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मुस्लिम वोट की जंग में ओवैसी 'अछूत' क्यों?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी समाजवादी पार्टी को गठबंधन का प्रस्ताव देकर मुस्लिम वोट बैंक में एकजुटता की बात कर रहे हैं लेकिन विपक्ष अब भी उन्हें राजनीतिक साझेदार बनाने से परहेज कर रहा

असदुद्दीन ओवैसी और अखिलेश यादव ऊपर की राजनीति
असदुद्दीन औवेसी और अखिलेश यादव
अपडेटेड 29 जुलाई , 2026

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोट लंबे समय से सत्ता की चाबी माना जाता रहा है. 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इसी वोट बैंक के इर्द-गिर्द नई राजनीतिक हलचल तेज होती दिखाई दे रही है. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी लगातार पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों का दौरा कर रहे हैं.

बहराइच के मटेरा, सहारनपुर, नजीबाबाद और 25 जुलाई को मुरादाबाद में आयोजित उनकी जनसभाएं केवल संगठन विस्तार का अभियान भर नहीं हैं बल्कि समाजवादी पार्टी के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक को चुनौती देने की रणनीति का हिस्सा भी मानी जा रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि ओवैसी लगातार समाजवादी पार्टी और INDIA गठबंधन को चुनाव पूर्व गठबंधन का प्रस्ताव दे रहे हैं.

उनका कहना है कि यदि विपक्ष एकजुट हो जाए तो यूपी में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोका जा सकता है. इसके बावजूद समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सार्वजनिक तौर पर इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं. सवाल यह है कि आखिर विपक्ष ओवैसी को राजनीतिक सहयोगी बनाने से क्यों हिचक रहा है?

सपा के गढ़ में दस्तक, गठबंधन का खुला प्रस्ताव

25 जुलाई को मुरादाबाद की जनसभा में ओवैसी ने समाजवादी पार्टी पर सीधा हमला बोला. उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज ने कई बार सपा पर भरोसा किया लेकिन सत्ता परिवर्तन नहीं हो सका. उन्होंने कहा, "हम नहीं चाहते कि बीजेपी की सरकार बने. हम समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं लेकिन अखिलेश यादव समझौता नहीं करेंगे. चुनाव के बाद फिर रोना मत."

ओवैसी ने यह भी कहा कि सपा मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती है और चुनाव के समय विकल्प न होने की बात कहती है, जबकि अब विकल्प मौजूद है. AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली भी लगातार यही संदेश दे रहे हैं. उनका कहना है कि बिहार में भी उनकी पार्टी ने महागठबंधन से केवल पांच सीटों की मांग की थी लेकिन विपक्ष ने बात नहीं मानी. बाद में AIMIM ने पांच सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की.

शौकत अली कहते हैं, "हम बीजेपी विरोधी वोट नहीं बांटना चाहते. हम चाहते हैं कि विपक्ष समय रहते सीटों पर समझौता करे. अगर ऐसा नहीं होता तो वोटों के बंटवारे के लिए हमें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता." पार्टी अब बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने में जुटी है. जानकारी के मुताबिक AIMIM पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, बिजनौर, रामपुर, मुरादाबाद और पूर्वांचल के कुछ जिलों में संगठन विस्तार कर रही है तथा 2027 में लगभग 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी है.

विपक्ष की ओवैसी से दूरी क्यों?

समाजवादी पार्टी इस पूरे मुद्दे पर बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है. पार्टी ने ओवैसी का प्रस्ताव न स्वीकार किया है और न ही सीधे खारिज. सपा के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "लोकतंत्र में हर दल को चुनाव लड़ने का अधिकार है. लेकिन उत्तर प्रदेश के मतदाता जानते हैं कि कौन सी पार्टी पांच साल उनके बीच काम करती है और कौन केवल चुनाव के समय दिखाई देती है. चुनिंदा सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टियों को लोग अक्सर वोट बांटने वाली पार्टी के रूप में देखते हैं."

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी चिंता मुस्लिम वोट नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक गठबंधन है. लखनऊ में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, "यदि समाजवादी पार्टी AIMIM के साथ औपचारिक गठबंधन करती है तो बीजेपी को ध्रुवीकरण का बड़ा मुद्दा मिल जाएगा. बीजेपी इसे हिंदू बनाम मुस्लिम गठबंधन के रूप में प्रचारित करेगी, जिससे विपक्ष का व्यापक सामाजिक समीकरण प्रभावित हो सकता है."

प्रो. पांडेय का कहना है कि समाजवादी पार्टी को भरोसा है कि चुनाव के समय मुस्लिम मतदाता बीजेपी को हराने के लिए सबसे मजबूत विपक्षी दल के साथ ही जाएगा. उनके अनुसार, "सपा की रणनीति यह है कि मुस्लिम वोट अंततः उसके साथ ही आएगा. इसलिए वह AIMIM को राजनीतिक वैधता देने से बचती है."

राजनीतिक विश्लेषक और मेरठ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर विवेक नौटि‍याल के अनुसार गठबंधन न करने का एक कारण वैचारिक भी है. वे कहते हैं, "समाजवादी पार्टी खुद को समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का प्रतिनिधि मानती है जबकि AIMIM की राजनीति मुस्लिम प्रतिनिधित्व के सवाल पर अधिक केंद्रित दिखाई देती है. यही वैचारिक दूरी भी दोनों दलों के बीच अविश्वास बढ़ाती है."

'वोटकटवा' की छवि से बाहर निकलने की चुनौती

AIMIM की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती उसकी 'वोटकटवा पार्टी' वाली छवि है. वर्ष 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा. उसे लगभग 2.04 लाख वोट मिले और उसका वोट शेयर केवल 0.24 प्रतिशत रहा. पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी.

साल 2022 में AIMIM ने लगभग 94 से 97 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. उसका वोट शेयर बढ़कर करीब 0.49 प्रतिशत हो गया लेकिन सीटों का खाता फिर भी नहीं खुला. हालांकि चुनावी आंकड़े बताते हैं कि कई सीटों पर AIMIM उम्मीदवारों को मिले वोट जीत के अंतर से अधिक थे. कुर्सी, बिजनौर, नकुर और सुल्तानपुर जैसी सीटों पर AIMIM को मिले वोट बीजेपी और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों के बीच जीत के अंतर से ज्यादा थे.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन सीटों पर बीजेपी विरोधी वोटों के बंटवारे का लाभ बीजेपी को मिला. यही वजह है कि समाजवादी पार्टी AIMIM को चुनावी साझेदार बनाने से बचती रही है. हालांकि AIMIM इस धारणा को बदलने की कोशिश कर रही है. पार्टी का कहना है कि यदि विपक्ष समय रहते गठबंधन कर ले तो वोटों के बंटवारे का सवाल ही नहीं उठेगा.

प्रो. सुशील पांडेय कहते हैं, "ओवैसी की रणनीति दोहरी है. एक तरफ वे गठबंधन की पेशकश कर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाना चाहते हैं, दूसरी तरफ यदि गठबंधन नहीं होता तो मुस्लिम बहुल सीटों पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत भी दिखाना चाहते हैं."

2027 में मुस्लिम राजनीति का नया अध्याय?

उत्तर प्रदेश में लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और करीब 140 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं. इनमें से कई सीटों पर समाजवादी पार्टी का मजबूत आधार रहा है. यही वजह है कि AIMIM ने अपनी चुनावी रणनीति भी उन्हीं क्षेत्रों पर केंद्रित की है जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर, सहारनपुर, अमरोहा, बहराइच, बलरामपुर, आजमगढ़ और कानपुर जैसे जिलों में पार्टी लगातार सक्रियता बढ़ा रही है.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल जनसभाओं से चुनावी सफलता नहीं मिलती. उत्तर प्रदेश का चुनाव बूथ प्रबंधन, स्थानीय संगठन, जातीय समीकरण और क्षेत्रीय नेतृत्व पर भी निर्भर करता है.

यही वे क्षेत्र हैं जहां समाजवादी पार्टी अभी भी AIMIM से कहीं अधिक मजबूत दिखाई देती है. विवेक नौटि‍याल कहते हैं, "ओवैसी का प्रभाव भाषणों और मीडिया में जरूर दिखाई देता है, लेकिन उसे चुनावी सीटों में बदलना सबसे बड़ी चुनौती होगी. यदि AIMIM अपना संगठन मजबूत कर लेती है तो उसका असर सीट जीतने से अधिक चुनावी परिणामों को प्रभावित करने में दिख सकता है."

फिलहाल तस्वीर साफ है. ओवैसी विपक्ष को साथ आने का न्योता दे रहे हैं लेकिन विपक्ष अभी उन्हें अपने राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा बनाने को तैयार नहीं दिख रहा. समाजवादी पार्टी को भरोसा है कि मुस्लिम वोट अंततः उसके साथ रहेगा जबकि AIMIM का दावा है कि मुस्लिम समाज अब नया राजनीतिक विकल्प तलाश रहा है.

ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव केवल बीजेपी और विपक्ष के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं होगा. यह विपक्ष के भीतर मुस्लिम नेतृत्व, राजनीतिक स्वीकार्यता और प्रतिनिधित्व की भी परीक्षा होगी.

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