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डार्क मोड

ब्यूटी फिल्टर बढ़ा रहे युवाओं में नई तरह की बेचैनी

मनोवैज्ञानिक इसे 'फिल्टर डिस्मॉर्फिया' कहते हैं. एक एस्थेटिक विशेषज्ञ बताते हैं कि इससे मरीजों से होने वाली बातचीत पहले से ज्यादा मुश्किल हो गई है

सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 3 जुलाई , 2026

देशभर के कॉस्मेटिक क्लीनिकों में अब एक नई तरह के मरीज आ रहे हैं. ये अक्सर युवा होते हैं, अच्छी जानकारी रखते हैं और अपने फोन में स्क्रीनशॉट लेकर आते हैं. ये स्क्रीनशॉट किसी सेलिब्रिटी के नहीं बल्कि ब्यूटी फिल्टर लगाए हुए उनकी अपनी तस्वीरों के होते हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि अब कई लोग तेज जबड़े की बनावट, ज्यादा मुलायम त्वचा, भरे हुए होंठ या पतली नाक की मांग करते हैं. वजह यह है कि वे खुद को ऑनलाइन ऐसे ही देखने के आदी हो चुके हैं. मनोवैज्ञानिक इस स्थिति को 'फिल्टर डिस्मॉर्फिया' कहते हैं. इसमें एडिट की गई तस्वीरों को बार-बार देखने से व्यक्ति अपने असली चेहरे को लेकर गलत धारणा बनाने लगता है.

यह बदलाव दिखाता है कि सोशल मीडिया के दौर में सुंदरता के मानक कैसे बदल गए हैं. फिल्टर, AI आधारित एडिटिंग टूल और हाई-डेफिनिशन फ्रंट कैमरों ने बेदाग त्वचा और पूरी तरह संतुलित चेहरे की बनावट को सामान्य बना दिया है. इसके साथ ही लोग वीडियो कॉल पर घंटों अपना चेहरा देखते रहते हैं. ऐसे में चेहरे की छोटी-छोटी कमियां भी बड़ी खामियां लगने लगती हैं. इसका असर यह है कि अब मरीज क्लीनिक में यह पूछने नहीं आते कि क्या बेहतर किया जा सकता है. वे पहले से तय एक खास चेहरे की कल्पना लेकर आते हैं.

नई दिल्ली स्थित एस्थेटिक क्लीनिक डिवाइन एस्थेटिक्स के संस्थापक और निदेशक डॉ. अमित गुप्ता कहते हैं कि इससे मरीजों से बातचीत पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है. उनके मुताबिक, "जिम्मेदार प्लास्टिक सर्जरी सिर्फ प्रक्रिया करने तक सीमित नहीं है. मरीज को वास्तविकता समझाना भी उतना ही जरूरी है. हर बातचीत में इस बात पर ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए कि वास्तव में क्या हासिल किया जा सकता है."

गुप्ता आगे कहते हैं, "अक्सर मरीज ऐसी चीज चाहता है जो शरीर की बनावट के हिसाब से संभव ही नहीं होती. या फिर वह अपने ही फिल्टर वाले रूप के पीछे भाग रहा होता है जो वास्तव में मौजूद नहीं है. एक पेशेवर मूल्यों को बरतने वाले सर्जन को जरूरत पड़ने पर साफ इनकार करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए."

डॉक्टरों का कहना है कि कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं चेहरे की खूबसूरती जरूर बढ़ा सकती हैं. लेकिन वे डिजिटल तरीके से बदली गई तस्वीर जैसा चेहरा नहीं बना सकतीं. न ही वे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान से जुड़ी गहरी समस्याओं का समाधान कर सकती हैं. अब डॉक्टरों पर बड़े बदलाव दिखाने का दबाव भी बढ़ गया है. इसकी वजह यह है कि मरीज सोशल मीडिया पर नतीजों की तुलना करते हैं और तुरंत बेहतरीन परिणाम की उम्मीद रखते हैं.

विशेषज्ञों के मुताबिक, एक एस्थेटिक डॉक्टर की भूमिका सिर्फ तकनीकी कौशल तक सीमित नहीं होती. उसे यह भी पहचानना होता है कि कब मरीज की अपेक्षाएं अवास्तविक हो गई हैं. साथ ही उसे मरीज की वास्तविक चिंताओं और डिजिटल तरीके से बनाई गई सुंदरता की कल्पना के बीच फर्क समझाने में भी मदद करनी होती है.

भारत का एस्थेटिक उद्योग तेजी से बढ़ रहा है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जिम्मेदार कामकाज का असली पैमाना यह नहीं है कि कितनी प्रक्रियाएं की गईं. असली पैमाना उन प्रक्रियाओं से पहले होने वाली बातचीत की गुणवत्ता है. ऐसे दौर में जब फिल्टर कुछ सेकंड में चेहरा बदल सकते हैं, सबसे अहम बातचीत शायद वही होती है जिसमें डॉक्टर यह समझाता है कि चिकित्सा क्या कर सकती है और उतना ही महत्वपूर्ण यह भी कि वह क्या नहीं कर सकती.

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