अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दानपात्र से कथित चोरी और दान प्रबंधन में अनियमितताओं की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे जांच का दायरा केवल गिरफ्तार कर्मचारियों तक सीमित नहीं रह गया है. अब सबसे बड़ा सवाल उस व्यक्ति की भूमिका पर उठ रहा है जो ट्रस्ट का औपचारिक पदाधिकारी नहीं होने के बावजूद मंदिर की लगभग हर महत्वपूर्ण व्यवस्था से जुड़ा माना जाता रहा. यह नाम है 67 वर्षीय गोपाल राव का.
ट्रस्ट के सदस्य महंत दिनेंद्र दास ने 1 जुलाई को सार्वजनिक रूप से जिस तरह गोपाल राव पर सवाल उठाए, उसके बाद मंदिर प्रशासन की आंतरिक कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया भी बहस के केंद्र में आ गई है. दान प्रकरण में अब तक कई एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं और विशेष जांच दल (एसआइटी) मामले की जांच कर रहा है.
इसी बीच ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के पद छोड़ने के बाद प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर नए सवाल पैदा हुए हैं. हालांकि इन दोनों के खिलाफ किसी आपराधिक भूमिका की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन ट्रस्ट के भीतर से उठ रही आवाजें यह संकेत दे रही हैं कि वास्तविक शक्ति संरचना औपचारिक पदों से कहीं अधिक जटिल रही है. इसी संदर्भ में गोपाल राव का नाम लगातार चर्चा में है.
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गोपाल राव का बिना नाम लिए कहा है कि दान प्रबंधन से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों के तार कर्नाटक और महाराष्ट्र से जुड़े हो सकते हैं.
निर्माण सहायक से मंदिर प्रबंधन के प्रभावशाली चेहरे तक
गोपाल राव मूल रूप से कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के निवासी हैं. फिजिक्स में पोस्ट ग्रेजुएट गोपाल राव लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्नाटक प्रांत प्रचारक रहे और बाद में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के केंद्रीय सह मंत्री के रूप में सक्रिय रहे. वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई तो संघ और विहिप से जुड़े कई अनुभवी कार्यकर्ताओं को अयोध्या बुलाया गया. इन्हीं में गोपाल राव भी शामिल थे.
शुरुआत में उनकी भूमिका निर्माण कार्य में सहयोग तक सीमित थी. उन्हें निर्माण संबंधी तकनीकी समन्वय और व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी दी गई. लेकिन मंदिर निर्माण आगे बढ़ने और प्राण प्रतिष्ठा के बाद उनकी भूमिका लगातार विस्तृत होती चली गई. पहले निर्माण प्रभारी के सहयोगी और बाद में व्यवस्थापक के रूप में उन्होंने मंदिर प्रशासन में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया. जानकारों के मुताबिक वर्ष 2025 में उन्हें ट्रस्ट का विशेष आमंत्रित सदस्य भी बनाया गया हालांकि इसकी औपचारिक सार्वजनिक घोषणा कभी नहीं की गई.
समय के साथ स्थिति यह बनी कि मंदिर परिसर में होने वाले अधिकांश प्रशासनिक और व्यवस्थागत निर्णयों में गोपाल राव की मौजूदगी अनिवार्य मानी जाने लगी. ट्रस्ट के भीतर उन्हें महासचिव चंपत राय के बाद सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में देखा जाने लगा.
आखिर गोपाल राव किस हैसियत के साथ ट्रस्ट के कामकाज पर असर डालते थे? यह सवाल आज सबसे अधिक पूछा जा रहा है. यदि गोपाल राव ट्रस्ट के नियमित सदस्य या विधिक पदाधिकारी नहीं थे तो फिर मंदिर की व्यवस्थाओं में उनकी भूमिका कितनी अधिकृत थी? मंदिर से जुड़े सूत्रों के अनुसार परिसर में होने वाले आयोजनों की तैयारी, भगवान के भोग की सामग्री की खरीद, पुजारियों और कर्मचारियों के समन्वय, दर्शन व्यवस्था, आरती पास और वीआईपी दर्शन से जुड़े कई निर्णयों में उनकी सक्रिय भूमिका रही.
आरोप यह भी हैं कि भूमि खरीद जैसे संवेदनशील मामलों में भी उनकी परोक्ष भागीदारी थी. इन आरोपों की अभी किसी जांच एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है लेकिन इतना स्पष्ट है कि ट्रस्ट के भीतर उनका प्रभाव सामान्य प्रशासनिक सहयोगी से कहीं अधिक माना जाता रहा. यही कारण है कि अब सवाल केवल दान चोरी तक सीमित नहीं हैं बल्कि उस पूरी प्रशासनिक संरचना पर उठ रहे हैं जिसमें औपचारिक जिम्मेदारी और वास्तविक निर्णय क्षमता अलग-अलग हाथों में दिखाई देती है.
दिनेंद्र दास के आरोपों ने क्यों बढ़ाई गंभीरता?
ट्रस्ट के सदस्य महंत दिनेंद्र दास का बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह किसी विपक्षी नेता या बाहरी व्यक्ति का आरोप नहीं बल्कि ट्रस्ट के अंदर बैठे सदस्य की सार्वजनिक टिप्पणी है. महंत दिनेंद्र दास ने स्पष्ट कहा कि राम मंदिर की व्यवस्थाएं गोपाल राव के आने के बाद बिगड़ी हैं और उन्हें अब व्यवस्थाओं से अलग कर देना चाहिए. उनके अनुसार गोपाल राव को केवल निर्माण कार्य में सहयोग के लिए लाया गया था लेकिन बाद में उनकी भूमिका आवश्यकता से अधिक बढ़ गई. उन्होंने यह भी कहा कि गोपाल राव ट्रस्ट के सदस्य नहीं हैं, फिर भी व्यवस्थाओं में उनका व्यापक हस्तक्षेप रहा.
महंद दिनेंद्र दास के मुताबिक ट्रस्ट में पहले से अनुभवी और परंपराओं को जानने वाले लोग मौजूद थे, इसलिए किसी बाहरी व्यक्ति को इतनी निर्णायक भूमिका देने की जरूरत नहीं थी. सबसे गंभीर आरोप यह रहा कि लेन-देन और आर्थिक मामलों में गोपाल राव की भूमिका रही जबकि चंपत राय और अनिल मिश्रा को उन्होंने इस मामले में निर्दोष बताया. उन्होंने कहा कि पैसों के लेन-देन का काम गोपाल राव को नहीं दिया जाना चाहिए था.
वीआईपी दर्शन और पास व्यवस्था पर भी सवाल
दान प्रकरण के साथ-साथ मंदिर की वीआईपी दर्शन व्यवस्था भी जांच के घेरे में आ गई है. आरोप लगाए गए हैं कि गोपाल राव के नाम से वीआईपी पास जारी किए जाते रहे. यदि ऐसा हुआ तो यह प्रश्न उठता है कि यह अधिकार उन्हें किस आधार पर प्राप्त था. सामान्य तौर पर ऐसे पास ट्रस्ट के अधिकृत पदाधिकारियों या प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से जारी किए जाते हैं. यदि किसी ऐसे व्यक्ति के माध्यम से पास जारी हो रहे थे जिसके पास औपचारिक प्रशासनिक अधिकार नहीं था तो इससे पूरी अनुमति प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं.
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन एसआइटी की जांच में यह पहलू भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न यही है. यदि गोपाल राव मंदिर के लगभग सभी विभागों तक पहुंच रखते थे, निर्माण से लेकर आयोजन, खरीद, दर्शन और प्रशासन तक उनकी भूमिका थी, तो क्या दान प्रबंधन की व्यवस्था से वे पूरी तरह अनभिज्ञ हो सकते थे?
यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि दानपात्र खोलने, नकदी की सुरक्षा, आभूषणों के रिकॉर्ड और वित्तीय नियंत्रण को लेकर पहले ही कई प्रक्रियात्मक कमियां सामने आने का दावा किया जा चुका है. यदि मंदिर की समग्र व्यवस्था पर किसी व्यक्ति का इतना प्रभाव था तो उसके ज्ञान और जिम्मेदारी की सीमा क्या थी, इसकी जांच स्वाभाविक रूप से होगी. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके खिलाफ किसी अपराध की पुष्टि हो चुकी है. लेकिन प्रशासनिक जवाबदेही के स्तर पर उनकी भूमिका की जांच अब अपरिहार्य होती दिखाई दे रही है.

