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उपेंद्र कुशवाहा बन पाएंगे बिहार की राजनीति के अगले नीतीश कुमार?

आज बिहार में नीतीश की राजनीतिक सोच को आगे ले जाने वाले नेताओं में उपेंद्र कुशवाहा सबसे मजबूत दावेदार नजर आते हैं

उपेंद्र कुशवाहा (फाइल फोटो)
अपडेटेड 7 सितंबर , 2026

बिहार की राजनीति में 21 अगस्त के बाद से हलचल मची हुई है क्योंकि राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने राजगीर में अपनी पार्टी की तीन दिन की बैठक के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत का सवाल छेड़ दिया.

बिहार की राजनीति में अभी ऊपर से सब कुछ सामान्य दिख रहा है लेकिन अंदर ही अंदर नीतीश कुमार के बाद उनकी राजनीतिक जगह कौन लेगा, इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई है. नीतीश अब राज्य की राजनीति के बीच में नहीं हैं. ऐसे में उनकी जगह को लेकर अभी खुलकर कोई मुकाबला नहीं है लेकिन नेताओं ने इसके लिए दावेदारी शुरू कर दी है.

RLM के कार्यक्रम में उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश की राजनीतिक विरासत को लेकर अपनी बात रखी. उन्होंने बताया कि नीतीश की छोड़ी हुई राजनीतिक जगह को आगे कौन संभाल सकता है. उपेंद्र कुशवाहा ने खुद को सीधे तौर पर नीतीश का उत्तराधिकारी नहीं बताया लेकिन उनकी बातों से साफ था कि वे इस भूमिका के लिए खुद को एक दावेदार के तौर पर देख रहे हैं.

नीतीश अब मुख्यमंत्री नहीं हैं, ऐसे में कई नेता और आम लोग यह सोचने लगे हैं कि इतने लंबे समय तक नीतीश ने जिस राजनीतिक जगह को संभाला, अब उसका क्या होगा. इस जगह पर कई लोग अपना दावा कर सकते हैं. उपेंद्र कुशवाहा ने अभी खुद को नीतीश का उत्तराधिकारी नहीं बताया है. लेकिन कई लोग चाहते हैं कि नीतीश के बाद उपेंद्र कुशवाहा इस जगह को संभालें.

BJP के साथ जाने से पहले उपेंद्र कुशवाहा जनता परिवार की पार्टियों के साथ रह चुके हैं (फाइल फोटो)
BJP के साथ जाने से पहले उपेंद्र कुशवाहा जनता परिवार की पार्टियों के साथ रह चुके हैं (फाइल फोटो)

नीतीश के बाद कौन उनकी जगह लेगा, सवाल सिर्फ इतना नहीं है. असली सवाल है कि नीतीश के बाद उनकी राजनीतिक सोच और परंपरा को कौन आगे बढ़ाएगा. खासकर पिछड़ी जातियों और समाजवादी राजनीति की वह जगह, जिसने नीतीश को RJD और BJP दोनों से अलग पहचान बनाने में मदद की.

यहीं पर उपेंद्र कुशवाहा की बात आती है. आज बिहार में नीतीश की राजनीतिक सोच को आगे ले जाने वाले नेताओं में उपेंद्र कुशवाहा सबसे मजबूत दावेदार नजर आते हैं. नीतीश की तरह उपेंद्र कुशवाहा भी कर्पूरी ठाकुर, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की समाजवादी सोच से जुड़े रहे हैं.

वे पिछड़ी जातियों को साथ लेकर चलने वाली राजनीति को भी अच्छी तरह समझते हैं. इसमें कुर्मी और कोइरी यानी लव-कुश की जोड़ी की अहम भूमिका रही है. सबसे खास बात यह है कि उपेंद्र कुशवाहा कई सालों से बिहार की इसी राजनीति का हिस्सा रहे हैं. वह इस राजनीति में बाद में आकर अपना दावा करने वाले नेता नहीं हैं.

उपेंद्र कुशवाहा सरकार में रह चुके हैं, राजनीतिक संगठनों को बनाया और चलाया है. उन्होंने BJP और जनता परिवार, दोनों के साथ गठबंधन किए हैं और अपनी अलग राजनीतिक पहचान भी बनाए रखी है. उनकी पहचान सिर्फ पिछड़ी जाति के नेता या नीतीश के पुराने साथी तक सीमित नहीं है. वे उस राजनीतिक जगह को भी समझते हैं, जहां नीतीश लंबे समय तक रहे.

नीतीश की तरह वे पिछड़ी जातियों को साथ लेकर राजनीति करते हैं, समाजवादी सोच की बात करते हैं और अलग-अलग दलों के साथ गठबंधन भी कर चुके हैं. वे पिछड़े वर्गों के साथ-साथ मध्यम वर्ग के लोगों से भी जुड़ सकते हैं. इन लोगों को नीतीश के अच्छे शासन का भरोसा पसंद आया था.

अगर बिहार में अगला ‘नीतीश’ कोई बन सकता है तो उपेंद्र कुशवाहा का दावा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बल्कि नीतीश के राजनीति करने के तरीके को आगे बढ़ाने पर है. इसी वजह से नीतीश इतने लंबे समय तक बिहार की राजनीति में बने रहे.

JDU नीतीश के उत्तराधिकारी के रूप में निशांत कुमार पर दांव लगा रही है (फाइल फोटो)
JDU नीतीश के उत्तराधिकारी के रूप में निशांत कुमार पर दांव लगा रही है (फाइल फोटो)

हालांकि, उपेंद्र कुशवाहा ने राजनीतिक विरासत को अलग तरीके से बताया है. उनके लिए विरासत का मतलब किसी की कुर्सी संभालना या एक पीढी से दूसरी पीढ़ी को राजनीतिक ताकत मिलना नहीं है. उनके लिए असली विरासत किसी के विचारों और राजनीतिक सोच को आगे ले जाना है. इसी वजह से उन्होंने कर्पूरी ठाकुर और राम मनोहर लोहिया का जिक्र किया. उनका मानना है कि नीतीश की असली विरासत उनकी समाजवादी राजनीति है. नीतीश ने इस सोच को आगे बढ़ाया और बिहार की राजनीति में इसे जगह दिलाई. अब जो भी नीतीश की विरासत को आगे ले जाने की बात करेगा, उसे यह दिखाना होगा कि वह इन विचारों को आगे बढ़ा सकता है.

यह फर्क जरूरी है क्योंकि नीतीश की पार्टी JDU का इस सवाल पर जवाब अलग है. पार्टी के नेता अब स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को बिहार के अगले बड़े नेता के तौर पर आगे कर रहे हैं. इसकी वजह यह है कि निशांत, नीतीश के बेटे हैं और परिवार की राजनीति को आगे ले जाने वाले सबसे बड़े दावेदार माने जा रहे हैं. लेकिन किसी बड़े नेता का बेटा होना और उसकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाना एक बात नहीं है.

निशांत को अभी अपनी अलग पहचान बनानी है, लोगों के बीच अपनी जगह बनानी है और उनका भरोसा जीतना है. राजनीति में आगे बढ़ने वाले हर नेता के सामने एक दिन यह चुनौती आती है. राजनीति में किसी बड़े नेता का परिवार किसी को आगे बढ़ने का मौका दे सकता है लेकिन सिर्फ परिवार के नाम से लोगों का भरोसा नहीं जीता जा सकता.

निशांत अपनी पारिवारिक पहचान से आगे बढ़कर अपनी अलग जगह बना पाते हैं या नहीं, यह उनके काम, समय और लोगों से उनके जुड़ाव से तय होगा. JDU की बातों से यह भी लगता है कि पार्टी को इस बात की चिंता है.

अगर नीतीश के बाद उनकी राजनीतिक जगह सिर्फ JDU में ही तय होनी होती तो किसी दूसरे नेता के आगे आने से पार्टी को इतनी चिंता नहीं होती. उपेंद्र कुशवाहा की बात इसलिए खास है क्योंकि वे नीतीश की मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मांग रहे हैं. वे उस राजनीतिक जगह को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जो नीतीश के बाद खाली हो सकती है.

विरासत में क्या है

नीतीश की राजनीतिक विरासत की बात करें तो इसमें तीन चीजें शामिल हैं. पहली है अच्छा काम और बेहतर शासन यानी सुशासन. इसमें सड़क और स्कूल बनवाना, स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल देना और यह बताना शामिल है कि 2005 में नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार 1990 के दशक यानी RJD के शासन जैसा नहीं रहा.

कामकाज, सामाजिक समीकरण और विचारधारा मिलकर नीतीश कुमार की विरासत बनाते हैं (फाइल फोटो)
कामकाज, सामाजिक समीकरण और विचारधारा मिलकर नीतीश कुमार की विरासत बनाते हैं (फाइल फोटो)

दूसरी है, कई पिछड़ी जातियों को साथ लेकर चलना. इसमें कुर्मी, कोइरी-कुशवाहा, अति पिछड़ी जातियां और महादलितों का एक हिस्सा शामिल था. इससे JDU को BJP और RJD के बीच अपनी अलग जगह बनाने में मदद मिली.

तीसरी चीज, नीतीश से पहले की समाजवादी राजनीति है. इसमें राम मनोहर लोहिया की पिछड़ी जातियों को आगे लाने की सोच, जयप्रकाश नारायण का पूरी व्यवस्था में बदलाव का आंदोलन और कर्पूरी ठाकुर की समाजवादी सोच शामिल है. कर्पूरी ठाकुर की राजनीति किसी एक जाति तक सीमित नहीं थी.

उपेंद्र कुशवाहा इसी तीसरी राजनीतिक ताकत को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. वे ऐसी राजनीति की बात कर रहे हैं जो पिछड़ी जातियों और समाजवादी सोच के साथ हो और जो RJD या BJP, दोनों से अलग हो.

खाली है जगह?

पटना की राजनीति में अब नीतीश पहले जैसी भूमिका में नहीं हैं. वे अब मुख्यमंत्री नहीं हैं. वे JDU के अध्यक्ष हैं और राज्यसभा में भी हैं लेकिन बिहार की सरकार अब उनकी सहयोगी BJP चला रही है. JDU अब उस गठबंधन में छोटी पार्टी है, जिसका नेतृत्व पहले वह करती थी. ऐसे समय में तीसरी राजनीतिक ताकत या तो अपनी नई आवाज बनाती है या फिर बड़ी पार्टी के साथ मिलकर अपनी अलग पहचान खो देती है.

पार्टी में अभी नीतीश के बाद आगे बढ़ने की तस्वीर परिवार के आसपास ही दिख रही है. निशांत के पास मंत्री पद है और पार्टी के कार्यकर्ताओं का समर्थन भी है. संजय झा और विजय कुमार चौधरी BJP के साथ पार्टी के रिश्ते संभाल रहे हैं. इससे पार्टी चलती रह सकती है लेकिन इससे नीतीश की वह अलग समाजवादी राजनीति अपने आप आगे नहीं बढ़ती, जिसमें वे BJP के साथ रहते हुए भी उसकी राजनीति का हिस्सा नहीं बने थे.

उपेंद्र कुशवाहा का दावा

उपेंद्र कुशवाहा को देखें तो वे इस राजनीतिक जगह के लिए JDU के मौजूदा बड़े नेताओं से ज्यादा सही नजर आते हैं. वे भी नीतीश और लालू प्रसाद यादव की तरह कर्पूरी ठाकुर, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की समाजवादी राजनीति से जुड़े रहे हैं. वे बाद में राजनीति में आए नेता नहीं हैं जो सिर्फ गठबंधन संभालने का काम करते हैं.

उन्होंने समता पार्टी और JDU को खड़ा करने में मदद की थी. नीतीश ने एक समय उन्हें बिहार में विपक्ष का नेता भी बनाया था. उपेंद्र कुशवाहा कोइरी समाज के बड़े नेता हैं. ऐसे गठबंधन के लिए लव-कुश की जोड़ी अब भी जरूरी है, अगर गठबंधन सिर्फ BJP के वोट बैंक तक सीमित नहीं रहना चाहता.

उपेंद्र कुशवाहा का अपना राजनीतिक संगठन है और NDA के साथ रहते हुए वे राज्यसभा सांसद भी हैं. इसलिए वे समाजवाद की बात अपनी तरह से कर सकते हैं. उन्हें JDU के नेता के तौर पर किसी के निर्देश पर चलने की जरूरत नहीं है. वे 65 फीसदी OBC आरक्षण और शिक्षा आयोग की बात करते हैं. इसके जरिए वे नीतीश के अधूरे कामों को सिर्फ पुरानी बातों के तौर पर नहीं बल्कि आगे किए जाने वाले काम के तौर पर सामने रख रहे हैं.

नीतीश ने जिन नेताओं को पार्टी चलाने की जिम्मेदारी दी, उनकी तुलना में उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक पृष्ठभूमि इस जगह के लिए ज्यादा सही दिखती है. संजय झा और विजय कुमार चौधरी पार्टी को चलाने और संगठन संभालने का काम करते हैं लेकिन उनका जुड़ाव उस सामाजिक और राजनीतिक वर्ग से नहीं है, जिसके बीच से नीतीश की राजनीति आगे बढ़ी थी.

वे पार्टी को संभाल सकते हैं, BJP से बात कर सकते हैं और गठबंधन में छोटी पार्टी के तौर पर JDU को चला सकते हैं लेकिन उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि ऐसी नहीं है कि वे लोहिया और कर्पूरी ठाकुर की समाजवादी राजनीति की अगली आवाज बन सकें. यही राजनीति कभी JDU को BJP और RJD से अलग एक तीसरी ताकत बनाती थी.

निशांत के पास अभी JDU का सबसे मजबूत सहारा है. वे नीतीश के बेटे हैं. किसी ऐसे दल में, जहां नेता की अपनी पहचान बहुत मायने रखती है, यह छोटी बात नहीं है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि निशांत की अपनी समाजवादी राजनीतिक पहचान भी बन गई है. उन्होंने अभी उतने साल राजनीति में काम नहीं किया है. न ही उन्होंने कोई बड़ा राजनीतिक गठबंधन खड़ा किया है. लोगों से सीधे जुड़कर बात करने और उन्हें अपने साथ जोड़ने का अनुभव भी अभी कम है.

नीतीश की पहचान सिर्फ उनके परिवार से नहीं बनी थी. उनकी पहचान उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा और लोगों से जुड़ने के तरीके से बनी थी. परिवार के नाम से कोई पार्टी आगे बढ़ाई जा सकती है लेकिन सिर्फ परिवार के नाम से राजनीतिक सोच और परंपरा आगे नहीं बढ़ती.

लव-कुश वोटों को अपने साथ बनाए रखने के लिए उपेंद्र कुशवाहा BJP के काम आ सकते हैं. इससे नीतीश की राजनीतिक विरासत पर उपेंद्र कुशवाहा का दावा और भी खास हो जाता है. अगर देखा जाए तो उपेंद्र कुशवाहा के पास यह दावा करने की ज्यादा वजह है जबकि किसी दूसरे नेता की एकमात्र खासियत सिर्फ यह है कि वह नीतीश के करीब रहा है.

उपेंद्र कुशवाहा भी उसी समाजवादी राजनीति से आए हैं, जिसने नीतीश की राजनीति को बनाया. इसमें कर्पूरी ठाकुर, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की सोच शामिल है. अपने राजनीतिक जीवन के ज्यादातर समय में उपेंद्र कुशवाहा भी इसी सामाजिक और राजनीतिक वर्ग के बीच काम करते रहे हैं.

वे उस दौर में सबसे बड़े कोइरी नेता हैं जब बिहार की पिछड़ी जातियों की राजनीति में लव-कुश की जोड़ी अब भी अहम है. सबसे जरूरी बात यह है कि उपेंद्र कुशवाहा नीतीश का पद संभालने की कोशिश नहीं कर रहे हैं. वे उस राजनीतिक जगह को आगे ले जाना चाहते हैं, जो नीतीश के पास थी. इस राजनीति में पिछड़ी जातियों को आगे लाना, समाजवाद की सोच, अच्छा शासन और BJP और RJD के बीच अपनी अलग जगह बनाए रखना शामिल था.

उपेंद्र कुशवाहा इस राजनीति के दोनों पक्षों के साथ काम कर चुके हैं. उन्होंने अपना संगठन बनाया, अपने दम पर चुनाव लड़ा और बार-बार गठबंधन बदलने के बाद भी राजनीति में अपनी जगह बनाए रखी. उनके इस राजनीतिक सफर की वजह से उनके पास सिर्फ एक सरनेम या परिवार से जुड़ाव नहीं है. उनके पास राजनीति में काम करने का लंबा अनुभव है. इसी वजह से वे कह सकते हैं कि वह उस सामाजिक वर्ग और राजनीतिक सोच को समझते हैं, जिस पर नीतीश की राजनीति टिकी रही है.

यह सही है कि उपेंद्र कुशवाहा यह दावा नहीं कर रहे हैं कि नीतीश की राजनीतिक विरासत पर सिर्फ उनका ही हक है. उनका कहना है कि इसे आगे ले जाने की कोशिश करने वाले नेताओं में उनके पास कई मजबूत बातें हैं. इनमें समाजवादी राजनीति से जुड़ाव, सामाजिक पहचान, राजनीति का अनुभव और अपना संगठन शामिल है. इन सबके आधार पर उपेंद्र कुशवाहा के पास नीतीश की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने का मजबूत दावा जरूर है. अब यह देखना होगा कि वे इस दावे को कितने लोगों का समर्थन दिला पाते हैं.

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