scorecardresearch
डार्क मोड

अब बिना ओपन हार्ट सर्जरी के खुल रहा दिल का बंद रास्ता!

लखनऊ में KGMU के लारी कार्डियोलॉजी विभाग ने पहली बार लेजर एथरेक्टॉमी और डायमंड ड्रिल (रोटाब्लेशन) तकनीक के मेल से 100 प्रतिशत बंद और कैल्सीफाइड हृदय धमनी का सफल इलाज किया

कोटा में सर्जरी से हुआ श्रीलंकाई मरीज का सफल इलाज.(Photo: Representational)
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 9 जुलाई , 2026

मोहम्मद सैफ करीब 60 साल के हैं. पिछले कई महीनों से सीने में तेज दर्द और सांस फूलने की समस्या से जूझ रहे थे. जांच में पता चला कि उनके दिल तक खून पहुंचाने वाली प्रमुख धमनी पूरी तरह बंद हो चुकी है. समस्या सिर्फ ब्लॉकेज की नहीं थी, बल्कि धमनी के भीतर जमा कैल्शियम पत्थर की तरह सख्त हो चुका था. 

सामान्य एंजियोप्लास्टी की संभावना लगभग खत्म थी और बाईपास सर्जरी को ही विकल्प माना जा रहा था. उम्र और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण सर्जरी भी जोखिम भरी थी. इसी तरह 60 वर्षीय धर्मेंद्र मिश्रा भी गंभीर स्थिति में लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के लारी कार्डियोलॉजी विभाग पहुंचे. उनकी धमनी भी 100 प्रतिशत बंद थी और उसमें भारी मात्रा में कैल्शियम जमा था. दोनों मरीजों के सामने सवाल सिर्फ इलाज का नहीं, बल्कि जीवन बचाने का था.

ऐसे समय में लारी कार्डियोलॉजी विभाग की टीम ने प्रदेश में पहली बार अत्याधुनिक लेजर एथरेक्टॉमी और डायमंड ड्रिल (रोटाब्लेशन) तकनीक का संयुक्त इस्तेमाल करते हुए दोनों मरीजों की पूरी तरह बंद धमनी को बिना ओपन हार्ट सर्जरी के खोल दिया. इलाज सफल रहा और दोनों मरीज अब तेजी से स्वस्थ हो रहे हैं. यह उपलब्धि केवल दो मरीजों की जिंदगी बचाने तक सीमित नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश में हृदय रोग उपचार के क्षेत्र में एक नई शुरुआत मानी जा रही है. 

जब धमनी में कैल्शियम बन जाता है पत्थर, तब क्यों मुश्किल हो जाता है इलाज

दिल तक रक्त पहुंचाने वाली कोरोनरी धमनियों में वर्षों तक वसा और कैल्शियम जमा होने से धीरे-धीरे ब्लॉकेज बनती है. कई मरीजों में यह कैल्शियम इतना सख्त हो जाता है कि धमनी पत्थर जैसी कठोर हो जाती है. चिकित्सा विज्ञान में ऐसी स्थिति को कैल्सीफाइड कोरोनरी आर्टरी डिजीज कहा जाता है. यदि धमनी पूरी तरह बंद हो जाए तो इसे क्रॉनिक टोटल ऑक्लूजन (सीटीओ) कहा जाता है. 

यह मुश्किल सर्जरी करने वाली KGMU के डॉक्टरों की टीम
यह मुश्किल सर्जरी करने वाली KGMU के डॉक्टरों की टीम

ऐसे मामलों में सामान्य बैलून एंजियोप्लास्टी या स्टेंट डालना बेहद कठिन हो जाता है क्योंकि बैलून सख्त कैल्शियम को फैला नहीं पाता और स्टेंट भी ठीक से नहीं बैठता. फिर अधिकतर मरीजों को ओपन हार्ट बाईपास सर्जरी की सलाह दी जाती है. लारी कार्डियोलॉजी विभाग के वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट प्रो. गौरव चौधरी बताते हैं, “कैल्सीफाइड ब्लॉकेज इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक है. कई बार मरीजों को बाईपास सर्जरी से भी मना कर दिया जाता है क्योंकि उनका ऑपरेशन जोखिम भरा होता है. ऐसे मरीजों के लिए आधुनिक हाइब्रिड तकनीक उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है.” 

डॉ. चौधरी के अनुसार इस प्रक्रिया में सबसे पहले अत्याधुनिक लेजर तकनीक से ब्लॉकेज की ऊपरी परत को हटाया जाता है. इसके बाद डायमंड-कोटेड रोटाब्लेशन डिवाइस की मदद से सख्त कैल्शियम को बेहद बारीक कणों में बदल दिया जाता है. इसके बाद धमनी पर्याप्त लचीली हो जाती है और उसमें आसानी से बैलून तथा ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट लगाया जा सकता है. पूरी प्रक्रिया कैथ लैब में होती है और मरीज का सीना खोलने की जरूरत नहीं पड़ती. 

लेजर और डायमंड ड्रिल ने कैसे खोल दिया 100 प्रतिशत बंद रास्ता

नई तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें दो अत्याधुनिक प्रक्रियाओं का संयोजन किया गया है. पहले लेजर एथरेक्टॉमी और उसके बाद रोटाब्लेशन. लेजर एथरेक्टॉमी में विशेष प्रकार की ठंडी अल्ट्रावायलेट किरणों का उपयोग किया जाता है. ये किरणें कैल्शियम और कठोर प्लाक की ऊपरी सतह को नियंत्रित तरीके से हटाती हैं. इसके बाद रोटाब्लेशन की बारी आती है. 

लारी कार्डियोलॉजी विभाग के प्रो. अखिल शर्मा बताते हैं कि रोटाब्लेशन में हीरे की परत चढ़ा बेहद सूक्ष्म ड्रिलनुमा उपकरण धमनी के भीतर भेजा जाता है. यह हजारों चक्कर प्रति मिनट की गति से घूमता है और सख्त कैल्शियम को घिसकर पाउडर में बदल देता है. प्रो. अखिल शर्मा के अनुसार, "यह पाउडर इतना सूक्ष्म होता है कि हमारे खून की लाल रक्त कोशिकाओं से भी छोटा होता है. इसलिए यह सुरक्षित रूप से रक्त प्रवाह के साथ शरीर से निकल जाता है. जब लेजर और डायमंड ड्रिल मिलकर कैल्शियम की चट्टान को तोड़ देते हैं तो पहले पत्थर जैसी कठोर हो चुकी धमनी दोबारा लचीली हो जाती है. इसके बाद आसानी से बैलून फुलाकर ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट लगाया जाता है और दिल में रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है." 

पूरी प्रक्रिया कलाई या जांघ की नस में एक छोटे से छेद के जरिए की जाती है. मरीज को न तो सीना चीरना पड़ता है और न ही लंबे समय तक आईसीयू में रहना पड़ता है. यही वजह है कि दुनिया भर में यह तकनीक जटिल कैल्सीफाइड ब्लॉकेज के इलाज में तेजी से अपनाई जा रही है. 

कम खर्च, कम जोखिम और जल्दी रिकवरी, मरीजों के लिए बड़ी राहत

लारी कार्डियोलॉजी विभाग की यह उपलब्धि केवल तकनीकी सफलता नहीं है बल्कि इलाज को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है. विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक प्रो. शरद चंद्र बताते हैं कि कैल्सीफाइड ब्लॉकेज का उपचार इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी की सबसे जटिल प्रक्रियाओं में शामिल होता है. उत्तर प्रदेश में पहली बार इस तकनीक का सफल उपयोग होना चिकित्सा क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है. उनके अनुसार, इस प्रक्रिया के बाद मरीज को आमतौर पर केवल दो से तीन दिन अस्पताल में रहना पड़ता है और वह जल्द ही अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट सकता है. 

जहां ओपन हार्ट बाईपास सर्जरी के बाद कई सप्ताह या महीनों तक रिकवरी चलती है, वहीं इस तकनीक से मरीज अपेक्षाकृत बहुत जल्दी सामान्य जीवन में लौट आता है. प्रो. शरद चंद्र बताते हैं कि लारी कार्डियोलॉजी विभाग में अब तक करीब 50 मरीजों का इस आधुनिक तकनीक से निःशुल्क इलाज किया जा चुका है. नियमित व्यवस्था के तहत KGMU में इस प्रक्रिया पर लगभग एक लाख रुपए का खर्च आता है, जबकि देश के बड़े निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों में यही इलाज आठ से दस लाख रुपए तक में किया जाता है. इस लिहाज से सरकारी संस्थान में इतनी उन्नत तकनीक उपलब्ध होना आर्थिक रूप से भी बड़ी राहत है. 

इस पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने में विभागाध्यक्ष प्रो. ऋषि सेठ्ठी, प्रो. गौरव चौधरी, प्रो. शरद चंद्र, प्रो. अखिल शर्मा, डॉ. आयुष शुक्ला और डॉ. उमेश त्रिपाठी सहित पूरी इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और बढ़ती उम्र के कारण कैल्सीफाइड कोरोनरी ब्लॉकेज के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं. ऐसे में लेजर एथरेक्टॉमी और रोटाब्लेशन जैसी तकनीकों का सरकारी मेडिकल संस्थानों तक पहुंचना हृदय रोग उपचार में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. 

यह न केवल हाई रिस्क मरीजों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है, बल्कि उन लोगों के लिए भी राहत है जिन्हें अब तक बाईपास सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बताया जाता था. अब बिना सीना चिरे, केवल कैथ लैब में कुछ घंटों की प्रक्रिया के जरिए बंद हो चुकी धमनी को दोबारा खोला जा सकता है और मरीज को नई जिंदगी दी जा सकती है. 

ADVERTISEMENT
Advertisement