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रिकॉर्ड वोटिंग और बंटा हुआ एग्जिट पोल: आखिर क्या है बंगाल के मन में?

कई एग्जिट पोल में भारी मतदान और BJP के जोशीले चुनाव प्रचार से सत्ता परिवर्तन के संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, इन सबके बावजूद ममता बनर्जी की लोकप्रियता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता

ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी  (फाइल फोटो)
ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 1 मई , 2026

पश्चिम बंगाल में दो चरणों में हुआ चुनाव खत्म होने के बाद राज्य के साथ पूरा देश नतीजों का बेसब्री से इंतजार कर रहा है. हालांकि इस बीच चर्चा दोनों चरणों हुए अभूतपूर्व मतदान को लेकर भी है. 29 अप्रैल को दूसरे चरण में 91.66 फीसद वोटिंग हुई, जबकि 23 अप्रैल को पहले चरण में 93.19 फीसद मतदान दर्ज किया गया था.

इस तरह कुल मतदान फीसद 92.47 रहा, जो राज्य के इतिहास में अब तक का सबसे ऊंचा है. 2011 में 84.72 फीसद वोटिंग हुई थी, जो पहले सबसे अधिक मानी जाती थी. उसी चुनाव में 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन के बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) सत्ता में आई थी.

2026 में मतदान फीसद में आई इस बड़ी बढ़ोतरी ने जनादेश की व्याख्या का तरीका पूरी तरह बदल दिया है. साथ ही, इस बार के रिकॉर्ड मतदान से एग्जिट पोल एजेंसियां भी नतीजों को लेकर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं. उल्टा, 4 मई को मतगणना वाले दिन तक अनिश्चितता और बढ़ गई है. 29 अप्रैल की शाम से टीवी समाचार चैनलों पर जो एग्जिट पोल दिखाए जा रहे हैं, उनके नतीजे बिल्कुल अलग-अलग हैं.

इनमें से एक पीपल्स पल्स ने TMC के लिए 294 सदस्यीय विधानसभा में 177-187 सीटों के साथ एकतरफा जीत का अनुमान लगाया है. वहीं, मैट्रिज़, जेवीसी, पी-मार्क और पोल डायरी जैसी एजेंसियां ​​BJP को आगे बता रही हैं, उनके अनुमानों में BJP को 138 से 175 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है.

इन एग्जिट पोल्स के अनुमान में सीटों का अनुमानित अंतर काफी ज्यादा है. साथ ही गहरी राजनीतिक अनिश्चितता भी दिखती है. जमीनी स्तर पर मुकाबला BJP की सीधी जीत के पूर्वानुमानों से कहीं अधिक कड़ा होने की बात कही जा रही है. भ्रष्टाचार के आरोपों के अलावा, राज्य और स्थानीय स्तर पर TMC के शासन को लेकर स्पष्ट असंतोष था. इन चिंताओं ने BJP को एक स्पष्ट रणनीति प्रदान की.

इसके अलावा, BJP के चुनाव प्रचार में ममता बनर्जी के कुशासन और TMC के जड़ जमाए संरक्षण नेटवर्क का मुद्दा उठाया गया. इन मुद्दों को एक तरह से जनमत संग्रह के रूप में पेश किया गया. BJP की संगठनात्मक तैयारी सुनियोजित थी.

2024 के लोकसभा चुनावों में मिली हार के बाद, BJP ने बूथ स्तर पर लामबंदी, कैडर विस्तार और सूक्ष्म स्तर पर लक्षित अभियानों में भारी निवेश किया. 2025 के अंत में BJP के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) की बिहार चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार से बंगाल की ओर बहने वाली गंगा नदी के प्रतीक का इस्तेमाल करते हुए अपने संदेश को और भी प्रभावी बनाया.

पश्चिम बंगाल में BJP के अंदरूनी हलकों में यह साफ संकेत था कि 2026 में बंगाल पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लक्ष्य है. बंगाल में अपनी आखिरी चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भी कि नतीजों के बाद वे नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए वापस लौटेंगे.

पूरे चुनाव अभियान के दौरान वरिष्ठ BJP नेताओं ने भी इसी तरह का आत्मविश्वास दिखाया. पहले चरण के मतदान (152 सीटों) के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि BJP 110 से ज्यादा सीटें जीत सकती है और अगली सरकार बना सकती है.

ममता बनर्जी के खिलाफ भवानीपुर सीट से BJP की टिकट पर चुनाव लड़ रहे दिग्गज नेता सुवेंदु अधिकारी, इस तरह के बयानों में अमित शाह से भी आगे निकल गए. उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी 180 सीटों के पार पहुंच जाएगी. 29 अप्रैल को विपक्ष के नेता (मौजूदा) सुवेंदु अधिकारी ने कहा, “एग्जिट पोल ठीक हैं लेकिन मैं आपको जमीनी तौर पर सही एग्जिट पोल बता रहा हूं. BJP 180 से ज्यादा सीटें जीत रही है और आराम से सरकार बना लेगी.”

इन बयानों से इतर यह साफ है कि इस बार बंगाल का चुनावी माहौल एकतरफा नहीं है. सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद ममता बनर्जी इस चुनाव में लोगों की नजर में एक अलग ही मुकाम पर दिखीं. मतदाताओं के एक बड़े वर्ग के लिए, वे राष्ट्रीय राजनीति में सबसे सशक्त बंगाली आवाज बनी हुई हैं. उनकी पहचान केवल प्रतीकात्मक नहीं है, इसने लगातार उनकी राजनीतिक मजबूती को बढ़ाया है.

TMC के आंतरिक आकलन में भी यही आत्मविश्वास झलकता है. पार्टी नेताओं का तर्क है कि BJP की घुसपैठियों को लेकर आक्रामक बयानबाजी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत 66 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने का उल्टा असर हुआ है.

उनके मुताबिक, मतदाताओं के एक बड़े वर्ग, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों, प्रवासियों और गरीब बंगाली भाषी समुदायों ने SIR के तहत नाम हटाए जाने को लक्षित तौर पर मताधिकार से वंचित करना समझा है. इसमें शामिल आंकड़े वाकई काफी ज्यादा हैं.

उत्तर 24 परगना में 12.6 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए, दक्षिण 24 परगना में 1.09 करोड़ और कोलकाता में लगभग 697,000 नाम हटाए गए. कम से कम 25 निर्वाचन क्षेत्रों में हटाए गए नामों की संख्या विजयी उम्मीदवारों की पिछली जीत के अंतर से भी ज्यादा थी.

BJP ने फर्जी मतदाताओं को हटाने के लिए SIR प्रणाली को आवश्यक बताया. माना जाता है कि इसी विरोधाभासी रवैए ने मतदाताओं की मानसिकता को प्रभावित किया. अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में TMC के समर्थन में एकजुटता के स्पष्ट संकेत मिले. वहीं, हिंदू बहुल क्षेत्रों में BJP को बढ़त मिलती दिखी. ऐसे में कह सकते हैं कि इस चुनाव में वोटों का ध्रुवीकरण भी काफी हुआ है.

यह चुनाव 2011 के चुनाव की तुलना में काफी अलग रहा. उस वक्त वाम मोर्चे के खिलाफ आक्रोश ममता बनर्जी के समर्थन में एक लहर की तरह बदल गया था. इस चुनाव में संयम देखने को मिला. कई मतदाता खुलकर अपनी राजनीतिक पसंद बताने से हिचकिचा रहे हैं.

विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में हुई बातचीत से थकान और आशंका का मिलाजुला भाव झलकता है. कुछ मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से रोजमर्रा की जिंदगी में राजनीतिक नतीजों को लेकर चिंता व्यक्त की. इस शांत माहौल ने पारंपरिक संकेतकों को कम विश्वसनीय बना दिया है और शायद एग्जिट पोल को भी.

मतदान के दिन के हालात ही विश्लेषण को एक नया आयाम देते हैं. दरअसल पहली बार बंगाल में ऐसा चुनाव हुआ जो बड़े पैमाने पर हिंसा से मुक्त था. किसी की मृत्यु या बड़े पैमाने पर झड़पों की कोई खबर नहीं थी. राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे हाल-फिलहाल हुए चुनाव की तुलना में अभूतपूर्व बताया है. हालांकि, हिंसा की अनुपस्थिति से चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़े सवाल खुद ही हल नहीं हो जाते.

TMC ने आरोप लगाया कि केंद्रीय बलों ने मतदाताओं को डराया-धमकाया और मतदान केंद्रों पर प्रभावी रूप से नियंत्रण कर लिया. ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने इस तरह का लोकतंत्र पहले कभी नहीं देखा और दावा किया कि राज्य पुलिस को दरकिनार कर दिया गया था.

BJP ने पलटवार करते हुए कहा कि केंद्रीय बलों की 2,321 कंपनियों की तैनाती ने स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित किया. अधिकारी ने भबानीपुर में फर्जी मतदान के प्रयासों का आरोप लगाया. ये परस्पर विरोधी दावे बंगाल के एक जाने-माने पैटर्न को दिखाते हैं. हालांकि, शांतिपूर्ण मतदान का मतलब यह नहीं है कि वह निर्विवाद रूप से वैध है.

साथ ही, मतदान में भागीदारी का पैमाना भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है. चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि महिला मतदाताओं (93.24 फीसद) ने पुरुषों (91.74 फीसद) को पीछे छोड़ दिया. लंबे समय से महिलाएं TMC का एक महत्वपूर्ण समर्थक आधार रही हैं. खासकर उसकी कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से. अगर यह मतदान महिलाओं के बीच एकजुटता को दिखाता है, तो यह करीबी मुकाबले वाले निर्वाचन क्षेत्रों में परिणामों को भी प्रभावित कर सकता है.

BJP की रणनीति पहचान के आधार पर एकजुटता स्थापित करने और असंतोष को वोटों में बदलने की क्षमता पर आधारित है. 'डर बनाम स्वतंत्रता' का उसका नारा लगातार बना हुआ है. पिछले चुनावों की तुलना में BJP के कार्यकर्ताओं की संख्या अधिक मजबूत है लेकिन क्या इससे उसे निर्णायक जीत मिलेगी, यह कहना मुश्किल है?

2021 के चुनावों की छाया सभी अनुमानों पर साफ दिखाई दे रही है. उस समय के एग्जिट पोल में कड़ी टक्कर का अनुमान लगाया गया था, जिनमें से अधिकांश ने TMC को लगभग 156 सीटें और BJP को 120 से अधिक सीटें मिलने की बात कही थी. हालांकि, असल नतीजा ममता बनर्जी की शानदार जीत रही, उन्हें 215 सीटें मिलीं. BJP को सिर्फ 77 सीटें मिलीं. अनुमान और वास्तविकता के इस अंतर ने मतदाताओं और राजनीतिक दलों दोनों को इस बार एग्जिट पोल के पूर्वानुमानों पर संदेह करने पर मजबूर कर दिया है.

दोनों पक्षों की प्रतिक्रियाओं में भी यह संदेह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. BJP बहुमत का आंकड़ा आसानी से पार करने को लेकर आश्वस्त है. वहीं, TMC एग्जिट पोल को पूरी तरह खारिज करते हुए तर्क देती है कि जमीनी स्तर पर विशेष रूप से महिलाओं और दुविधा में पड़े मतदाताओं को संगठित करना निर्णायक जनादेश दिलाएगा.

इस चुनाव को लगातार प्रतिस्पर्धी पहचानों के बीच संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है. BJP के चुनाव प्रचार में राष्ट्रवाद, नागरिकता और घुसपैठ पर जोर दिया गया. वहीं, TMC ने बंगाली पहचान की कहानी को आगे बढ़ाते हुए BJP को राज्य पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश कर रही एक बाहरी ताकत के रूप में पेश किया. BJP के केंद्रीय पर्यवेक्षकों की टिप्पणियों और टकरावपूर्ण राजनीतिक संदेशों में हिंदी के इस्तेमाल को TMC ने बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा बना दिया.  

साफ है कि चुनाव के वक्त लोगों के मन में इन सभी बातों ने भी असर किया होगा. खासकर राज्य के बड़े और छोटे शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में. भबानीपुर, नंदीग्राम, कोलकाता पोर्ट, बैरकपुर, भाटपारा, जगतदल, बांगांव, दमदम, संदेशखाली, राणाघाट और जादवपुर जैसी महत्वपूर्ण सीटें अंतिम परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं. शहरी बनाम ग्रामीण, पहचान बनाम शासन, कल्याण बनाम ध्रुवीकरण का मुद्दा इन सीटों पर अहम भूमिका निभाएगा.

मतगणना का दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, दो समानांतर वास्तविकताएं एक साथ मौजूद हैं. एक आंकड़ों के आधार पर है. कई एग्जिट पोल को भारी मतदान और BJP के आक्रामक अभियान से निर्णायक जीत की संभावना दिख रही है.

वहीं, दूसरा कारण राजनीतिक है. ममता की लोकप्रियता, प्रमुख मतदाता समूहों का एकीकरण और बंगाल के चुनावी व्यवहार की जटिल प्रकृति से संकेत मिलता है कि BJP के पक्ष में परिणाम आना निश्चित नहीं है.

यह चुनाव किसी एक लहर से तय होने वाला नहीं लगता, बल्कि इसमें कई तरह की परस्पर विरोधी भावनाएं हावी हैं. अगर BJP जीतती है, तो यह बंगाल की राजनीतिक दिशा में एक ऐतिहासिक बदलाव होगा. अगर TMC सत्ता में बनी रहती है, खासकर इतने जोरदार प्रचार के बावजूद तो यह ममता बनर्जी की चुनावी गणित को चुनौती देने की क्षमता को फिर से साबित कर देगा.

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