
धान की रोपाई पूरी हो चुकी थी. 16 जुलाई को बहराइच जिले के टिकुरी गांव में दोपहर का वक्त था. खेत से लौटने के बाद 12 वर्षीय सुनील सिंह अपने चाचा के साथ सरयू नदी के किनारे हाथ-पैर धोने गया. नदी सामान्य दिनों की तरह शांत दिख रही थी. किसी को अंदाजा नहीं था कि पानी के भीतर मौत घात लगाए बैठी है.
जैसे ही सुनील पानी के करीब पहुंचा, अचानक तेज हलचल हुई. कुछ ही सेकंड में एक विशाल मगरमच्छ ने उसका पैर दबोच लिया और उसे गहरे पानी में खींच ले गया. चाचा की चीखें, ग्रामीणों की दौड़ और नदी किनारे मची अफरा-तफरी बेबस साबित हुई. कई घंटे की तलाश के बाद बच्चे का शव बरामद हुआ. 18 जुलाई को घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और पूरे उत्तर प्रदेश में मानसून के साथ लौटे एक पुराने डर की चर्चा फिर शुरू हो गई.

सुनील की मौत कोई अकेली घटना नहीं है. उससे महज 11 दिन पहले बहराइच के मोहकमपुरवा गांव की 55 वर्षीय केतकी देवी एक पारिवारिक समारोह से लौटते समय लापता हो गई थीं. अगले दिन रामपुरवा के पास उनका शव एक मगरमच्छ के जबड़े में फंसा मिला. इससे पहले मई 2025 में सिलौटा गांव के रवि कश्यप भी मगरमच्छ के हमले में जान गंवा चुके थे. लगातार हुई इन घटनाओं ने साफ कर दिया है कि तराई में मगरमच्छ अब सिर्फ नदी का जीव नहीं रह गया है बल्कि ग्रामीणों के दैनिक जीवन का सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है.
मानसून के साथ क्यों बढ़ जाता है मगरमच्छों का आतंक?
उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में मानसून केवल बाढ़ ही नहीं लाता, बल्कि मगरमच्छों की गतिविधियां भी कई गुना बढ़ा देता है. बहराइच, लखीमपुर खीरी, श्रावस्ती, पीलीभीत, बलरामपुर और आसपास के जिलों में बहने वाली घाघरा, सरयू, शारदा, चौका, सुतिया और अन्य नदियां बरसात के दौरान उफान पर रहती हैं. नदी का पानी जब नालों, तालाबों और निचले इलाकों से जुड़ता है तो मगरमच्छ अपने प्राकृतिक ठिकानों से निकलकर नई जगहों तक पहुंच जाते हैं.
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह हर साल होने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इंसानों और मगरमच्छों के बीच दूरी लगातार कम हुई है. नदी किनारे खेती का विस्तार, आबादी का दबाव, पशुपालन, मछली पकड़ना और घरेलू जरूरतों के लिए नदी पर निर्भरता ने संघर्ष को और बढ़ा दिया है. उत्तर प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) सुनील चौधरी के मुताबिक हर मॉनसून में हमें मगरमच्छों की ज़्यादा हलचल की खबरें मिलती हैं और इस साल भी ऐसा ही है. चौधरी कहते हैं, “हमने पहले ही बचाव के उपाय कर लिए हैं. अभी हमारा मुख्य ध्यान उन नदियों के किनारों पर जाल लगाने पर है जहां मगरमच्छों का खतरा अधिक है और ग्रामीणों को लगातार सतर्क किया जा रहा है. स्टाफ या स्थानीय लोगों से मिलने वाली हर सूचना पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं." उनके मुताबिक विभाग संवेदनशील इलाकों में लगातार निगरानी कर रहा है ताकि किसी भी घटना को रोका जा सके.
बहराइच और लखीमपुर में मौत का सिलसिला
अगर केवल पिछले डेढ़ साल की घटनाओं पर नजर डालें तो तस्वीर बेहद चिंताजनक दिखाई देती है. 7 मई 2025 को बहराइच के सिलौटा गांव के रवि कश्यप मगरमच्छ के हमले में मारे गए. इसके बाद 5 जुलाई 2026 को मोहकमपुरवा की केतकी देवी एक पारिवारिक कार्यक्रम से लौटते समय लापता हुईं और अगले दिन उनका शव मगरमच्छ के जबड़े में मिला. 16 जुलाई को सुनील सिंह की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया.
पड़ोसी जिले लखीमपुर खीरी में हालात और गंभीर हैं. सितंबर 2025 से 16 जुलाई 2026 के बीच मगरमच्छ के हमलों में कम से कम पांच लोगों की जान जा चुकी है. 7 सितंबर 2025 को फूलबेहड़ क्षेत्र के जयंदरपुर निवासी राम सागर निषाद सुतिया नाले में मगरमच्छ का शिकार बने. 17 सितंबर को अंजनापुर के श्याम प्यारे की कंदवा नदी में मौत हो गई. 4 जून 2026 को सुरजीपुरवा के खुशी राम सुतिया नाले में मारे गए. 10 जून को बोकरिहा निवासी अवध राम पाल घाघरा नदी में हमले का शिकार हुए. 16 जुलाई को चौका नदी में 12 वर्षीय अनिकेत की जान चली गई. इन घटनाओं के अलावा पिछले 60 दिनों में लखीमपुर खीरी में तीन लोगों की मौत और एक व्यक्ति के गंभीर रूप से घायल होने की पुष्टि ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है.
अब गांव, सड़क और घर तक पहुंच रहे हैं मगरमच्छ
मगरमच्छों का खतरा अब केवल नदी किनारे तक सीमित नहीं रह गया है. तराई में कई घटनाओं ने यह साबित किया है कि मानसून के दौरान ये जीव इंसानी बस्तियों तक पहुंच रहे हैं. मार्च 2026 में बहराइच के बंभौरी पांडेयपुरवा गांव की गलियों में एक मगरमच्छ घूमता दिखाई दिया. ग्रामीणों में दहशत फैल गई. कई घंटे बाद वह खुद नदी की ओर लौट गया. हाल ही में मोतीपुर के बेलहान महेशपुर गांव में एक मगरमच्छ तालाब से निकलकर गांव में घुस आया. इससे पहले भवानियापुर गांव में निक्की श्रीवास्तव के घर के दरवाजे तक एक बड़ा मगरमच्छ पहुंच गया था. वन विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर उसे पकड़कर सुरक्षित नदी में छोड़ दिया.
लखीमपुर खीरी में भी ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं. कुछ वर्ष पहले एक मगरमच्छ पालिया थाने में घुसकर सीधे SHO के कार्यालय तक पहुंच गया था. यह घटना आज भी इलाके में चर्चा का विषय है. वहीं 12 जुलाई 2026 को धौरहरा कस्बे के गवर्नमेंट इंटर कॉलेज रोड पर एक मगरमच्छ रेंगता मिला. उसी दिन फूलबेहड़ क्षेत्र के हजरतपुर गांव से भी एक मगरमच्छ को सुरक्षित पकड़ा गया. लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं ग्रामीणों में भय और असुरक्षा की भावना को गहरा कर रही हैं.
क्यों बढ़ रहा है मानव और मगरमच्छ का टकराव?
वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि मगरमच्छ अचानक आक्रामक नहीं हुए हैं. असल समस्या इंसानों और वन्यजीवों के बीच घटती दूरी है. बरसात के दौरान बाढ़ का पानी मगरमच्छों को नए इलाकों तक पहुंचा देता है. दूसरी ओर नदी किनारे खेती का विस्तार, रेत खनन, प्राकृतिक जलाशयों का सिकुड़ना और आबादी का दबाव उनके प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर रहा है.
तराई के अधिकांश ग्रामीण आज भी नदी पर निर्भर हैं. खेतों तक पहुंचने, पशुओं को पानी पिलाने, नहाने, कपड़े धोने और मछली पकड़ने के लिए रोज नदी किनारे जाना उनकी मजबूरी है. इसी दौरान मगरमच्छ और इंसान आमने-सामने आ जाते हैं. वन्य जीव विशेषज्ञ मनीष विश्वकर्मा बताते हैं कि सुबह और शाम मगरमच्छ सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं. बाढ़ के दिनों में नदी और तालाब का फर्क खत्म हो जाता है, जिससे मगरमच्छ गांवों तक पहुंच जाते हैं. कई बार वे भोजन की तलाश में पालतू पशुओं का पीछा करते हुए इंसानी बस्तियों तक आ जाते हैं.
दुनिया के सबसे बड़े संघर्ष वाले इलाकों में शामिल यूपी
अंतरराष्ट्रीय CrocAttack Database के अनुसार वर्ष 2015 से 2024 के बीच उत्तर प्रदेश में मगरमच्छों के 223 हमले दर्ज हुए, जिनमें 68 लोगों की मौत हुई. किसी एक राज्य के लिहाज से यह दुनिया के सबसे अधिक दर्ज मामलों में शामिल है. विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से मगर (Mugger Crocodile) और घड़ियाल पाए जाते हैं. इंसानों पर अधिकांश हमलों के लिए मगर प्रजाति जिम्मेदार होती है, जबकि घड़ियाल मुख्यतः मछलियां खाते हैं और इंसानों पर हमला बेहद दुर्लभ माना जाता है.
विडंबना यह है कि मगरमच्छ संरक्षण के मामले में उत्तर प्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में रहा है. लखनऊ का कुकरेल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र और कतरनियाघाट जैसे संरक्षित क्षेत्र दशकों से संरक्षण का सफल मॉडल रहे हैं. संरक्षण के प्रयासों से मगरमच्छों की संख्या बढ़ी, लेकिन समानांतर रूप से नदी किनारे बढ़ती आबादी और मानवीय गतिविधियों ने संघर्ष को भी बढ़ा दिया.
सरकार की तैयारी और आगे की चुनौती
हालिया घटनाओं के बाद अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक रेणु सिंह ने बहराइच के जिलाधिकारी अक्षय त्रिपाठी, पुलिस अधीक्षक विश्वजीत श्रीवास्तव और बहराइच के डीएफओ सुंदरेश मैसूर के साथ प्रभावित गांवों का दौरा किया. उन्होंने कहा कि तराई की नदियां मगरमच्छों का प्राकृतिक आवास हैं और सावधानी तथा जन-जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है. उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि गांवों में जागरूकता अभियान तेज किए जाएं और लोगों को सुरक्षा संबंधी नियमों की जानकारी दी जाए. बहराइच के डीएफओ सुंदरेश मैसूर के अनुसार वन विभाग की टीमें संवेदनशील इलाकों में लगातार गश्त कर रही हैं. लोगों से अपील की जा रही है कि वे बढ़ते जलस्तर के दौरान नदियों के पास अतिरिक्त सावधानी बरतें.
दुधवा बफर ज़ोन की डिप्टी डायरेक्टर कीर्ति चौधरी बताती हैं कि पालिया, निघासन और धौरहरा के मगरमच्छ प्रभावित इलाकों में विशेष जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. संवेदनशील नदियों और नालों के किनारे चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं. गांवों में शिविर लगाकर लोगों को बताया जा रहा है कि अकेले नदी में न उतरें, बच्चों को पानी के पास न भेजें और मगरमच्छ दिखने पर तुरंत वन विभाग को सूचना दें.

