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यूपी में फर्जी शिक्षकों को कौन बचा रहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी बेसिक शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की एसटीएफ जांच के आदेश दिए हैं. पहले भी हजारों नियुक्तियों पर सवाल उठे, लेकिन जांच और कार्रवाई में देरी ने भर्ती प्रक्रिया से लेकर विभागीय जवाबदेही तक पर सवाल खड़े किए हैं

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सांकेतिक तस्वीर (फोटो : AI)
अपडेटेड 21 अक्टूबर , 2026

उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के सहारे नौकरी पाने का मामला किसी एक भर्ती या जिले तक सीमित नहीं है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 16 अक्टूबर को दिए अपने आदेश में इस समस्या को लगभग दो दशक पुरानी बताते हुए कहा कि फर्जी तरीके से हासिल की गई नियुक्तियां सरकारी प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं. 

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने कक्षा एक से आठ तक के सभी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और नियुक्ति पत्रों का स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) से व्यापक सत्यापन कराने का निर्देश दिया है. 

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की घटती संख्या के लिए केवल संसाधनों की कमी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. शिक्षण की गुणवत्ता और शिक्षकों का प्रदर्शन भी इसके महत्वपूर्ण कारण हैं.

इस आदेश की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि प्रदेश में फर्जी शिक्षक नियुक्तियों की जांच पहले भी कई बार शुरू हो चुकी है. वर्ष 2018 में एसटीएफ की जांच के दौरान वर्ष 2000 के आसपास से हुई नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों की आशंका सामने आई थी. 

नवंबर 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एसटीएफ के शुरुआती आकलन में लगभग 10 हजार शिक्षकों तक के दस्तावेजों में फर्जीवाड़े या दूसरे व्यक्ति की पहचान के इस्तेमाल की आशंका जताई गई थी. इसके बाद जिलों में शिक्षकों के शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच के लिए समितियां गठित की गईं. इनमें प्रशासन, पुलिस और शिक्षा विभाग के अधिकारियों को शामिल किया गया था. 

लेकिन संदेह के दायरे में आए शिक्षकों की बड़ी संख्या के मुकाबले जांच और कार्रवाई की गति अपेक्षित नहीं रही. इसका मतलब यह नहीं है कि संदेह के घेरे में आए सभी शिक्षक फर्जी नियुक्ति वाले साबित हो गए. लेकिन हजारों नियुक्तियों पर सवाल उठने के बाद भी पूरे मामले का समयबद्ध निस्तारण नहीं हो पाना विभागीय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है. 

2018 के दौरान 10 हजार शिक्षकों के दस्तावेजों में फर्जीवाड़े की बात सामने आई थी (फाइल फोटो)
2018 के दौरान 10 हजार शिक्षकों के दस्तावेजों में फर्जीवाड़े की बात सामने आई थी (सांकेतिक तस्वीर)

वर्ष 2020 में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में अनामिका शुक्ला के शैक्षणिक दस्तावेजों के कथित दुरुपयोग का मामला सामने आने के बाद यह समस्या फिर चर्चा में आई. जांच में सामने आया कि एक ही महिला के नाम और शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल करके अलग-अलग जिलों में नियुक्तियां हासिल करने का कथित खेल चल रहा था. 

इस मामले में एसटीएफ ने शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारियों और अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया था. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दस्तावेजों की प्रतियां हासिल करने, उन्हें दूसरे अभ्यर्थियों तक पहुंचाने और नियुक्ति प्रक्रिया में कथित मदद करने की भूमिका की जांच की गई. यह प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने भर्ती प्रक्रिया में केवल अभ्यर्थी के स्तर पर होने वाली धोखाधड़ी ही नहीं बल्कि दस्तावेजों तक पहुंच और विभागीय प्रक्रियाओं की निगरानी से जुड़े सवाल भी खड़े किए. 

यदि किसी व्यक्ति के प्रमाणपत्रों की प्रतियां दूसरे लोगों तक पहुंच जाती हैं और उन्हीं के आधार पर अलग-अलग जगह नियुक्तियां हासिल करने की कोशिश होती है तो सवाल उठता है कि दस्तावेजों का मिलान किस स्तर पर हुआ, पहचान की पुष्टि कैसे की गई और नियुक्ति से पहले सत्यापन की व्यवस्था ने गड़बड़ी क्यों नहीं पकड़ी.

जून 2022 में एसटीएफ की ओर से 35 से अधिक जिलों में कार्यरत 228 से अधिक संदिग्ध शिक्षकों की सूची विभाग को सौंपे जाने की जानकारी भी सामने आई थी. हरदोई और कुशीनगर समेत कुछ जिलों में वेतन वसूली के नोटिस जारी किए जाने की खबरें आईं. इसके बावजूद सत्यापन और अंतिम कार्रवाई की प्रक्रिया लंबी खिंचने के सवाल बने रहे. 

शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की पुष्टि के लिए दूसरे राज्यों और विश्वविद्यालयों पर निर्भरता, जवाब मिलने में देरी और विभागीय स्तर पर आगे की कार्रवाई में लगने वाला समय जांच को प्रभावित करने वाले कारण बताए जाते रहे हैं. ऐसे में अब अदालत का आदेश केवल दस्तावेज जमा कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पता लगाने का अवसर भी है कि पहले शुरू हुई जांचों का नतीजा क्या निकला और लंबित मामलों में कार्रवाई कहां अटकी हुई है.

जवाबदेही किसकी?

फर्जी नियुक्तियों की जांच में बेसिक शिक्षा अधिकारी यानी बीएसए कार्यालयों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है. नियुक्ति संबंधी दस्तावेज, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, चयन प्रक्रिया और सेवा संबंधी रिकॉर्ड विभागीय स्तर पर उपलब्ध होने चाहिए. नियुक्ति के समय प्रमाणपत्रों की जांच और पात्रता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी संबंधित भर्ती व्यवस्था का हिस्सा है. 

ऐसे में यदि किसी शिक्षक की नियुक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई तो जांच का दायरा केवल उस शिक्षक तक सीमित नहीं रह सकता. यह भी देखना होगा कि नियुक्ति के समय दस्तावेजों का सत्यापन किसने किया, संबंधित अभिलेखों का मिलान हुआ या नहीं और किसी विसंगति के सामने आने पर विभाग ने क्या कदम उठाए. 

फर्जी नियुक्तियों में बेसिक शिक्षा अधिकारी की भूमिका सबसे अहम है (सांकेतिक फोटो)
फर्जी नियुक्तियों की जांच में बेसिक शिक्षा अधिकारी की भूमिका सबसे अहम है (सांकेतिक फोटो)

हाई कोर्ट के नए आदेश में इसी जवाबदेही को स्पष्ट करने की कोशिश की गई है. अदालत ने निर्देश दिया है कि बीएसए अपने जिलों के सभी संबंधित शिक्षकों से नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की पठनीय प्रतियां जमा कराएं. शिक्षक को बीएसए की अधिसूचना मिलने के एक सप्ताह के भीतर ये दस्तावेज जमा करने होंगे. 

इसके बाद बीएसए कार्यालयों को प्रत्येक शिक्षक की नियुक्ति की तारीख, शैक्षणिक योग्यता, नियुक्ति के समय लागू न्यूनतम पात्रता शर्तों और संबंधित गजट अधिसूचना के अनुसार प्राप्त मेरिट का विवरण एक्सेल शीट में तैयार करना होगा. यह विवरण सहायक दस्तावेजों के साथ संबंधित एसटीएफ रेंज कार्यालय को भेजा जाएगा. 

इस प्रक्रिया से एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आ सकता है. अब तक अलग-अलग जिलों में संदिग्ध नियुक्तियों की जांच कई बार अलग-अलग प्रकरणों के रूप में होती रही है. लेकिन यदि सभी शिक्षकों की नियुक्ति, योग्यता और मेरिट का एक समान प्रारूप में रिकॉर्ड तैयार होता है तो एक ही प्रमाणपत्र या अंकपत्र के कई नियुक्तियों में इस्तेमाल जैसी विसंगतियों की पहचान करना आसान हो सकता है. 

इसी तरह, नियुक्ति के समय लागू पात्रता मानकों और शिक्षक के वास्तविक दस्तावेजों का मिलान करके यह पता लगाया जा सकता है कि मामला जाली प्रमाणपत्र का है, गलत जानकारी का है या रिकॉर्ड में किसी अन्य तरह की गड़बड़ी का. 

अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि सभी शिक्षक अपने उन निकट संबंधियों का विवरण देने वाला नोटरीकृत शपथपत्र दाखिल करें, जो सेवारत या सेवानिवृत्त होने के दौरान उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में बीएसए या उससे ऊपर के पद पर रहे हों. ऐसे संबंधी नहीं होने की स्थिति में शिक्षक को इस आशय का घोषणा-पत्र देना होगा. 

इस निर्देश का उद्देश्य सत्यापन प्रक्रिया में संभावित हितों के टकराव और विभागीय संबंधों से जुड़े पहलुओं की पड़ताल का रास्ता खोलना है. हालांकि किसी शिक्षक का वरिष्ठ अधिकारी से रिश्तेदार होना अपने आप में गलत नियुक्ति या अनुचित प्रभाव का प्रमाण नहीं है. इसकी प्रासंगिकता केवल तभी स्थापित होगी जब जांच में नियुक्ति प्रक्रिया या सत्यापन से जुड़ा कोई ठोस तथ्य सामने आए.

एसटीएफ को सत्यापन और जांच में जरूरत पड़ने पर जिला पुलिस प्रमुखों और पुलिस आयुक्तों की सहायता लेने की छूट दी गई है. शिक्षा विभाग को आवश्यक सूचनाएं और सहयोग उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया है. शिक्षा निदेशक को बीएसए स्तर पर चल रही प्रक्रिया की निगरानी करनी है, जबकि एसटीएफ के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक को सत्यापन और जांच की देखरेख करनी है. 

अदालत ने संबंधित अधिकारियों की ओर से लापरवाही या कर्तव्य में कोताही को गंभीरता से लेने की चेतावनी दी है. अगली सुनवाई चार नवंबर को होनी है, जिसमें अनुपालन रिपोर्ट के आधार पर आगे विचार किया जाएगा. यह व्यवस्था इसलिए अहम है क्योंकि जांच में देरी के लिए केवल प्रमाणपत्रों का दूसरे राज्यों या विश्वविद्यालयों से सत्यापन न हो पाना ही जिम्मेदार नहीं हो सकता. यदि किसी मामले में एसटीएफ की रिपोर्ट आने के बाद भी प्राथमिकी दर्ज कराने में महीनों लगते हैं तो यह पता लगाना जरूरी है कि विलंब किस स्तर पर हुआ. 

यदि विभागीय रिकॉर्ड समय पर उपलब्ध नहीं कराए गए, तो संबंधित अधिकारी की भूमिका क्या थी. और यदि किसी मामले में अदालत से स्थगन आदेश मिला तो यह भी देखना होगा कि आदेश किन परिस्थितियों में हुआ और उसके बाद विभाग ने कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए. अदालत से राहत लेना किसी आरोपित का कानूनी अधिकार है. इसलिए केवल स्टे मिलने को संरक्षण का प्रमाण नहीं माना जा सकता लेकिन मुकदमों की स्थिति और विभाग की पैरवी की गुणवत्ता की समीक्षा जरूरी है.

इस बार नतीजों पर रहेगी नजर

इस बार हाई कोर्ट के आदेश के पीछे एक ऐसा मामला है जिसमें एक महिला पर दूसरी महिला के शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल कर नौकरी हासिल करने का आरोप है. एसटीएफ के लखनऊ कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार, याचिकाकर्ता कुसुमलता पर कथित तौर पर कुसुमलता श्रीवास्तव के शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल करने का आरोप है. 

सुमलता श्रीवास्तव गोरखपुर जिले के कोडीपुर (बराईपार) स्थित एक कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं. अदालत को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता 12 और 13 अक्टूबर को शैक्षणिक योग्यताओं के सत्यापन के लिए एसटीएफ के समक्ष उपस्थित नहीं हुई थी. अदालत ने इसी सुनवाई के दौरान सभी बेसिक शिक्षकों के दस्तावेजों की व्यापक जांच का निर्देश दिया. आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगी. 

अदालत ने जांच के दौरान सामने आए ऐसे मामलों पर भी ध्यान दिया, जिनमें एक ही शैक्षणिक दस्तावेजों के सेट के आधार पर दस या उससे अधिक लोगों के नियुक्तियां हासिल करने की बात सामने आई. यदि एक प्रमाणपत्र का इस्तेमाल कई नियुक्तियों के लिए हुआ है तो यह केवल व्यक्तिगत धोखाधड़ी का मामला नहीं रह जाता. इससे दस्तावेजों की प्रामाणिकता जांचने, अभ्यर्थियों की पहचान सत्यापित करने और नियुक्ति के अंतिम चरण में रिकॉर्ड की पुष्टि करने वाली व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठता है. 

ऐसे मामलों में जांच का उद्देश्य केवल फर्जी दस्तावेज इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति तक पहुंचना नहीं, बल्कि दस्तावेजों की प्रतियां हासिल करने, उन्हें उपलब्ध कराने और नियुक्ति प्रक्रिया में कथित मदद करने वाले किसी भी व्यक्ति की भूमिका की पहचान करना भी होना चाहिए.

सरकारी प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता से इस मामले का सीधा संबंध है. अदालत ने कहा है कि मुफ्त पाठ्यपुस्तकें, मध्याह्न भोजन, यूनिफॉर्म और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के बावजूद विद्यालयों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है. प्रभावी शिक्षण के लिए केवल विषय का ज्ञान पर्याप्त नहीं है. नियमित उपस्थिति, बच्चों पर ध्यान, पढ़ाने की क्षमता, धैर्य और निष्पक्षता भी जरूरी हैं. खासकर उन बच्चों के लिए जो वंचित परिवारों से आते हैं और जिनकी पहली पीढ़ी स्कूल तक पहुंची है. 

अब असली कसौटी यह होगी कि चार नवंबर को अदालत के सामने कितने जिलों ने रिकॉर्ड उपलब्ध कराया, एसटीएफ कितने दस्तावेजों का सत्यापन कर पाई और पहले से लंबित मामलों की स्थिति पर क्या जानकारी दी गई. यदि इस बार भी दस्तावेज जमा कराने और सूचियां तैयार करने तक ही प्रक्रिया सीमित रह गई तो पुराने सवाल बने रहेंगे. 

लेकिन यदि सत्यापन के साथ नियुक्ति अधिकारियों की भूमिका, प्राथमिकी में देरी, विभागीय कार्रवाई और लंबित मुकदमों की पैरवी की भी समीक्षा हुई तो यह जांच फर्जी नियुक्तियों के पूरे तंत्र की पहचान करने में मदद कर सकती है. आखिरकार, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने शिक्षक फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे नौकरी में आए. सवाल यह भी है कि नियुक्ति के समय जांच की जिम्मेदारी निभाने वालों ने क्या किया, गड़बड़ी सामने आने के बाद कार्रवाई क्यों अटकी और इस पूरी प्रक्रिया के लिए जवाबदेह कौन है.

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