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यूपी के अफसरों से क्यों खफा हैं अदालतें?

उत्तर प्रदेश में नोटिस से लेकर अवैध हिरासत तक, अदालतों की सख्ती ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर उठाए गंभीर सवाल

अफसरों के खिलाफ कोर्ट की सख्ती सिर्फ विरोध प्रदर्शनों तक सीमित नहीं है (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 10 सितंबर , 2026

उत्तर प्रदेश में अफसर इन दिनों अदालतों के सख्त सवालों के घेरे में हैं. मामला सिर्फ किसी एक अधिकारी की गलती या किसी एक जिले में प्रशासनिक चूक का नहीं है. बीते कुछ दिनों में अदालतों के सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों पर कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना कार्रवाई करने का आरोप है.

यह कार्रवाई ऐसी थी जिसके तहत नागरिकों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने, उपलब्ध सामग्री की स्वतंत्र जांच न करने और यहां तक कि अदालतों के पुराने निर्देशों की अनदेखी करने के आरोप भी सामने आए. 

इन मामलों में अदालतों की नाराजगी इतनी तीखी रही कि कहीं नोटिस वापस लेना पड़ा, कहीं अधिकारियों की सैलरी से मुआवजा वसूलने का आदेश हुआ और कहीं कोर्ट ने अफसरों के आचरण को उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया.

9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में गौतम बुद्ध नगर के 20 वर्षीय छात्र अक्षत त्रिपाठी का मामला इसी कड़ी में सामने आया. त्रिपाठी को जुलाई-अगस्त में दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के विरोध प्रदर्शन में कथित तौर पर शामिल होने के बाद ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया था. 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धाराओं 126 और 135 के तहत जारी नोटिस में उनसे शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपए के निजी मुचलके की मांग की गई थी. उन्हें 5 सितंबर को सूरजपुर में मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने को कहा गया था.

अक्षत त्रिपाठी को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया था
अक्षत त्रिपाठी को ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया था

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सीधे सवाल किया कि जब अदालत पहले ही संबंधित आदेश को रद्द कर चुकी थी और पहले से दर्ज FIR पर कोई कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दे चुकी थी, तब मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की. 

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद नोटिस वापस ले लिया गया. नोएडा पुलिस ने भी माना कि नोटिस त्रुटिपूर्ण था और इसे 5 सितंबर को ही रद्द कर दिया गया था. नोटिस जारी करने में शामिल कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू किए जाने की बात भी पुलिस ने कही. 

लेकिन इस पूरे प्रकरण ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है. क्या निवारक कानूनों का इस्तेमाल केवल आशंका के आधार पर किसी नागरिक को कठघरे में खड़ा करने के लिए किया जा सकता है? अक्षत का कहना है कि वे 20 जुलाई को जंतर-मंतर के प्रदर्शन में शामिल हुए थे और लाठीचार्ज में घायल भी हुए थे लेकिन 25 मई के बाद से यूनिवर्सिटी नहीं गए थे. 

मई के अंत में दो महीने की छुट्टियां घोषित होने के बाद वे हॉस्टल छोड़कर चले गए थे. इसके बाद करीब एक महीने तक उनकी कक्षाएं ऑनलाइन चलीं. जुलाई के लगभग पूरे महीने वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में इंटर्नशिप कर रहे थे. 

ऑफलाइन कक्षाएं 7 सितंबर को ही दोबारा शुरू हुईं. इसके बावजूद पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि अक्षत यूनिवर्सिटी के दूसरे छात्रों के बीच सरकार-विरोधी और गुमराह करने वाले बयान फैला रहे थे और उन्हें उकसा रहे थे, जिससे सार्वजनिक शांति भंग हो सकती थी. 

इसी रिपोर्ट के आधार पर मजिस्ट्रेट ने कहा कि दूसरी पार्टी की ओर से शांति भंग करने की प्रबल संभावना है. त्रिपाठी ने 5 सितंबर को अपने जवाब में कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों के लिए कोई प्रत्यक्ष और सत्यापन योग्य आधार नहीं दिया गया.

उनका सवाल था कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी कार्रवाई कैसे उचित हो सकती है. 9 सितंबर को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल करते हुए कहा कि उन्हें ऐसी कोई सामग्री नहीं बताई गई जिसके आधार पर उन्हें प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रखने का मौका मिलता.

यानी अदालत के सामने सवाल सिर्फ एक नोटिस का नहीं था. सवाल था कि प्रशासनिक कार्रवाई के पीछे ठोस सामग्री कितनी थी और संबंधित अधिकारी ने अपने विवेक का इस्तेमाल किस तरह किया.

कानूनों का मनमाना इस्तेमाल

अक्षत का मामला अकेला नहीं है. इसके दो दिन पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर के प्रशासनिक तंत्र के एक और मामले में बेहद कड़ी टिप्पणी की. 7 सितंबर को कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट यानी NSA के तहत हिरासत को रद्द कर दिया. 

आकृति चौधरी (फाइल फोटो)
आकृति चौधरी (फाइल फोटो)

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की डिवीजन बेंच ने अधिकारियों की सैलरी से 5 लाख रुपए वसूलने का आदेश दिया. कोर्ट ने माना कि आकृति की हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन थी. 

अदालत ने पाया कि जिन सामग्रियों के आधार पर उनके खिलाफ इतनी कठोर निवारक हिरासत की कार्रवाई की गई, वे NSA जैसे सख्त कानून के इस्तेमाल के लिए पर्याप्त नहीं थीं. 24 वर्षीय हिस्ट्री ग्रेजुएट आकृति चौधरी को अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था. 

उत्तर प्रदेश पुलिस ने 13 मई को उन पर और एक्टिविस्ट-पत्रकार सत्य वर्मा पर NSA लगाया था. हाई कोर्ट ने पाया कि आकृति के खिलाफ पुलिस फाइल में आरोप तो थे लेकिन उन्हें साबित करने के लिए ठोस सामग्री नहीं थी. कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत की जरूरत है या नहीं, यह तय करने से पहले गौतम बुद्ध नगर के DM को रिकॉर्ड की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए थी.

यही बात इस मामले को गंभीर बनाती है. प्रशासनिक अधिकारी केवल पुलिस की रिपोर्ट को आगे बढ़ाने वाली मशीन नहीं हो सकता. उसे उपलब्ध सामग्री का स्वतंत्र मूल्यांकन करना होता है. अदालत ने गौतम बुद्ध नगर के DM के व्यवहार को निंदनीय बताया और अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट की नाराजगी उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया. 

कोर्ट ने यह भी कहा कि आकृति का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और ऐसा कोई सबूत नहीं था कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी. अदालत के मुताबिक परिस्थितियों से ऐसा प्रतीत होता है कि हिरासत का उद्देश्य उन्हें एक उदाहरण बनाना और दूसरे लोगों को मजदूरों के समर्थन में बोलने तथा अपनी बात रखने की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने से रोकना था.

हाई कोर्ट की टिप्पणी इससे भी आगे गई. अदालत ने चेताया कि शांतिपूर्ण सार्वजनिक विरोध को सिर्फ इसलिए खतरा नहीं माना जा सकता कि उससे शांति भंग होने की आशंका जताई गई है. बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का संवैधानिक संरक्षण शांतिपूर्ण सभा और सामूहिक कार्रवाई तक फैला हुआ है.

नोएडा में मजदूरों की हड़ताल के मामले में आकृति चौधरी पर NSA लगाया गया था (फाइल फोटो)
नोएडा में मजदूरों की हड़ताल के मामले में आकृति चौधरी पर NSA लगाया गया था (फाइल फोटो)

2 सितंबर के आदेश में कोर्ट ने साफ किया कि पुलिस और नौकरशाहों का संवैधानिक दायित्व राजनीतिक कार्यपालिका के बजाय संविधान के प्रति है और लोकतंत्र में जनता ही मालिक है.

कोर्ट ने प्रक्रिया पर उठाया सवाल

आकृति चौधरी मामले में अदालत की नाराजगी सिर्फ NSA लगाने तक सीमित नहीं रही. कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी और BNSS की धारा 130 के तहत जारी नोटिस के समय को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए. रिकॉर्ड के मुताबिक चौधरी को 11 अप्रैल की शाम करीब 5.30 बजे बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से हिरासत में लिया गया था, जबकि राज्य सरकार ने उनकी गिरफ्तारी की तारीख 12 अप्रैल बताई. 

सरकार ने BNSS की धारा 130 के तहत जारी नोटिस का हवाला दिया. लेकिन उस नोटिस में जनरल डायरी यानी GD एंट्री नंबर 37 का उल्लेख था जो 12 अप्रैल को सुबह 10.20 बजे बनाई गई थी. 

जस्टिस अतुल श्रीधरन ने सवाल उठाया कि यदि नोटिस में जिस GD एंट्री का उल्लेख है, वह गिरफ्तारी के अगले दिन दर्ज हुई तो क्या नोटिस गिरफ्तारी के बाद तैयार किया गया था? कोर्ट के मुताबिक धारा 130 के तहत नोटिस देने की प्रक्रिया गिरफ्तारी के बाद की गई और यह केवल एक दिखावा था. 

अदालत ने यह भी कहा कि नोटिस में जारी किए जाने का समय जानबूझकर नहीं बताया गया. यह टिप्पणी प्रशासनिक कार्रवाई की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी पर सवाल उठाती है : प्रक्रिया. 

कानून में पुलिस और प्रशासन को मिली शक्तियां असीमित नहीं हैं. खासकर जब कार्रवाई किसी नागरिक की स्वतंत्रता को प्रभावित करती हो, तब हर चरण में निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि NSA के तहत निवारक हिरासत एक अपवाद है और इसका इस्तेमाल सामान्य आपराधिक कानून के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता. 

अदालत ने चौधरी के खिलाफ हिरासत के आधारों को बार-बार दोहराए गए अटकलों पर आधारित और केवल राय पर आधारित बताया. कोर्ट के मुताबिक इन निष्कर्षों का समर्थन करने वाला ठोस सबूत नहीं था. 

इस मामले में अदालत ने यह संदेश भी दिया कि अधिकारी सिर्फ यह कहकर नागरिक स्वतंत्रता सीमित नहीं कर सकते कि भविष्य में शांति भंग हो सकती है. यदि आशंका को ही पर्याप्त आधार मान लिया जाए तो शांतिपूर्ण विरोध, सभा और अभिव्यक्ति की संवैधानिक आजादी का अर्थ ही खत्म हो जाएगा.

थाने में CCTV नहीं तो जवाबदेही किसकी?

अदालतों की नाराजगी केवल राजनीतिक गतिविधियों या विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों तक सीमित नहीं है. देवरिया के गौरी बाजार थाने का मामला पुलिस की रोजमर्रा की कार्यशैली और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है. 

इलाहाबाद हाई कोर्ट में महेंद्र गौड़ की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान आरोप लगाया गया कि तीन महिलाओं समेत चार लोगों को 13 से 24 अप्रैल के बीच गौरी बाजार थाने में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया. कुछ लोगों को करीब 10 दिन तक थाने में रखे जाने का आरोप था. 

सुनवाई के दौरान अदालत ने थाने के CCTV कैमरों की फुटेज मांगी. पुलिस की ओर से जवाब आया कि संबंधित अवधि में बिजली नहीं थी और जनरेटर खराब था, इसलिए रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं हो सकी. कोर्ट ने इस दलील को अविश्वसनीय माना. 

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक थानों में CCTV कैमरे 24 घंटे चालू रखने और फुटेज का बैकअप सुरक्षित रखने की व्यवस्था अनिवार्य है. हाई कोर्ट ने कहा कि CCTV और बैकअप की व्यवस्था का काम न करना पुलिस अधीक्षक की ओर से कर्तव्य निर्वहन में गंभीर लापरवाही है. 

सुनवाई के दौरान अदालत की मौखिक टिप्पणी भी बेहद तल्ख रही. पुलिस की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने अधिकारियों को 'झूठों का झुंड' तक कह दिया. अदालत ने चारों याचिकाकर्ताओं को कुल 65 हजार रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया. अर्चना गौड़, नंदिनी गौड़ और इन्नी को 20-20 हजार रुपए तथा महेंद्र गौड़ को 5 हजार रुपए दिए जाने हैं. 

खास बात यह रही कि मुआवजे की रकम थानाध्यक्ष के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया गया. यह आदेश पुलिस तंत्र में जवाबदेही के सवाल को सीधे अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी से जोड़ता है. सरकारी मशीनरी की गलती का भुगतान हमेशा सरकारी खजाने से ही हो यह जरूरी नहीं. 

यदि कोर्ट को लगता है कि किसी अधिकारी की लापरवाही या गैरकानूनी कार्रवाई के कारण नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदार अधिकारी से रकम वसूली जा सकती है. जून में हाई कोर्ट ने अवैध हिरासत के मामलों में इससे भी व्यापक सिद्धांत सामने रखा था. 

अदालत ने कहा था कि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक अवैध रूप से हिरासत में रखने पर 25 हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा देना होगा और यह रकम दोषी पाए गए मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी के वेतन से वसूल की जाएगी.

लखनऊ के वरिष्ठ एडवोकेट शैलेंद्र कुमार सिंह कहते हैं, “इन तीन मामलों को साथ रखकर देखें तो अदालतों की नाराजगी के पीछे चार बड़े सवाल साफ दिखाई देते हैं. पहला, क्या पुलिस या प्रशासन की रिपोर्ट को बिना स्वतंत्र जांच के कार्रवाई का आधार बनाया जा रहा है? दूसरा, क्या निवारक कानूनों का इस्तेमाल ठोस सामग्री के बजाय आशंका और अनुमान के आधार पर हो रहा है? तीसरा, क्या गिरफ्तारी और नोटिस की कानूनी प्रक्रिया का निर्धारित क्रम कायम रखा जा रहा है? और चौथा, क्या थानों तथा प्रशासनिक कार्यालयों में ऐसी निगरानी व्यवस्था मौजूद है, जिससे नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही तय हो सके?” 

अक्षत त्रिपाठी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सवाल के बाद नोटिस वापस लेना पड़ा. आकृति चौधरी मामले में हाई कोर्ट ने NSA की हिरासत रद्द करते हुए अधिकारियों की सैलरी से 5 लाख रुपए वसूलने का आदेश दिया. 

देवरिया में अवैध हिरासत के मामले में थानाध्यक्ष के वेतन से 65 हजार रुपये वसूलने को कहा गया. इन आदेशों में एक साझा संदेश है : कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी अधिकारियों को मिली है लेकिन उस जिम्मेदारी के नाम पर कानून की प्रक्रिया को दरकिनार करने की छूट नहीं है.

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