उत्तर प्रदेश के अलग अलग जिलों से सामने आ रहे मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद संक्रमण और रोशनी चले जाने के मामलों ने प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है. गोरखपुर के सिकरीगंज से शुरू हुई यह कहानी अब अलीगढ़ तक पहुंच चुकी है.
सवाल सिर्फ एक अस्पताल या एक डॉक्टर का नहीं है, बल्कि उस सिस्टम का है जिसमें बड़ी संख्या में आंखों के ऑपरेशन किए जा रहे हैं, लेकिन संक्रमण नियंत्रण, सर्जिकल मानक और निगरानी पर गंभीर खामियां सामने आ रही हैं.
गोरखपुर : एक दिन के ऑपरेशन, कई ज़िंदगियों पर पड़े भारी
गोरखपुर के सिकरीगंज स्थित न्यू राजेश हाईटेक हॉस्पिटल में एक फरवरी 2025 को आयुष्मान योजना के तहत 30 मरीजों के मोतियाबिंद ऑपरेशन किए गए. यह एक नियमित सर्जिकल दिन माना जा रहा था. अधिकतर मरीज आसपास के ग्रामीण इलाकों से आए थे. किसी को पास का काम करने में दिक्कत थी, किसी को धुंधलापन. ऑपरेशन के बाद उन्हें सामान्य सलाह देकर घर भेज दिया गया. लेकिन अगले ही दिन कई मरीजों की आंखों में तेज दर्द, सूजन और लालिमा शुरू हो गई. दो दिन के भीतर हालात गंभीर होने लगे. अब तक 18 से अधिक मरीज संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं. नौ मरीजों की आंखें निकालनी पड़ीं और करीब दस की रोशनी चली गई.
संतकबीरनगर की वहिदुन्निशा का मामला इस त्रासदी की मानवीय तस्वीर सामने रखता है. उन्हें दूर का साफ दिखता था, बस पास का बारीक काम करने में दिक्कत थी. जांच के बाद दाहिनी आंख में मोतियाबिंद बताकर ऑपरेशन कर दिया गया. दो दिन बाद दोनों आंखों में संक्रमण फैल गया. हालत बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली एम्स भेजा गया. डॉक्टरों ने परिजनों से कहा कि थोड़ी भी देर होती तो दूसरी आंख भी चली जाती. बाईं आंख बच गई, लेकिन ऑपरेशन वाली दाहिनी आंख की रोशनी खत्म हो गई.
वहिदुन्निशा अब भी फॉलोअप के लिए दिल्ली में हैं. उनका आरोप है कि ऑपरेशन करने वाले अस्पताल ने बाद में कोई संपर्क नहीं किया. बारीगांव, इन्नाडीह, रहदौली, उसरी खास, बनकटा और आसपास के गांवों के कई मरीजों की आंखें संक्रमण के कारण निकालनी पड़ीं. परिजनों में गहरा आक्रोश है. उनका कहना है कि अगर समय रहते संक्रमण को पहचाना जाता और अस्पताल ने जिम्मेदारी ली होती तो नुकसान कम हो सकता था.
जांच में जो सामने आया, वह और चिंताजनक है. मजिस्ट्रियल जांच में ऑपरेशन थिएटर में बैक्टीरियल संक्रमण की पुष्टि हुई. सर्जरी ट्रे में रखे औजारों के नमूनों में संक्रमण पाया गया. ऑपरेशन मशीन के बटन पर घातक स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया मिला. बीआरडी मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी रिपोर्ट में बैक्टीरिया पॉजिटिव आया. जांच रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि स्टरलाइजेशन की प्रक्रिया मानक के अनुरूप नहीं थी. जहां ऑपरेशन थिएटर में ही औजारों का सेनेटाइजेशन होना चाहिए, वहां अस्पताल में अलग कमरे में यह प्रक्रिया की जा रही थी.
जिला प्रशासन ने रिपोर्ट के आधार पर लाइसेंस निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. जिलाधिकारी दीपक मीणा ने साफ कहा है कि अगर पीड़ित शिकायत दर्ज कराते हैं तो आपराधिक मुकदमा भी दर्ज किया जाएगा. जिला प्रशासन का पक्ष है कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी. अधिकारियों का कहना है कि जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, उनके आधार पर कठोर कार्रवाई की जाएगी. स्वास्थ्य विभाग ने भी अपनी अलग जांच कर रिपोर्ट सौंपी है. प्रभावित मरीजों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं और क्षतिपूर्ति के विकल्पों पर विचार हो रहा है.
अलीगढ़ : ऑपरेशन के बाद रोशनी नहीं लौटी
गोरखपुर का मामला अभी थमा भी नहीं था कि अलीगढ़ के दीन दयाल उपाध्याय (डीडीयू) संयुक्त चिकित्सालय से भी शिकायतें सामने आने लगीं. दिसंबर से जनवरी के बीच हुए कई ऑपरेशनों के बाद मरीजों ने आरोप लगाया कि उन्हें पहले से कम दिखने लगा या बिल्कुल दिखाई देना बंद हो गया. कुछ ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई. कई मरीजों ने वीडियो जारी कर कहा कि ऑपरेशन से पहले आंशिक दिक्कत थी, लेकिन सर्जरी के बाद हालत बिगड़ गई.
कुछ मरीजों को मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, जहां कथित रूप से केस लेने से मना कर दिया गया. अस्पताल प्रशासन का कहना है कि शासन स्तर से जांच के आदेश आए हैं और तीन डॉक्टरों की कमेटी गठित कर दी गई है. सीएमएस डा. एम. के. माथुर का कहना है कि लिखित शिकायतें सीमित हैं, लेकिन मामले की जांच निष्पक्ष रूप से की जा रही है.
यहां विवाद संक्रमण के साथ साथ सर्जिकल दक्षता को लेकर भी है. आरोप है कि संबंधित सर्जन ने लंबे समय तक ऑपरेशन नहीं किए थे और बाद में ट्रेनिंग के बाद सर्जरी शुरू की. प्रशासनिक दबाव और लक्ष्य पूरा करने की बाध्यता भी चर्चा में है. अस्पताल प्रशासन का कहना है कि डॉक्टरों को आवश्यक ट्रेनिंग दिलाई गई और सभी प्रक्रियाएं नियमों के तहत की गईं. उनका तर्क है कि हर सर्जरी में जोखिम होता है और सभी मामलों में लापरवाही साबित नहीं होती.
क्यों बढ़ रही हैं गड़बड़ियां?
विशेषज्ञों का कहना है कि मोतियाबिंद का ऑपरेशन आमतौर पर सुरक्षित प्रक्रिया मानी जाती है. आधुनिक फेको तकनीक में कुछ मिनटों में लेंस बदला जाता है और मरीज जल्दी ठीक हो जाता है. लेकिन संक्रमण हो जाए, विशेषकर एंडोफ्थैल्माइटिस जैसा गंभीर संक्रमण, तो 24 से 48 घंटे में स्थाई नुकसान हो सकता है. लखनऊ के एक वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर एक ही दिन में कई मरीजों में समान लक्षण दिखें तो तुरंत ऑपरेशन रोककर ओटी सील करना चाहिए और माइक्रोबायोलॉजिकल जांच करानी चाहिए. उनके अनुसार संक्रमण का स्रोत अक्सर स्टरलाइजेशन की चूक या दूषित उपकरण होते हैं.
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि “हाई वॉल्यूम सर्जरी” मॉडल में जोखिम बढ़ जाता है. आयुष्मान योजना और सरकारी लक्ष्यों के तहत एक दिन में बड़ी संख्या में ऑपरेशन किए जाते हैं. अगर ओटी प्रबंधन और स्टाफ पर्याप्त प्रशिक्षित न हो तो संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है. एक वरिष्ठ सरकारी नेत्र सर्जन का कहना है कि कई जिलों में इन्फेक्शन कंट्रोल ऑडिट नियमित रूप से नहीं होते. संक्रमण सामने आने के बाद ही जांच शुरू होती है. डॉक्टरों का एक वर्ग यह भी स्वीकार करता है कि कानूनी जोखिम और मीडिया जांच के डर से कुछ सर्जन जटिल केस लेने से बचते हैं. उनका कहना है कि ऑपरेशन के दौरान कई स्तर शामिल होते हैं, लेकिन जिम्मेदारी अक्सर अकेले सर्जन पर आ जाती है.
स्टरलाइजेशन, ओटी प्रबंधन और उपकरण रखरखाव में अलग अलग टीमें जुड़ी होती हैं. अगर संसाधन सीमित हों और लक्ष्य ऊंचे, तो दबाव बढ़ता है. सरकारी अधिकारियों का पक्ष है कि राज्य में मोतियाबिंद ऑपरेशन की संख्या बहुत अधिक है और अधिकांश सफल होते हैं. उनका कहना है कि कुछ मामलों को आधार बनाकर पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाना उचित नहीं है, लेकिन जहां भी लापरवाही मिलेगी, कार्रवाई होगी. स्वास्थ्य विभाग ने जिलों को इन्फेक्शन कंट्रोल प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए हैं. कई जगह ओटी ऑडिट और रिफ्रेशर ट्रेनिंग कार्यक्रम शुरू किए गए हैं.
कार्रवाई के स्तर पर देखा जाए तो गोरखपुर में लाइसेंस निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. यदि आपराधिक लापरवाही साबित होती है तो संबंधित डॉक्टरों और प्रबंधन पर मुकदमा दर्ज हो सकता है. अलीगढ़ में जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी. पीड़ितों के लिए मुआवजे की मांग भी उठ रही है.
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या केवल कार्रवाई से समस्या हल होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि संरचनात्मक सुधार जरूरी है. हर बड़े सर्जिकल सेंटर में नियमित माइक्रोबायोलॉजी सर्विलांस, ओटी की समय समय पर स्वैब जांच, स्टरलाइजेशन प्रक्रिया का डिजिटल रिकॉर्ड, और सर्जनों के लिए न्यूनतम वार्षिक सर्जिकल प्रैक्टिस मानक तय होना चाहिए. जटिल केस के लिए स्पष्ट रेफरल प्रोटोकॉल और मरीजों के लिए पारदर्शी शिकायत तंत्र भी जरूरी है.

