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यूपी में BJP विधायक किस बात से परेशान होकर सीएम योगी को चिट्ठी लिख रहे?

योगी सरकार का दावा है कि सपा सरकार के मुकाबले अब बिजली कटौती काफी कम होती है लेकिन ऐसा है तो उनके अपने ही विधायक इस मामले पर परेशान क्यों दिख रहे हैं

सीएम योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)
सीएम योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)
अपडेटेड 8 जून , 2026

पिछले नौ सालों में उत्तर प्रदेश में BJP की सबसे मजबूत शासन उपलब्धियों में से एक बिजली रही है. चुनावी भाषणों से लेकर विज्ञापनों तक, योगी आदित्यनाथ सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि बिजली सप्लाई सुधर गई है.

योगी सरकार का दावा है कि यूपी के गांवों और शहरों में बिजली पहुंच गई है तथा पहले की सपा सरकार की तुलना में कटौतियां भी काफी कम हो गई हैं. भरोसेमंद बिजली की सप्लाई 2017 के बाद BJP के लिए सुशासन का सबसे बड़ा और सबसे दिखने वाला उदाहरण बन गई थी.

हालांकि अब विधानसभा चुनाव से एक साल पहले यही मुद्दा सत्ताधारी पार्टी के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है. इस गर्मी में लंबे समय तक बिजली कटौती, बढ़ती बिजली की मांग और स्मार्ट प्रीपेड मीटरों को लेकर हालिया विवाद ने विपक्ष को एक ऐसा मुद्दा दे दिया है जो जाति, समुदाय और क्षेत्र की सीमाओं को पार करता है.

कई मुद्दों पर सिर्फ कुछ वर्गों तक होने वाले राजनीतिक बहसों के विपरीत बिजली की कमी का असर गांवों, कस्बों और शहरों में समान रूप से महसूस किया जा रहा है. BJP की परेशानी तब स्पष्ट हो गई जब विपक्ष के साथ-साथ पार्टी के भीतर से भी आलोचनाएं सामने आईं.

कई BJP विधायकों ने अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों की शिकायतें सार्वजनिक रूप से उठाईं. विधायक राजेश्वर सिंह ने बेहतर शिकायत समाधान तंत्र की मांग की, जबकि विधायक डॉ. नीरज बोरा ने साल के सबसे गर्म दिनों में लोगों को हो रही अनियमित बिजली कटौती पर चिंता व्यक्त की.

BJP विधायक अशोक कुमार ने आरोप लगाया कि अधिकारी निर्वाचित प्रतिनिधियों की भी बात नहीं सुन रहे हैं और चेतावनी दी कि मनमानी बिजली कटौती और आक्रामक चेकिंग अभियान जनता में असंतोष पैदा कर रहे हैं. जब सत्ताधारी दल के विधायक किसी मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से शिकायत करना शुरू करते हैं, तो इसे जमीनी स्तर पर मतदाताओं की मनोदशा का प्रतिबिंब माना जाता है.

इस अवसर को भांपते हुए विपक्ष ने तुरंत इस मुद्दे को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार पर तीखा हमला करते हुए दावा किया कि बिजली की कमी को लेकर जनता का गुस्सा इस हद तक पहुंच गया है कि BJP विधायकों को भी खुलकर बोलना पड़ रहा है.

अखिलेश यादव ने एक लंबे सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “उत्तर प्रदेश में ‘महा विद्युत संकट’ के कारण जनता के बढ़ते गुस्से से बचने के लिए डरे हुए BJP के MLA और MP ‘कागजी कवच’ की आड़ ले रहे हैं. वे अपने सरकार को चिट्ठियां लिख रहे हैं लेकिन असल में ये कोई ‘जनहित’ के पत्र नहीं हैं. ये तो बस ‘आवेदन पत्र’ हैं कि BJP नाम की डूबती नाव छोड़कर विपक्ष में आकर आगामी चुनाव में टिकट बचाने के लिए.”

हालांकि, योगी आदित्यनाथ सरकार कह रही है कि स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है. सरकार ने रिकॉर्ड स्तर की बिजली आपूर्ति का हवाला देते हुए कहा कि इस बार गर्मी में बिजली की मांग अभूतपूर्व थी, फिर भी हमने लोगों तक रिकॉर्ड मात्रा में बिजली पहुंचाई है.

ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा ने कहा कि उत्तर प्रदेश ने इतिहास रच दिया है. राज्य में अब तक का सबसे ज्यादा पीक सप्लाई 31,824 मेगावाट पहुंचाया गया, जो पूरे देश में भी सबसे ऊंचा है. ए.के. शर्मा ने X पर लिखा, “हमारे बिजली कर्मचारी दिन-रात लगे हुए हैं और पूरी निष्ठा से काम कर रहे हैं. वे तकनीकी, प्राकृतिक या मानवीय कारणों से होने वाली स्थानीय समस्याओं को जल्द से जल्द सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं.”

ये आंकड़े बताते हैं कि UP में बिजली की समस्या कितनी बड़ी है. इस साल पीक डिमांड 30,000 MW के पार चली गई है और रोजाना बिजली खपत पिछले साल से काफी बढ़ गई है. दस साल में UP की सालाना बिजली खपत दोगुनी हो चुकी है. 2013-14 में बिजली की पीक डिमांड 15,600 MW थी जो अब 31,000 MW से ज्यादा हो गई है. सरकार कह रही है कि शिकायतें इसलिए बढ़ रही हैं क्योंकि लोग अब ज्यादा बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं. हर घर में AC, कूलर और बहुत सारे बिजली के सामान हैं, जिससे गर्मी में बिजली सिस्टम पर भारी बोझ पड़ रहा है.

गर्मी के मौसम की तैयारी के लिए राज्य सरकार ने पहले ही करीब 34,000 मेगावाट बिजली उपलब्ध कराने की योजना घोषित की थी. सप्लाई मजबूत करने के लिए घाटमपुर, खुर्जा, ओबरा और जवाहरपुर में नई थर्मल पावर यूनिटें शुरू की गईं. अधिकारियों ने किसी भी कमी को पूरा करने के लिए पहले से पावर खरीद समझौते (PPA) किए और बाजार से भी बिजली खरीदने की योजना बनाई थी.

लंबी बिजली कटौती के खिलाफ विरोध प्रदर्शन अब बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदल गए हैं, जिसके बाद योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में बिजली विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ लंबी समीक्षा बैठक की. उन्होंने फीडरों के हिसाब से जवाबदेही तय करने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि ट्रांसफार्मर बदलने, शिकायतों के निपटारे या बिजली सप्लाई प्रबंधन में कोई भी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

यह तत्काल कार्रवाई राजनीतिक दांव-पेंच को दिखाती है. बिजली का मुद्दा अब सरकार के स्मार्ट प्रीपेड मीटर पर पीछे हटने वाले विवाद से भी जुड़ गया है. इस महीने की शुरुआत में, कई हफ्तों के विरोध प्रदर्शन और जनता के बढ़ते दबाव के बाद सरकार को झुकना पड़ा.

उसने घोषणा की कि स्मार्ट मीटर अब प्रीपेड की बजाय पोस्टपेड (बिल बाद में भरने वाले) कनेक्शन की तरह काम करेंगे. पुराने मीटरों को प्रीपेड स्मार्ट मीटर से बदलने की प्रक्रिया भी रोक दी गई है. यह फैसला सरकार की बड़ी नीतिगत उलटफेर था, क्योंकि शुरू में सरकार स्मार्ट मीटर लगाने का पुरजोर बचाव करती रही थी और आलोचना को सिर्फ राजनीति बताती रही थी. बढ़े हुए बिल, बिना वजह कटौती और अचानक कनेक्शन कटने की शिकायतों ने कई जिलों में भारी विरोध पैदा कर दिया, जिसके आगे सरकार को अपनी सोच बदलनी पड़ी.

स्मार्ट मीटर विरोध और बिजली कटौती अलग-अलग तो सरकारी दिक्कतें लगती हैं लेकिन दोनों मिलकर सरकार की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं. BJP के लिए यह बहुत गंभीर है क्योंकि बिजली सुधार उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही है. विपक्ष इसी वजह से इस मुद्दे पर पूरा जोर लगा रहा है. 2027 के चुनाव में अब असली सवाल यह है कि सरकार जो बिजली की उपलब्धि बताती है, वह वास्तव में आम लोगों को रोज महसूस हो रही है या नहीं. इस तेज गर्मी में यह मुद्दा सरकार के लिए अनपेक्षित रूप से बहुत बड़ा राजनीतिक टेस्ट बन गया है.

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