मध्य प्रदेश में किसानों ने भोपाल-नर्मदापुरम हाईवे को दो दिनों तक जाम करने के बाद आखिरकार अपना आंदोलन खत्म कर दिया. किसानों ने यह फैसला तब लिया, जब राज्य सरकार ने उनकी प्रमुख मांगों पर सहमति जताई.
इनमें मूंग की अधिक मात्रा में खरीद और रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति फिर से ऑफलाइन व्यवस्था से करने की मांग शामिल थी. राज्य के कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंसाना की अगुवाई वाली समिति के साथ 16 किसान संगठनों के बीच बातचीत हुई .
इसके बाद सरकार ने घोषणा की कि वह गर्मी की मूंग की औसत उपज का 60 फीसद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदेगी. इसका मतलब है कि अब किसान प्रति एकड़ 1.25 क्विंटल की जगह 3 क्विंटल मूंग सरकार को बेच सकेंगे.
इस फैसले का अतिरिक्त वित्तीय बोझ राज्य सरकार उठाएगी. अतिरिक्त मूंग खरीदने पर सरकार को करीब 1,200 करोड़ रुपये और खर्च करने होंगे. मूंग बेचने के लिए स्लॉट बुकिंग की तारीख 10 अगस्त तक और खरीद की अवधि 20 अगस्त तक बढ़ा दी गई है.
सरकार ने ऑनलाइन पोर्टल ई-विकास उर्वरक आपूर्ति प्रणाली को भी फिलहाल स्थगित करने का ऐलान किया है. अब उर्वरकों की बिक्री पहले की तरह पारंपरिक ऑफलाइन व्यवस्था से होगी.
27 जुलाई को किसानों ने नर्मदापुरम जिला मुख्यालय से पैदल मार्च शुरू किया था. करीब 70 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद वे अगले दिन शाम को भोपाल की सीमा पर पहुंचे और पुलिस की ओर से लगाए गए बैरिकेड्स के पास डेरा डाल दिया.
प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के सरकारी आवास का घेराव करने की चेतावनी दी थी. इसके बाद प्रदर्शन स्थल को सील कर दिया गया और बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया. इससे शहर के आम लोगों को परेशानी हुई क्योंकि नर्मदापुरम रोड के किनारे कई रिहायशी इलाके, स्कूल और कॉलेज हैं.
किसान क्यों थे नाराज?
मध्य प्रदेश सरकार रबी और खरीफ फसल के बीच गर्मी के मौसम में बोई जाने वाली मूंग की खरीद करती है. करीब एक दशक पहले रायसेन, सीहोर, नर्मदापुरम और हरदा जिलों के किसानों ने गर्मी के मौसम में मूंग की खेती शुरू की थी. इसके बाद मूंग की खेती ने किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.
केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश में कुल मूंग उत्पादन का 25 फीसद खरीदने का लक्ष्य तय किया है. यह करीब 4,54,580 टन के बराबर है. राज्य सरकार ने केंद्र से इसे बढ़ाकर 40 फीसद यानी 8,06,000 टन करने की मांग की थी. इसकी वजह यह है कि प्रति एकड़ मूंग का वास्तविक उत्पादन करीब 5 क्विंटल होता है, जबकि खरीद की सीमा 1.25 क्विंटल प्रति एकड़ तय है.
इसका मतलब था कि बची हुई उपज किसानों को खुले बाजार में बेचनी पड़ती, जहां कीमत 6,500 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि सरकार 8,682 रुपये प्रति क्विंटल देती है. इससे किसानों को नुकसान हो रहा था. इस बार मूंग की बंपर पैदावार ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी.
दूसरा मुद्दा उर्वरक खरीद के लिए शुरू की गई नई ई-विकास प्रणाली था. सरकार का कहना है कि इसका मकसद कालाबाजारी रोकना और खरीद केंद्रों पर लगने वाली लंबी कतारों से बचना है, जिससे अक्सर अव्यवस्था फैलती है. वहीं, किसानों का कहना है कि यह व्यवस्था काफी जटिल है. उनका आरोप है कि उन्हें न तो पर्याप्त मात्रा में और न ही समय पर उर्वरक मिल रहा है.

