मथुरा में वृंदावन की संकरी गलियों में हर दिन लाखों कदम ठाकुर बांके बिहारी के दर्शन के लिए बढ़ते हैं. भक्तों की इस भीड़ में आस्था, उत्साह और भक्ति का संगम दिखाई देता है, लेकिन इसी भीड़ के बीच एक ऐसा खतरा भी लगातार बढ़ रहा है, जिसकी चेतावनी कई वर्षों से दी जा रही है.
9 जून को बांके बिहारी मंदिर से लगभग 400 मीटर दूर गली नंबर-5 में एक जर्जर मकान का छज्जा गिरने से नौ श्रद्धालुओं के घायल होने की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर वृंदावन के पुराने भवनों और स्वयं बांके बिहारी मंदिर की संरचनात्मक सुरक्षा को लेकर प्रशासन और प्रबंधन कितने गंभीर हैं.
स्थानीय लोगों के अनुसार हादसे से पहले मकान के छज्जे में दरारें दिखाई दे रही थीं. कुछ लोगों का कहना है कि बंदरों के कूदने से छज्जा टूटा, जबकि अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक उस समय तेज आंधी चल रही थी. जो भी कारण रहा हो, परिणाम एक ही था. श्रद्धालुओं से भरी गली में अचानक मलबा गिरा और अफरा-तफरी मच गई. घायलों को अस्पताल भेजा गया और प्रशासन हरकत में आया. लेकिन इस घटना ने उन पुराने सवालों को फिर जीवित कर दिया है जिनका जवाब अभी तक नहीं मिला है.
हादसे के बाद जागा प्रशासन
मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने घटना के बाद लगभग एक दर्जन जर्जर भवनों के मालिकों को नोटिस जारी किए हैं. उन्हें 15 दिनों के भीतर भवनों की मरम्मत कराने के निर्देश दिए गए हैं. प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अगर निर्धारित समय में मरम्मत नहीं कराई गई तो उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 331(1) के तहत कार्रवाई और एफआईआर तक दर्ज की जा सकती है.
मथुरा के सामाजिक कार्यकर्ता अंगद सिंह का कहना है कि यह पहला मौका नहीं है जब वृंदावन के जर्जर भवनों ने श्रद्धालुओं की जान को खतरे में डाला हो. उन्होंने 15 अगस्त 2023 की उस दुखद घटना की याद दिलाई, जब वृंदावन में एक पुराना मकान गिरने से तीन महिलाओं सहित पांच श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी. उस हादसे के बाद भी 56 भवन मालिकों को नोटिस दिए गए थे. यानी समस्या नई नहीं है. सवाल यह है कि नोटिसों और चेतावनियों के बावजूद स्थिति में कितना सुधार हुआ.
मंदिर तक पहुंचने वाली गलियां खुद खतरे में
बांके बिहारी मंदिर तक पहुंचने वाली गलियां सदियों पुरानी बसावट का हिस्सा हैं. इन गलियों में बने अधिकांश मकान भी कई दशक पुराने हैं. समय के साथ इनमें कई बार मरम्मत हुई, कई जगह बिना किसी प्लानिंग के निर्माण हुए और कई भवनों में अतिरिक्त मंजिलें जोड़ दी गईं. लेकिन संरचनात्मक मजबूती का वैज्ञानिक परीक्षण शायद ही कभी हुआ.
स्थानीय निवासियों का कहना है कि बड़ी संख्या में भवनों में दरारें मौजूद हैं. बरसात के मौसम में दीवारों में नमी बढ़ जाती है और बंदरों की भारी संख्या अतिरिक्त खतरा पैदा करती है. वृंदावन में बंदरों का आतंक कोई नई बात नहीं है. छतों और छज्जों पर उनका लगातार आना-जाना कमजोर संरचनाओं के लिए गंभीर जोखिम बन चुका है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन्हीं संकरी गलियों से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु मंदिर तक पहुंचते हैं. किसी भी समय अगर कोई बड़ा हिस्सा गिरता है तो जनहानि की आशंका कई गुना बढ़ सकती है.
क्या बांके बिहारी मंदिर भी सुरक्षित है?
9 जून की घटना के बाद एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की तकनीकी जांच रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि डेढ़ सौ वर्ष से अधिक पुराने बांके बिहारी मंदिर के ढांचे में भी कई गंभीर संरचनात्मक समस्याएं मौजूद हैं. वर्ष 1864 में जनसहयोग से निर्मित मंदिर आज करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनाई गई उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति के पत्र पर ASI की टीम ने 16 अक्टूबर 2025 को मंदिर का निरीक्षण किया था.
इसके बाद दिसंबर में IIT, रुड़की की टीम ने भी निरीक्षण किया. लेकिन ASI की तरफ से किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि मंदिर के कई छज्जों और बालकनियों में दरारें हैं. कुछ स्थानों पर दीवारें भी कमजोर हो रही हैं. रिपोर्ट के अनुसार ये हिस्से भविष्य में खतरा बन सकते हैं अगर समय रहते मरम्मत नहीं की गई. रिपोर्ट में यह भी जिक्र किया गया है कि मंदिर की छत पर पानी की बड़ी-बड़ी टंकियां, RO प्लांट और लोहे के भारी ढांचे रखे गए हैं. इससे मूल संरचना पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐतिहासिक भवनों पर इस प्रकार का अतिरिक्त भार उनकी दीर्घकालिक स्थिरता को प्रभावित करता है.
बिना किसी प्लान के बदलावों ने बढ़ाया खतरा
ASI की जांच में मंदिर परिसर के भीतर किए गए कई अनियोजित परिवर्तनों पर भी सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट के अनुसार बिजली के तार, पाइपलाइन, लोहे की रॉड और गर्डर बिना किसी वैज्ञानिक योजना के लगाए गए हैं. सबसे गंभीर चिंता यह है कि मंदिर की धुलाई और साफ-सफाई में उपयोग होने वाले पानी की उचित निकासी नहीं है. विशेषज्ञों के अनुसार पानी लगातार भवन की नींव तक पहुंच रहा है, जिससे संरचना कमजोर हो सकती है. पुराने पत्थरों और चूने से बने भवनों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से नुकसानदेह मानी जाती है.
रिपोर्ट में प्रथम तल पर संचालित रसोई, भोग भंडार, बैंक और प्रशासनिक कार्यालयों को भी भवन पर अतिरिक्त दबाव बढ़ाने वाला बताया गया है. विशेषज्ञों ने इन गतिविधियों को अन्यत्र स्थानांतरित करने की सिफारिश की है. मंदिर की सुरक्षा को लेकर केवल ASI ही नहीं, बल्कि IIT, रुड़की के विशेषज्ञ भी चिंता जता चुके हैं.
भीड़ भी बन रही है चुनौती
बांके बिहारी मंदिर देश के सबसे अधिक भीड़ वाले धार्मिक स्थलों में शामिल है. विशेष अवसरों, त्योहारों और अधिक मास जैसे धार्मिक आयोजनों के दौरान यहां प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं. जानकार बताते हैं कि मंदिर का मूल ढांचा उस समय बनाया गया था जब इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की कल्पना भी नहीं की गई थी. आज हालात यह हैं कि मंदिर परिसर और उसके आसपास की गलियां क्षमता से कहीं अधिक दबाव झेल रही हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि निरंतर कंपन, भीड़ का दबाव और सीमित स्थान ऐतिहासिक संरचनाओं के लिए दीर्घकालिक खतरा बन सकते हैं. यही कारण है कि रिपोर्ट में मंदिर के आसपास के रास्तों को चौड़ा करने और श्रद्धालुओं की आवाजाही को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की सिफारिश की गई है.
पहले भी मिल चुकी हैं चेतावनियां
मंदिर की संरचनात्मक समस्याओं का इतिहास नया नहीं है. मंदिर के एक सेवायत के अनुसार वर्ष 2012 में भीड़ नियंत्रण के लिए रेलिंग लगाई गई थी. बाद में रेलिंग हटा दी गई लेकिन उसके लिए बनाए गए गड्ढों को ठीक ढंग से नहीं भरा गया. इस वजह से धुलाई का पानी फर्श के नीचे पहुंचने लगा. समय के साथ चूहों ने भी जमीन को खोखला कर दिया. वर्ष 2015 तक स्थिति ऐसी हो गई कि मंदिर प्रांगण में कई जगह धंसाव दिखाई देने लगा. कोविड काल के दौरान जब श्रद्धालुओं का प्रवेश सीमित हुआ, तब फर्श को नए सिरे से बनाना पड़ा था. यह घटनाक्रम बताता है कि छोटी दिखने वाली तकनीकी लापरवाहियां भी लंबे समय में गंभीर संरचनात्मक समस्याओं का कारण बन सकती हैं.
9 जून की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल भीड़ प्रबंधन पर्याप्त नहीं होगा. मंदिर तक पहुंचने वाले रास्तों, आसपास के जर्जर भवनों और मंदिर की भी संरचनात्मक सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी. प्रशासन ने नोटिस जारी कर दिए हैं, सुरक्षा बढ़ा दी गई है और विशेषज्ञों की रिपोर्ट भी उपलब्ध है. अब असली चुनौती इन सिफारिशों को जमीन पर लागू करने की है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वृंदावन की गलियों में किसी भी दिन फिर कोई छज्जा गिर सकता है और अगली बार नुकसान कहीं अधिक बड़ा हो सकता है.

