बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में एक प्रोफेसर पद पर प्रोमोशन रद्द होने का मामला अब संस्थागत बहस का रूप ले चुका है. इलाहाबाद हाइकोर्ट के 18 फरवरी के फैसले ने न केवल एक चयन प्रक्रिया को अवैध ठहराया, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में लिए गए सैकड़ों प्रशासनिक निर्णयों को भी संदेह के घेरे में ला दिया है. अदालत ने साफ कहा कि कुलपति की आपातकालीन शक्तियां नियमित नियुक्तियों और पदोन्नतियों के लिए नहीं हैं. इस टिप्पणी के बाद BHU में करियर एडवांसमेंट स्कीम के तहत हुए बड़े पैमाने पर प्रमोशन और नियुक्तियों की वैधता पर सवाल उठने लगे हैं.
मामले की शुरुआत नृत्य विभाग से हुई. कथक की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपांविता सिंह राय ने प्रोफेसर पद के लिए गठित चयन समिति की वैधता को चुनौती दी थी. उनका आरोप था कि विश्वविद्यालय में उस समय कार्यकारी परिषद मौजूद नहीं थी और कुलपति ने आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए चयन समिति का गठन कर दिया. यह मामला किसी आकस्मिक नियुक्ति का नहीं, बल्कि नियमित पदोन्नति का था.
याचिका में यह भी कहा गया कि समिति में कथक विषय के विशेषज्ञ को शामिल नहीं किया गया, जबकि पद उसी विधा से संबंधित था. चयन पैनल में भरतनाट्यम विशेषज्ञों की मौजूदगी को भी चुनौती दी गई. खंडपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद न केवल चयन प्रक्रिया को रद्द किया, बल्कि नौ अक्तूबर 2025 को कार्यकारी परिषद की मंजूरी को भी निरस्त कर दिया. अदालत ने कहा कि करियर एडवांसमेंट स्कीम के तहत प्रमोशन कोई आपात स्थिति नहीं है. अगर मूल प्रक्रिया ही विधिसम्मत नहीं थी, तो बाद में दी गई स्वीकृति भी उसे वैध नहीं बना सकती.
कोर्ट ने दो माह में नई चयन समिति गठित करने और उसमें कथक विशेषज्ञ शामिल करने का निर्देश दिया है. साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि विशेषज्ञों का पैनल तैयार करते समय उम्मीदवारों को पूरी तरह प्रक्रिया से बाहर रखा जाए.
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से दलील दी गई कि कुलपति ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के निर्देशों के तहत आपातकालीन शक्तियों का उपयोग किया था. यह नियुक्ति किसी एक नृत्य शैली के लिए नहीं, बल्कि नृत्य विभाग के लिए थी, इसलिए भरतनाट्यम विशेषज्ञों को शामिल करना गलत नहीं माना जाना चाहिए. प्रशासन का कहना है कि बाद में गठित कार्यकारी परिषद ने भी इन निर्णयों को अपनी मंजूरी दी थी, इसलिए प्रक्रिया को अवैध ठहराना उचित नहीं है.
जानकारी के मुताबिक विश्वविद्यालय अब कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की संभावना भी शामिल है. लेकिन अदालत की टिप्पणी ने बहस को व्यापक बना दिया है. पूर्व कुलपति प्रो. सुधीर कुमार जैन के कार्यकाल में लंबे समय तक कार्यकारी परिषद का गठन नहीं हो पाया था. इसी अवधि में BHU अधिनियम की धारा 7 सी (5) के तहत आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बड़ी संख्या में निर्णय लिए गए. करियर एडवांसमेंट स्कीम के तहत 450 से अधिक एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पदों पर पदोन्नति दी गई. विभिन्न संस्थानों के निदेशकों की नियुक्ति, विभागाध्यक्षों को अतिरिक्त जिम्मेदारियां और 350 से अधिक नई नियुक्तियां भी इसी प्रक्रिया के जरिए हुईं.
जब बाद में नई कार्यकारी परिषद का गठन हुआ, तो उसने अधिकांश फैसलों पर मुहर लगा दी. लेकिन अदालत के ताजा फैसले के बाद यह सवाल उठ रहा है कि अगर मूल प्रक्रिया में गड़बड़ियां थी, तो क्या बाद की मंजूरी उसे कानूनी मजबूती दे सकती है. विश्वविद्यालय के एक पूर्व डीन, नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं, “आपात शक्तियों का इस्तेमाल केवल वास्तविक आपदा या तात्कालिक प्रशासनिक संकट में होना चाहिए. नियमित प्रमोशन को आपात स्थिति बताना संस्थागत परंपराओं के विपरीत है.” उनके अनुसार BHU जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यकारी परिषद सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय है और उसे दरकिनार करना लंबी अवधि में संस्थागत असंतुलन पैदा कर सकता है.
BHU के एक पूर्व कुलसचिव का मानना है कि समस्या केवल एक चयन समिति की नहीं, बल्कि प्रक्रिया की है. वे कहते हैं, “अगर चयन समितियों का गठन नियम-कायदे से नहीं हुआ, तो प्रभावित अभ्यर्थी अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं. इससे विश्वविद्यालय को एक साथ कई कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.” उनका अनुमान है कि यदि 10 से 15 फीसदी मामलों में भी चुनौती आई, तो दर्जनों नियुक्तियां न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकती हैं.
उच्च शिक्षा नीति के विशेषज्ञ प्रो. आर. के. त्रिपाठी का कहना है कि यह फैसला केवल BHU तक सीमित नहीं रहेगा. उनके अनुसार, “देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में करियर एडवांसमेंट स्कीम के तहत प्रमोशन की प्रक्रिया अक्सर समयबद्ध नहीं हो पाती. अगर कार्यकारी परिषदें समय पर गठित न हों, तो प्रशासनिक दबाव में लिए गए फैसले बाद में विवाद का कारण बनते हैं.” वे बताते हैं कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दिशा-निर्देश स्पष्ट करते हैं कि विषय विशेषज्ञ की मौजूदगी अनिवार्य है और चयन प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए.
कुछ पूर्व शिक्षकों का यह भी कहना है कि बड़े पैमाने पर प्रमोशन से विभागों में वरिष्ठता संतुलन प्रभावित हुआ. एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर के अनुसार, “करीब 450 प्रमोशन एक सीमित समय में होना असामान्य नहीं है, लेकिन यदि प्रक्रिया पर सवाल उठें तो पूरी अकादमिक संरचना पर असर पड़ता है. इससे शोध परियोजनाओं, प्रशासनिक जिम्मेदारियों और छात्र मार्गदर्शन पर भी प्रभाव पड़ सकता है.”
छात्र संगठनों ने भी आंकड़ों का हवाला देते हुए पारदर्शिता की मांग की है. उनका कहना है कि यदि 350 से अधिक नियुक्तियां बिना नियमित कार्यकारी परिषद की पूर्व स्वीकृति के हुईं, तो विश्वविद्यालय को विस्तृत श्वेत पत्र जारी करना चाहिए. इसमें प्रत्येक नियुक्ति और प्रमोशन की प्रक्रिया, चयन समिति की संरचना और स्वीकृति की तारीखें सार्वजनिक की जाएं. दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष है कि सभी नियुक्तियां और पदोन्नतियां नियमानुसार की गईं और बाद में कार्यकारी परिषद से अनुमोदित भी हुईं. प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, उस अवधि में विश्वविद्यालय में 30 से अधिक विभागों और केंद्रों में नेतृत्व संबंधी रिक्तियां थीं, जिन्हें भरना जरूरी था. अगर निर्णय लंबित रहते, तो अकादमिक और प्रशासनिक कार्य प्रभावित होते. इसी तर्क के आधार पर आपात शक्तियों का उपयोग किया गया.
कानूनी विशेषज्ञों का आकलन है कि अदालत का फैसला तकनीकी रूप से विशिष्ट मामले पर केंद्रित है, लेकिन इसकी व्याख्या व्यापक हो सकती है. अगर प्रभावित पक्ष अदालतों में याचिकाएं दायर करते हैं, तो विश्वविद्यालय को प्रत्येक मामले में चयन समिति के गठन और विशेषज्ञता का प्रमाण देना होगा. इससे न केवल समय और संसाधन खर्च होंगे, बल्कि संस्थागत स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है.
BHU देश के सबसे बड़े आवासीय केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक है, जहां 30 हजार से अधिक छात्र अध्ययनरत हैं और 140 से अधिक विभाग व संस्थान संचालित होते हैं. ऐसे संस्थान में प्रशासनिक निर्णयों की वैधता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक रूप से व्यापक असर डालता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विश्वविद्यालय पारदर्शी समीक्षा तंत्र स्थापित कर दे और विवादित मामलों की आंतरिक जांच करा ले, तो स्थिति नियंत्रित की जा सकती है.
फिलहाल विश्वविद्यालय के सामने कानूनी अपील और आंतरिक सुधार, दोनों विकल्प खुले हैं. पूर्व शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों की राय में दीर्घकालिक समाधान केवल न्यायालय में अपील नहीं, बल्कि प्रक्रियागत सुधार है. चयन समितियों में विषय विशेषज्ञ की अनिवार्य उपस्थिति, कार्यकारी परिषद की समयबद्ध बैठकें और आपात शक्तियों के दायरे की स्पष्ट व्याख्या भविष्य के विवादों को रोक सकती है.
एक पदोन्नति से शुरू हुआ यह मामला अब विश्वविद्यालय की साख और प्रशासनिक विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है. आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि BHU इस चुनौती को कानूनी लड़ाई के रूप में देखता है या इसे संस्थागत सुधार का अवसर मानता है. फिलहाल इतना तय है कि सैकड़ों नियुक्तियां और पदोन्नतियां जांच की नजर में हैं और विश्वविद्यालय को अपने प्रत्येक निर्णय की वैधानिक मजबूती साबित करनी होगी.

