और उन लोगों तक पहुंचने का मौका देता है. यह खासकर ऐसे लोगों के लिए उपयोगी है जिनकी पहुंच ऐसी सामग्री तक सीमित है. अस्पतालों के पास भी अपनी सेवाओं और विशेषज्ञता के बारे में बताने के जायज कारण हैं. इसका उद्देश्य व्यावसायिक हेरफेर (कमर्शियल मैनिपुलेशन) को रोकना होना चाहिए, न कि चिकित्सा पेशेवरों को चुप कराना या सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा को हतोत्साहित करना.
आखिरकार चिकित्सा का क्षेत्र किसी सामान्य उपभोक्ता व्यवसाय जैसा नहीं है. मरीजों के पास अक्सर मेडिकल दावों का खुद आकलन करने के लिए जरूरी जानकारी नहीं होती और उन्हें पेशेवर निर्णय (डॉक्टर की सलाह) पर भरोसा करना पड़ता है. यह असमानता डॉक्टरों पर मरीजों को आकर्षित करने से कहीं ज्यादा बड़ी जिम्मेदारियां डालती है. किसी मरीज की बीमारी, असुरक्षा या कमजोरी को आक्रामक मार्केटिंग का मौका कभी नहीं बनाया जाना चाहिए.

