
जब मुंबई की 62 वर्षीय रिटायर्ड बैंक मैनेजर संगीता मेहरा (बदला हुआ नाम) का HER2-पॉजिटिव ब्रेस्ट कैंसर का इलाज शुरू हुआ तो परिवार को ट्रास्टुजुमैब डेरक्सटेकन (ENHERTU) के बारे में बताया गया. यह कैंसर के इलाज के लिए बनाई गई दवा है. भारत में इसकी 100 मिलीग्राम की एक शीशी का अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) करीब 1.67 लाख रुपए था.
इस कीमत का इलाज के फैसले पर तुरंत असर पड़ा. मेहरा कहती हैं, "उस वक्त आप यह नहीं पूछते कि अस्पताल कितना मार्जिन कमा रहा है. आप यह पूछते हैं कि कितना लंबा इलाज चलेगा और क्या आप उसका खर्च उठा सकते हैं."
हालांकि मेहरा जैसे मरीजों के लिए दवा के पैकेट पर लिखी कीमत से अक्सर यह पता नहीं चलता कि यह कीमत तय कैसे हुई या इसमें उत्पादन लागत, वितरण और खुदरा मार्जिन का कितना हिस्सा है. पारदर्शिता की इस कमी पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अस्पतालों द्वारा कैंसर की दवाओं पर दस गुना तक कीमत बढ़ाने पर सवाल उठाया और इसे ‘कत्लेआम’ बताया. अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि करीब 2,700 रुपए में खुदरा विक्रेताओं को दी जाने वाली कैंसर की एक दवा अस्पताल मरीजों को 27,000 रुपए में दे रहे थे.

अदालत ने इस पर भी सवाल उठाया कि अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए अस्पताल की अपनी फार्मेसी से ही दवाएं खरीदना अनिवार्य किया जाता है. उसने केंद्र से यह जांचने को कहा कि क्या 16 फीसदी का एक समान मूल्य मार्जिन व्यापक स्तर पर लागू किया जा सकता है.
अदालत ने रोसुवास का भी उदाहरण दिया. यह कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली रोसुवास्टेटिन की एक ब्रांडेड दवा है. इसके जरिए बताया गया कि किसी दवा के मूल्य नियंत्रण के दायरे में होने या न होने से उसकी कीमत कैसे बदल सकती है. एक फॉर्मूलेशन की कीमत करीब 214-240 रुपये प्रति स्ट्रिप बताई गई, जबकि एस्पिरिन वाली दवा की कीमत करीब 70 रुपये थी. इस मामले में सुनवाई अभी जारी है और फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं आया है.
इन कीमतों में अंतर की एक वजह भारत में दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था भी है. देश की दवा मूल्य व्यवस्था दवाओं को शेड्यूल और नॉन-शेड्यूल कैटिगरी में बांटती है. राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) तय करता है.
हालांकि कई नॉन-शेड्यूल दवाओं के मामले में कंपनियों को शुरुआती MRP तय करने की काफी अधिक स्वतंत्रता होती है. बाद में हर साल कीमत बढ़ाने पर सीमा लागू होती है.
अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीजों के लिए इन नियामकीय अंतर का अक्सर कोई खास मतलब नहीं होता. नई दिल्ली की 43 वर्षीय स्कूल टीचर फरीदा खान सर्जरी के बाद हुई जटिलताओं के कारण कई दिनों तक आईसीयू में रहीं.
उनके परिवार ने एंटीबायोटिक, इंजेक्शन, सलाइन, इन्फ्यूजन का सामान और दूसरी जरूरी चीजें सीधे अस्पताल की फार्मेसी से खरीदीं. खान बताती हैं, "बाहर जाकर कीमतों की जांच करने का कोई सवाल ही नहीं था. आपको बताया जाता है कि क्या चाहिए और आप खरीद लेते हैं. जब हमने पूरा बिल देखा तभी पता चला कि छोटी-छोटी चीजों का खर्च मिलाकर कितना हो गया था."
अस्पतालों में इस तरह खरीदारी की मजबूरी इस बहस का अहम मुद्दा रही है. आईसीयू में भर्ती या कीमोथेरेपी करा रहा मरीज आमतौर पर कई फार्मेसी में कीमतों की तुलना नहीं कर सकता. सस्ता ब्रांड तलाशने के लिए इलाज भी टाला नहीं जा सकता.
ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (AIDAN) ने भी पहले ऐसी ही चिंताएं जताई थीं. यह जरूरी दवाओं की उपलब्धता और उनके सही इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGO) का एक स्वतंत्र नेटवर्क है.
पिछले महीने कैंसर की दवाओं की कीमतों पर जारी एक सार्वजनिक बयान में AIDAN ने कहा था कि सिर्फ व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय करने से भी कई कैंसर रोधी दवाएं मरीजों की पहुंच से बाहर रहेंगी. संगठन ने निजी अस्पतालों में दवाओं, इस्तेमाल होने वाली जरूरी चीजों और चिकित्सा उपकरणों पर लिए जाने वाले बड़े कमीशन की ओर भी ध्यान दिलाया.
उसका कहना था कि प्रभावी मूल्य नियमन के लिए जरूरी और जीवनरक्षक दवाओं की मूल कीमतों को नियंत्रित करना जरूरी है. सिर्फ बाद में जोड़े जाने वाले मार्जिन को सीमित करना पर्याप्त नहीं है.
हालांकि अस्पतालों का कहना है कि खरीद कीमत और MRP के बीच के अंतर को सीधे मुनाफा नहीं माना जा सकता. फार्मेसी के कर्मचारियों का वेतन, भंडारण, वितरण, कोल्ड चेन की जरूरतें और खराब होने से होने वाला नुकसान भी लागत में शामिल होता है.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है: जब मरीज गंभीर रूप से बीमार हो उसके पास अलग-अलग जगह कीमतों की तुलना करने का व्यावहारिक विकल्प न हो और अस्पताल के बिल में लिखी कीमत चुकाने के अलावा उसके पास बहुत कम विकल्प बचता हो तब दवाओं की कीमत कैसे तय की जानी चाहिए?

