दो साल पहले वायनाड में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने कई गांवों को तबाह कर दिया था और 400 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी. इसे एक मानव-जनित त्रासदी माना गया था, जिसकी वजह पश्चिमी घाट में वर्षों से बिना रोक-टोक निर्माण, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव और खनन को बताया गया.
7 जुलाई को वायनाड के कल्लाडी में एक टनल प्रोजेक्ट के पास हुए भूस्खलन में आठ मजदूरों की मौत हो गई. यह घटना दिखाती है कि इस इलाके को हुआ पर्यावरणीय नुकसान अभी तक नहीं थमा है, बल्कि लगातार बढ़ रहा है और बार-बार अप्रत्याशित हादसों का कारण बन रहा है.
भारी मानसूनी बारिश के कारण मेप्पाडी में अनक्कमपोयिल-मेप्पाडी सुरंग परियोजना के मुहाने के पास भारी मात्रा में मलबा खिसक गया. मलबा इतना ज्यादा था कि बचाव दल को एक मजदूर का शव चाय बागान में स्थित एक तालाब से मिला, जो घटना स्थल से 1.5 किलोमीटर दूर था.
करीब 2,000 करोड़ रुपये की लागत वाली 8.73 किलोमीटर लंबी ट्विन ट्यूब (दो-दो लेन) सुरंग का निर्माण पिछले साल अगस्त से चल रहा है. इसका उद्देश्य कोझिकोड और वायनाड को जोड़ने वाली खतरनाक थमारास्सेरी घाट सड़क का एक वैकल्पिक रास्ता तैयार करना है.
विडंबना यह है कि यह भूस्खलन चूरालमाला से सिर्फ 5 किलोमीटर दूर हुआ, जो 30 जुलाई 2024 के वायनाड भूस्खलन से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक था. वायनाड पर्यावरण संरक्षण परिषद के महासचिव एन. बदूशा ने कहा, "कल्लाडी की त्रासदी मानव-जनित आपदा है. इसके लिए सुरंग बनाने वाली कंपनी, सरकार, आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और जिला प्रशासन जिम्मेदार हैं."
बदूशा ने इंडिया टुडे से कहा, "पिछली सरकार ने इस परियोजना को भारी निवेश के साथ शुरू किया लेकिन इलाके की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में नहीं रखा. हमें डर है कि अगर यह परियोजना जारी रही तो आगे और भी आपदाएं हो सकती हैं."
75 वर्षीय बदूशा केरल के जाने-माने पर्यावरण कार्यकर्ता हैं. उन्होंने इस सुरंग परियोजना के खिलाफ कई आंदोलन चलाए और पहाड़ काटने तथा सुरंग बनाने से पहले पर्यावरणीय पहलुओं का गंभीर आकलन करने की मांग की थी. उन्होंने इडुक्की, पलक्कड़ और वायनाड को पश्चिमी घाट में विकास की लहर से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र बताया. प्रसिद्ध पर्यावरणविद माधव गाडगिल ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा गठित पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल की अध्यक्षता की थी.
पैनल की 2011 की रिपोर्ट में पूरे वायनाड क्षेत्र को "अत्यंत संवेदनशील, मध्यम संवेदनशील और कम संवेदनशील" श्रेणियों में रखा गया था. रिपोर्ट में वायनाड में पर्यावरण के लिए नुकसानदायक सभी मानवीय गतिविधियों पर रोक लगाने की सिफारिश की गई थी.
इस साल केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने वायनाड जिले के मनंथवाडी और विथिरी तालुक के 13 गांवों को पश्चिमी घाट के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया. साथ ही केरल सरकार को खनन, पत्थर खदान और बड़े पैमाने पर निर्माण जैसी व्यावसायिक गतिविधियों को नियंत्रित करने का निर्देश दिया, ताकि इस पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा की जा सके.
पर्यावरणविदों की चेतावनियों के बावजूद केरल के पहाड़ी इलाकों में हर मानसून के दौरान आपदाएं आती रहती हैं. कल्लाडी भूस्खलन के मामले में मेप्पाडी पंचायत का कहना है कि परियोजना के कामकाज में खामियां थीं. मेप्पाडी पंचायत की प्रमुख रमला हम्सा ने आरोप लगाया, "हमने निर्माण कंपनी द्वारा खुदाई से निकली मिट्टी जमा करने पर चिंता जताई थी और मानसून से पहले उसे हटाने का निर्देश दिया था, क्योंकि इससे स्थानीय लोगों को खतरा था. हालांकि, कोई कार्रवाई नहीं की गई."
वायनाड के कल्पेट्टा से विधायक और राज्य के कृषि मंत्री टी. सिद्दीक ने भी इस त्रासदी के लिए कंपनी को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, "जिला प्रशासन ने कंपनी को इलाके से मिट्टी हटाने और मानसून के दौरान निर्माण कार्य रोकने का निर्देश दिया था लेकिन कंपनी ने इसके बावजूद मजदूरों से काम कराया."
राज्य सरकार ने इस भूस्खलन के कारणों और परियोजना की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई है. इस समिति में भूवैज्ञानिक सी.पी. सुरेंद्रन भी शामिल हैं. 2024 के वायनाड भूस्खलन के बाद केरल ने आपदाओं की पहले से जानकारी देने और जनहानि कम करने के लिए एक आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली शुरू की थी. अब सवाल यह उठ रहा है कि कल्लाडी में लोगों की जान जाने से यह व्यवस्था क्यों नहीं रोक पाई.

