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उत्तराखंड में हाईवे के लिए सैकड़ों पेड़ों का कटना तय था फिर कैसे लगी रोक?

देहरादून एयरपोर्ट-ऋषिकेश हाईवे के लिए 3,300 से ज्यादा पेड़ काटे जाने थे. विरोध के बाद उत्तराखंड सरकार ने कटाई पर रोक लगा दी

सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 23 जुलाई , 2026

उत्तराखंड सरकार के भानियावाला-ऋषिकेश हाईवे को चौड़ा करने के लिए 3,300 से ज्यादा पेड़ों की कटाई पर अस्थाई रोक लगाने के फैसले से एक ऐसी परियोजना पर महत्वपूर्ण विराम लगा है, जो तेजी से राज्य के सबसे बड़े पर्यावरणीय विवादों में बदल गई थी. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यह घोषणा स्थानीय लोगों, पर्यावरणविदों, छात्रों और नागरिक समाज समूहों के कई दिनों तक चले विरोध प्रदर्शनों के बाद की.

प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि इस परियोजना से जंगल का पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील हिस्सा हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगा. इसके बाद सरकार ने पेड़ों की कटाई फिर से शुरू करने की अनुमति देने से पहले व्यापक विचार-विमर्श के जरिए इस मुद्दे की दोबारा समीक्षा करने का फैसला किया. हालांकि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) का कहना है कि कनेक्टिविटी सुधारने और ट्रैफिक जाम कम करने के लिए यह परियोजना जरूरी है. 

यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर उस सवाल को सामने लाता है, जिससे उत्तराखंड हाल के वर्षों में जूझता रहा है: पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील हिमालयी राज्य में बुनियादी ढांचे के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच सीमा कहां तय की जानी चाहिए?

प्रस्तावित परियोजना का उद्देश्य जॉली ग्रांट एयरपोर्ट, देहरादून और ऋषिकेश के बीच कनेक्टिविटी सुधारने के लिए भानियावाला-ऋषिकेश कॉरिडोर को चार या छह लेन के हाईवे में बदलना है. यह सड़क स्थानीय यातायात के साथ-साथ पर्यटन और तीर्थयात्रा के लिए भी एक महत्वपूर्ण कड़ी बनने की उम्मीद है. सरकार के मुताबिक परियोजना को जरूरी कानूनी और पर्यावरणीय मंजूरियां पहले ही मिल चुकी हैं और इसे उत्तराखंड हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार लागू किया जा रहा है. अधिकारियों का कहना है कि परियोजना में वन्यजीवों की दुर्घटनाएं कम करने के लिए 3.5 किलोमीटर लंबा हाथी अंडरपास और छोटे जानवरों की आवाजाही के लिए विशेष पुलिया जैसी पर्यावरणीय नुकसान को कम करने वाली व्यवस्थाएं भी शामिल हैं.

विरोध का मुख्य मुद्दा पारिस्थितिकी की दृष्टि से संवेदनशील शिवालिक क्षेत्र के हिस्से रानीपोखरी-ऋषिकेश वन प्रभाग में 3,300 से ज्यादा पेड़ों की प्रस्तावित कटाई थी. पर्यावरण समूहों का कहना था कि ये जंगल न केवल जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि भूजल रिचार्ज, स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने और पारिस्थितिक स्थिरता बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं. यह इलाका हाथियों की आवाजाही वाले कॉरिडोर समेत कई महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों का हिस्सा भी माना जाता है.

कई दिनों तक सैकड़ों स्थानीय लोगों, छात्रों और कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किए. उनकी मांग थी कि अधिकारी ऐसे वैकल्पिक इंजीनियरिंग समाधानों पर विचार करें, जिनमें कम पेड़ काटने पड़ें. कई प्रदर्शनकारियों ने पेड़ों को गले लगाकर और खुद को उनसे बांधकर प्रसिद्ध चिपको आंदोलन से जुड़े प्रतीकात्मक तरीकों का इस्तेमाल किया. प्रदर्शनकारियों के मजदूरों से पेड़ न काटने की अपील वाले वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर भी विरोध को गति मिली.

इस मुद्दे को राजनीतिक महत्व तब मिला, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बीते हफ्ते की शुरुआत में देहरादून के एक कार्यक्रम से लौटते समय पर्यावरण कार्यकर्ताओं के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की. प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के मुताबिक, उन्होंने राहुल को प्रस्तावित पेड़ कटाई और इसके पर्यावरणीय प्रभाव के बारे में जानकारी दी. उन्होंने कहा कि राहुल ने उन्हें भरोसा दिया कि वे यह मुद्दा संसद में उठाएंगे.

इसी बीच, ऋषिकेश के बरकोट रेंज में परियोजना क्षेत्र के पास सड़क हादसे में एक मादा सांभर की मौत ने वन्यजीव संरक्षण को लेकर बहस को और तेज कर दिया. बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच मुख्यमंत्री धामी ने घोषणा की कि सभी संबंधित पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श होने तक परियोजना के तहत पेड़ों की कटाई पर रोक जारी रहेगी. उन्होंने कहा कि पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों की चिंताओं को गंभीरता से लिया जा रहा है. उन्होंने प्रमुख सचिव और अन्य अधिकारियों को स्थानीय लोगों, निर्वाचित प्रतिनिधियों, पर्यावरण विशेषज्ञों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ नए सिरे से बातचीत शुरू करने का निर्देश दिया.

धामी ने कहा, "यह NHAI की एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजना है, जिसे हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार और सभी जरूरी कानूनी व पर्यावरणीय मंजूरियों और प्रक्रियाओं का पालन करते हुए लागू किया जा रहा था. हमारे लिए विकास जरूरी है, लेकिन जनता की भावनाओं, पर्यावरण और स्थानीय हितों को ध्यान में रखे बिना कोई फैसला नहीं लिया जाएगा."

धामी ने कहा कि आगे की कार्रवाई हाई कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह सम्मान करते हुए की जाएगी. साथ ही, सभी संबंधित पक्षों के साथ संतोषजनक सहमति बनने तक परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक जारी रहेगी. प्रदर्शनकारियों ने इस घोषणा का स्वागत किया है लेकिन उन्होंने साफ कर दिया है कि यह सिर्फ अस्थाई राहत है. उनका कहना है कि अंतिम फैसला होने तक वे परियोजना पर नजर बनाए रखेंगे.

यह विवाद उत्तराखंड में विकास परियोजनाओं को लेकर चल रहे विवादों की कड़ी में सबसे नया मामला है. हाल के वर्षों में स्थानीय लोगों और पर्यावरण समूहों ने किमाड़ी-मसूरी सड़क को चौड़ा करने की प्रस्तावित योजना का विरोध किया था, क्योंकि इसमें सैकड़ों पेड़, जिनमें पुराने बांज के पेड़ भी शामिल थे, काटे जाने थे. यह मामला आखिरकार उत्तराखंड हाई कोर्ट पहुंचा. अदालत ने इस बात की जांच करते हुए हिमालयी बांज के जंगलों के पारिस्थितिक महत्व पर जोर दिया कि क्या जरूरी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था.

पर्यटन के बुनियादी ढांचे, रोपवे परियोजनाओं, शहरी विस्तार और पूरे राज्य में जंगलों पर बढ़ते दबाव को लेकर भी ऐसी ही चिंताएं सामने आती रही हैं. अदालतों ने मसूरी वन प्रभाग के कुछ हिस्सों में जंगल की सीमा बताने वाले खंभों के गायब होने पर भी चिंता जताई है. वहीं, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में निर्माण गतिविधियों पर सवाल उठाए हैं.

यह बहस ऐसे समय में और तेज हो गई है, जब उत्तराखंड सड़क नेटवर्क, धार्मिक पर्यटन के बुनियादी ढांचे और शहरी विकास का विस्तार कर रहा है. दूसरी ओर, राज्य को जलवायु परिवर्तन, जंगलों में बढ़ती आग, बारिश के बदलते पैटर्न और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

फिलहाल, सरकार के फैसले से हाईवे परियोजना पर सिर्फ रोक लगी है, इसे रद्द नहीं किया गया है. इसके बाद होने वाले विचार-विमर्श से यह तय होने की संभावना है कि परियोजना अपने मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ेगी या पर्यावरणीय प्रभाव कम करने के लिए इसमें बदलाव किए जाएंगे.

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