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अयोध्या पर योगी-अखिलेश का टकराव, क्या कहते हैं चुनावी आंकड़े?

योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव एक-दूसरे को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं, लेकिन चुनावी आंकड़े बताते हैं कि इस सीट पर BJP और सपा, दोनों के लिए मुकाबला आसान नहीं होगा

योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के लिए अयोध्या बड़ा चुनावी मुद्दा है
अपडेटेड 12 अक्टूबर , 2026

रामनगरी अयोध्या में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी (SP) अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच चुनावी चुनौती ने 2027 की सियासी जंग का तापमान बढ़ा दिया है. राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और बड़े विकास प्रोजेक्ट्स के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की हार ने उसके राजनीतिक दावों पर सवाल खड़े किए थे. 

अब दोनों नेताओं की बयानबाजी ने अयोध्या विधानसभा सीट को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है. सवाल है कि क्या BJP राम मंदिर और विकास के सहारे अपना दबदबा कायम रख पाएगी या सपा बदलते चुनावी समीकरणों के दम पर उसे चुनौती देगी?

अयोध्या में ताजा सियासी घमासान की शुरुआत अखिलेश यादव की चुनौती से हुई. सपा अध्यक्ष 8 अक्टूबर को अयोध्या सीट से पार्टी के घोषित प्रत्याशी और पूर्व विधायक तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय के पैतृक घर कृष्णापुर में आयोजित भागवत कथा में शामिल होने पहुंचे थे. 

यहां उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी. अखिलेश ने कहा कि पवन पांडेय को प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद BJP को उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं. अगर मुख्यमंत्री को अपने काम पर भरोसा है तो उन्हें खुद चुनाव लड़कर देखना चाहिए.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 अक्टूबर को बलरामपुर में पलटवार किया. उन्होंने अखिलेश को अयोध्या से चुनाव लड़ने का न्योता देते हुए कहा, "चलो एक बार किस्मत आज़मा लेते हैं. तय हो जाए. आप भी आइए, मैं भी आता हूं." हालांकि, योगी ने स्पष्ट किया कि अयोध्या उनके लिए आस्था का स्थान है और उनके दौरों का उद्देश्य शहर का समग्र विकास सुनिश्चित करना है, न कि चुनाव लड़ना. 

सपा ने पवन पांडेय को अयोध्या से उम्मीदवार बनाया है (फाइल फोटो)
सपा ने पवन पांडेय को अयोध्या से उम्मीदवार बनाया है (फाइल फोटो)

योगी फिलहाल गोरखपुर शहरी सीट से विधायक हैं. अखिलेश यादव 2022 में करहल से विधायक चुने गए थे लेकिन 2024 में कन्नौज लोकसभा सीट जीतने के बाद उन्होंने विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी थी. योगी ने यह तंज भी किया कि मुकाबला आमने-सामने होना चाहिए, राजनीतिक समर्थकों के जरिए नहीं. जानकारों के मुताबिक यह टिप्पणी पवन पांडेय के संदर्भ में थी. 

इस बयानबाजी के पीछे दोनों दलों की अलग-अलग रणनीति है. अखिलेश अयोध्या में BJP के विकास और चुनावी दावों को चुनौती देकर यह संदेश देना चाहते हैं कि राम मंदिर के बावजूद मुकाबला एकतरफा नहीं है. योगी ने जवाबी चुनौती देकर सपा अध्यक्ष को सीधे मैदान में उतरने को कहा है. फिलहाल यह जुबानी जंग है, दोनों नेताओं की औपचारिक उम्मीदवारी नहीं. लेकिन इससे अयोध्या का चुनावी महत्व और बढ़ गया है.

BJP की जीत का अंतर घटा

अयोध्या विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास BJP के मजबूत आधार और बदलते वोट प्रतिशत, दोनों की कहानी कहता है. वर्ष 1991 में राम जन्मभूमि आंदोलन के चरम पर BJP के लल्लू सिंह को 51.3 प्रतिशत वोट मिले थे. वे 30,400 मतों से जीते. दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1993 में हुए चुनाव में भी BJP ने सीट बरकरार रखी, लेकिन उसका वोट प्रतिशत घटकर 47.24 प्रतिशत और जीत का अंतर 9,238 वोट रह गया. 

उस चुनाव में पहली बार मैदान में उतरी सपा को लगभग 40 प्रतिशत वोट मिले थे. BJP ने 1996, 2002 और 2007 में भी सीट जीती लेकिन उसका वोट प्रतिशत क्रमशः 45.61, 38.72 और लगभग 37 प्रतिशत रहा. वर्ष 2012 में सपा ने उलटफेर किया. मायावती सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल के बीच पवन पांडेय ने BJP के लल्लू सिंह को 5,404 मतों से हराया. पांडेय को 28.74 प्रतिशत वोट मिले जबकि BJP का वोट प्रतिशत करीब 26 प्रतिशत रह गया. 

वर्ष 2017 में BJP ने वापसी की. वेद प्रकाश गुप्ता को 49.56 प्रतिशत वोट मिले और उन्होंने पवन पांडेय को 50,440 मतों से हराया. 2022 में गुप्ता फिर जीते लेकिन BJP की जीत का अंतर घटकर 19,990 वोट रह गया. BJP का वोट प्रतिशत लगभग 49 प्रतिशत रहा जबकि सपा का वोट शेयर बढ़कर 40.4 प्रतिशत पहुंच गया. पिछले चुनाव के मुकाबले सपा के वोट प्रतिशत में 14.39 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

 

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी को सपा ने बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है (फाइल फोटो)
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी को सपा ने बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है (फाइल फोटो)

इन आंकड़ों में 2027 की लड़ाई के संकेत छिपे हैं. BJP ने लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी पकड़ साबित की है लेकिन सपा ने भी अपना मताधार बढ़ाया है. अयोध्या में साकेत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य वी. एन. अरोड़ा बताते हैं, “BJP के लिए चुनौती पुराने समर्थन को बनाए रखने की होगी जबकि सपा को बढ़े हुए वोट शेयर को जीत में बदलना होगा. केवल वोट प्रतिशत बढ़ना जीत की गारंटी नहीं है लेकिन घटता जीत का अंतर BJP के लिए नजरअंदाज करने लायक भी नहीं है.”

जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे

अयोध्या में जातीय समीकरण चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. दलित मतदाताओं की बड़ी संख्या के साथ ब्राह्मण मतदाता भी अहम हैं. मुस्लिम और यादव समुदाय पारंपरिक रूप से सपा के समर्थक रहे हैं जबकि BJP को सवर्णों के साथ कुर्मी, निषाद, मौर्य और राजभर जैसे पिछड़े वर्गों से समर्थन मिलता रहा है. ऐसे में ब्राह्मण समुदाय से आने वाले पवन पांडेय को प्रत्याशी बनाकर सपा BJP के परंपरागत समर्थक वर्ग में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है. 

सपा उम्मीदवार राम मंदिर ट्रस्ट पर जमीन की खरीद में कथित अनियमितताओं और मंदिर के लिए मिले दान में कथित गड़बड़ियों को लेकर BJP पर निशाना साधते रहे हैं. सपा इन आरोपों के जरिए BJP के विकास और पारदर्शिता संबंधी दावों को चुनौती देना चाहती है. हालांकि ये पांडेय के राजनीतिक आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. उनकी उम्मीदवारी का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने समुदाय से आगे दूसरे वर्गों में कितना समर्थन जुटा पाते हैं. 

BJP के एक नेता ने माना कि मौजूदा सामाजिक समीकरणों के कारण अयोध्या में पार्टी के लिए चुनौती हो सकती है. उनके मुताबिक, यादव और मुस्लिम मतदाता पारंपरिक रूप से सपा के साथ हैं जबकि स्थानीय ब्राह्मण उम्मीदवार BJP के ब्राह्मण और अन्य सवर्ण मतदाताओं में सेंध लगा सकता है. उन्होंने दलित मतदाताओं को भी निर्णायक बताया. 

BJP अयोध्या के विकास को अपनी उपलब्धि बताती है
BJP अयोध्या के विकास को अपनी उपलब्धि बताती है

जातीय गणित के साथ स्थानीय समस्याएं भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकती हैं. फैजाबाद लोकसभा सीट हारने के बावजूद, BJP अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में 4,667 वोटों से आगे रही. सपा बाकी चार क्षेत्रों-  दरियाबाद, रुदौली, मिल्कीपुर और बीकापुर में भी आगे रही.  लोकसभा चुनाव में BJP की हार के बाद अधूरे ड्रेनेज कार्य, सड़कों और विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठे हैं. 

अधिकारियों के मुताबिक, ज्यादातर बड़ी परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं लेकिन कुछ काम जारी हैं. सपा इन्हीं मुद्दों के जरिए यह सवाल उठा रही है कि शहर के विकास के दावों का लाभ स्थानीय निवासियों तक कितना पहुंचा है. पवन पांडेय का आरोप है कि लोग BJP सरकार के कथित भ्रष्टाचार, बुनियादी सुविधाओं की कमी और नेताओं की वीआईपी संस्कृति से नाराज हैं. उन्होंने अधिकारियों और प्रॉपर्टी डीलरों पर आम लोगों के शोषण का आरोप भी लगाया है. इन आरोपों का चुनावी असर इस बात पर निर्भर करेगा कि स्थानीय मतदाता इन्हें कितना महत्व देते हैं और BJP इनका क्या जवाब देती है.

विकास के दावों की परीक्षा

अयोध्या में BJP की चुनावी रणनीति का प्रमुख आधार राम मंदिर और उससे जुड़ी विकास परियोजनाएं हैं. मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद सड़क, यातायात, सौंदर्यीकरण और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाया गया. BJP इन्हें सरकार की उपलब्धियों के रूप में पेश करती है. 

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर हार ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या राम मंदिर और विकास परियोजनाएं अपने आप चुनावी जीत सुनिश्चित कर सकती हैं. सपा के अवधेश प्रसाद ने फैजाबाद लोकसभा सीट पर BJP के लल्लू सिंह को हराया था. इसके बावजूद अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में BJP 4,667 वोटों से आगे रही. 

सपा ने लोकसभा क्षेत्र के बाकी चार विधानसभा क्षेत्रों दरियाबाद, रुदौली, मिल्कीपुर और बीकापुर में बढ़त हासिल की. यह अंतर बताता है कि फैजाबाद की हार को अयोध्या विधानसभा में BJP के आधार के पूरी तरह खिसकने का संकेत नहीं माना जा सकता. वहीं, विधानसभा क्षेत्र में बढ़त से यह भी साबित नहीं होता कि BJP 2027 में आसानी से जीत जाएगी. 

अयोध्या में BJP के वरिष्ठ नेता विकास मिश्र ने अखिलेश यादव की चुनौती खारिज करते हुए कहा कि सपा प्रमुख जानते हैं कि वे अयोध्या से नहीं जीत सकते. उन्होंने शहर में 50,000 करोड़ रुपए की परियोजनाओं और दीपोत्सव का उल्लेख करते हुए BJP की जीत का भरोसा जताया. उन्होंने अखिलेश को चुनौती दी कि यदि वे अयोध्या से चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं तो उम्मीदवारी घोषित करें, नहीं तो अपने बयान के लिए माफी मांगें. 

दूसरी ओर सपा नेताओं का दावा है कि लोकसभा चुनाव के नतीजे BJP के एकतरफा दबदबे को चुनौती देते हैं. पार्टी स्थानीय नेतृत्व, जातीय समीकरणों और नागरिक समस्याओं के सहारे विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है. लेकिन अवधेश प्रसाद की लोकसभा जीत अपने आप पवन पांडेय की जीत सुनिश्चित नहीं करती. विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार की स्वीकार्यता, मतदाताओं की प्राथमिकताएं और BJP के संगठन की ताकत अलग भूमिका निभाएंगे.

अयोध्या में बढ़ता सियासी तापमान फिलहाल बयानबाजी से आगे चुनावी रणनीति की जमीन तैयार कर रहा है. BJP के सामने विकास के दावों को स्थानीय अपेक्षाओं से जोड़ने और अपना मताधार बनाए रखने की चुनौती है. सपा को बढ़े वोट प्रतिशत और लोकसभा चुनाव की सफलता को विधानसभा में जीत में बदलना होगा. 

2027 में असली परीक्षा इस बात की होगी कि राम मंदिर का राजनीतिक प्रभाव, जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे किसके पक्ष में एक साथ आते हैं. यही तय करेगा कि अयोध्या BJP का मजबूत गढ़ बनी रहती है या सपा यहां एक नया चुनावी अध्याय लिखती है.

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