चेन्नई की 32 वर्षीय सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल प्रिया रमन रोजाना मेट्रो से सफर करती हैं. जब उन्हें पता चला कि मेट्रो में जिन जगहों को यात्री छूते या जहां बैठते हैं, वहां एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जीन(ARGs) यानी ऐसे कीटाणु मिले हैं जिन पर दवाइयां असर नहीं करतीं तो वे हैरान रह गईं.
दफ्तर जाने वाले हजारों कर्मचारियों की तरह प्रिया भी अक्सर हैंडरेल, टिकट मशीन और स्टेशन के काउंटर छूती हैं. पहले वे इन चीजों को छूने पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थीं लेकिन हाल ही में एक वेब आर्टिकल पढ़ने के बाद से वे मेट्रो से सफर करने के बाद हाथों की सफाई को लेकर ज्यादा सतर्क हो गई हैं.
प्रिया कहती हैं, "आप उम्मीद करते हैं कि सार्वजनिक परिवहन के साधनों की नियमित रूप से सफाई होती होगी लेकिन आप यह नहीं सोचते कि एक ही जगह को सैकड़ों लोगों के छूने के बाद वहां क्या-क्या रह सकता है. अब मैं हाथ धोने को लेकर निश्चित रूप से ज्यादा सावधान रहूंगी."
IIT मद्रास की एक नई स्टडी में चेन्नई मेट्रो में सफर करने वाले यात्रियों के साथ मौजूद सूक्ष्म जीवों का पता चला है. इनमें बैक्टीरिया और एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस से जुड़े जेनेटिक मटेरियल भी शामिल है. इस स्टडी के नतीजों से भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक परिवहन में साफ-सफाई को लेकर सवाल उठे हैं. हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि इन सूक्ष्म जीवों का पता चलने का यह मतलब नहीं है कि यात्रियों को संक्रमण का खतरा है.
शोधकर्ताओं ने चेन्नई मेट्रो की ब्लू और ग्रीन लाइन की ट्रेनों और 12 स्टेशनों से कुल 96 सैंपल लिए. इनमें से 41 सैंपल में जेनेटिक मटीरियल इतनी मात्रा में मिला कि उनकी विस्तार से जांच की जा सके. जांच के दौरान एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जीन (ARGs) के 72 परिवारों की पहचान हुई. 80 फीसदी से ज्यादा सैंपल में कम से कम एक ऐसा जीन पाया गया.
ये ARGs बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक दवाओं से बचने में मदद कर सकते हैं, जिससे कुछ संक्रमणों का इलाज करना मुश्किल हो सकता है. इनमें रिफैमाइसिन के प्रति रेसिस्टेंस से जुड़े जेनेटिक मार्कर भी पाए गए. रिफामाइसिन एंटीबायोटिक दवाओं का एक समूह है, जिसमें रिफैम्पिसिन भी शामिल है जो टीबी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक अहम दवा है.
स्टडी में यह भी पाया गया कि टिकट बेचने वाली मशीनों पर ट्रेन के हैंडरेल के मुकाबले ज्यादा तरह के सूक्ष्म जीव मौजूद थे. करीब 30 तरह के सूक्ष्म जीव लगभग हर सैंपल में पाए गए. इनमें ऐसे बैक्टीरिया भी शामिल थे जो आमतौर पर इंसान की त्वचा, मिट्टी और पानी में मिलते हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में मिलने वाले ज्यादातर सूक्ष्म जीव नुकसान नहीं पहुंचाते. इनमें से कुछ हमारे शरीर में सामान्य रूप से भी मौजूद रहते हैं.
सबसे अहम बात यह है कि शोधकर्ताओं ने बैक्टीरिया के जीवित होने या संक्रमण फैलाने की क्षमता की जांच करने के बजाय उनके DNA का विश्लेषण किया. इसलिए इस स्टडी के नतीजों से यह साबित नहीं होता कि यात्री संक्रामक, दवा-प्रतिरोधी (ड्रग-रेसिस्टेंट) बैक्टीरिया के संपर्क में आ रहे हैं.
यह चिंता सिर्फ चेन्नई तक सीमित नहीं है. पिछले साल नवंबर में 'साइंस ऑफ द टोटल एनवायरमेंट' जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी में दिल्ली के रेलवे स्टेशनों की हवा में मौजूद सूक्ष्म जीवों की जांच की गई थी. इस स्टडी में स्यूडोमोनास और मोरेक्सेला जैसे बैक्टीरिया पाए गए. साथ ही, एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस और बीमारियां फैलाने की क्षमता से जुड़े जीन भी मिले.
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि सूक्ष्म जीवों की बनावट तापमान, हवा की गुणवत्ता और मौसम के साथ बदलती रहती है. चेन्नई की स्टडी में उन सतहों की जांच की गई, जिन्हें यात्री छूते हैं, जबकि दिल्ली की स्टडी में हवा में मौजूद सूक्ष्मजीवों को देखा गया. ये दोनों स्टडी बताती हैं कि रोजाना सफर के दौरान लोग अलग-अलग तरीकों से सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आ सकते हैं.
दोनों स्टडी के नतीजे इस सवाल को उठाते हैं कि भारत के व्यस्त सार्वजनिक परिवहन सिस्टम में सूक्ष्मजीवों से होने वाले संक्रमण की जांच कितनी बार की जानी चाहिए. नियमित सफाई से दिखाई देने वाली गंदगी तो हट सकती है, लेकिन इससे हर तरह के सूक्ष्मजीव खत्म हो जाएं यह जरूरी नहीं है. वहीं, हवा आने-जाने की बेहतर व्यवस्था से हवा में मौजूद सूक्ष्मजीवों की मात्रा पर असर पड़ सकता है. हालांकि दोनों में से किसी भी स्टडी में यह साबित नहीं हुआ कि यात्रियों को संक्रमण हो रहा है.
यात्रियों के लिए, खाने से पहले हाथ धोने जैसी बुनियादी सावधानियां उपयोगी बनी हुई हैं. परिवहन अधिकारियों के लिए ये स्टडी यह जांचने का मौका देती हैं कि क्या सफाई का शेड्यूल, वेंटिलेशन सिस्टम और स्वच्छता की निगरानी भारत के सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क का हर दिन इस्तेमाल करने वाले लोगों की बड़ी संख्या के हिसाब से पर्याप्त हैं?

