scorecardresearch
डार्क मोड

यूपी में बिजली लोड बढ़ाने को लाखों लोग एकतरफा फैसला क्यों बता रहे?

उत्तर प्रदेश में 47 लाख बिजली उपभोक्ताओं का स्वीकृत लोड बढ़ाने के फैसले ने खड़ा किया बड़ा विवाद, अब सवाल सिर्फ बिल का नहीं बल्कि कानून, सब्सिडी, बिजली व्यवस्था और उपभोक्ता अधिकारों का भी है

Chhattisgarh bijli rate hike
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 10 जुलाई , 2026

3 जुलाई को राजधानी के हजारों उपभोक्ताओं के मोबाइल फोन पर अचानक संदेश आया कि उनका स्वीकृत विद्युत भार बढ़ा दिया गया है. अधिकांश लोगों को पहली बार पता चला कि उनका बिजली कनेक्शन अब पहले जैसा नहीं रहा. इसके बाद अमौसी, जानकीपुरम, गोमतीनगर और लखनऊ मध्य के बिजली कार्यालयों में उपभोक्ताओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी.

स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि कई जगह इंजीनियरों और कर्मचारियों से उपभोक्ताओं की तीखी नोकझोंक हुई. कुछ स्थानों पर मारपीट जैसी स्थिति बनने पर कर्मचारी कार्यालय छोड़कर बाहर निकल गए. अनुमान है कि केवल राजधानी के चारों जोनों में तीन से चार हजार लोग शिकायत लेकर पहुंचे, जबकि पांच हजार से अधिक लोगों ने लोड कम करने के लिए आवेदन दिए. इनमें से लगभग 500 प्रार्थना पत्र तत्काल स्वीकार किए गए. इस विरोध की सबसे बड़ी वजह यह थी कि अधिकांश उपभोक्ताओं का कहना था कि उन्हें कभी यह नहीं बताया गया कि उनका लोड बढ़ाया जाने वाला है और न ही उन्हें आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिला.

ठाकुरगंज के मल्लाहीटोला निवासी रेयाज इसी विवाद की एक मिसाल हैं. उनके मुताबिक पूरे वर्ष उनका बिजली उपयोग तीन किलोवाट से कम रहा. इसके बावजूद उनका स्वीकृत भार चार किलोवाट कर दिया गया और करीब 1800 रुपए का अतिरिक्त जुर्माना भी लगा दिया गया; उन्होंने हुसैनगंज बिजली कार्यालय में आवेदन देकर लोड कम करने की मांग की है.

जानकीपुरम निवासी अधिवक्ता विनय कृष्ण पांडेय का मामला भी इसी तरह सवाल खड़ा करता है. उनके घर में दो एयर कंडीशनर चलने के बावजूद अधिकतम लोड 3.28 किलोवाट दर्ज हुआ, जबकि उनका स्वीकृत भार चार से बढ़ाकर पांच किलोवाट कर दिया गया. उनका कहना है कि अगर वास्तविक उपयोग कम है तो केवल तकनीकी गणना के आधार पर लोड बढ़ाना उचित नहीं है. उन्होंने इस मामले को अदालत तक ले जाने की बात कही है. चौक निवासी रमेश गौड़ का आरोप है कि स्मार्ट मीटरों की सटीकता पर पहले से सवाल उठ रहे हैं. ऐसे में उन्हीं आंकड़ों के आधार पर लाखों उपभोक्ताओं का लोड बढ़ाना उचित नहीं कहा जा सकता.

विवाद केवल 47 लाख उपभोक्ताओं के लोड बढ़ाने तक सीमित नहीं है. इसके साथ सब्सिडी समाप्त होने, फिक्स्ड चार्ज बढ़ने, गरीब उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त भार पड़ने, स्मार्ट मीटर की विश्वसनीयता, बिजली कानूनों के पालन और यहां तक कि प्रदेश के बिजली ढांचे की क्षमता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

राजधानी लखनऊ इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है, जहां तीन लाख 87 हजार से अधिक उपभोक्ताओं के लोड में बदलाव के बाद बिजली कार्यालयों में अभूतपूर्व विरोध देखने को मिला.

क्या है बिजली कंपनियों की दलील

उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) और मध्यांचल विद्युत वितरण निगम (MVVNL) इस पूरी कार्रवाई को पूरी तरह नियमों के हिसाब से बता रहे हैं. MVVNL की प्रबंध निदेशक रिया केजरीवाल का कहना है कि यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के वित्तीय वर्ष 2025-26 के टैरिफ आदेश तथा उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कोड-2005 के अनुरूप अपनाई गई है. बिजली कंपनियों के अनुसार जिन उपभोक्ताओं ने एक अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 के बीच कम से कम तीन बार अपने स्वीकृत विद्युत भार से अधिक बिजली का उपयोग किया, उनके स्वीकृत भार को नियमित (रेगुलराइज) किया गया. इसके लिए तीन बार दर्ज अधिकतम मांग (मैक्सिमम डिमांड) में से सबसे कम रीडिंग को आधार बनाया गया.

कॉर्पोरेशन का कहना है कि पुराने सिस्टम में उपभोक्ता लगातार जुर्माना भरते रहते थे क्योंकि उनका स्वीकृत लोड वास्तविक खपत से कम रहता था. अब एक बार लोड बढ़ जाने के बाद अगर उपभोक्ता उसी सीमा के भीतर बिजली उपयोग करता है तो भविष्य में अधिक मांग प्रभार नहीं देना पड़ेगा. प्रबंधन का यह भी तर्क है कि वास्तविक कनेक्टेड लोड का सही रिकॉर्ड मिलने से वितरण कंपनियां भविष्य की बिजली मांग का बेहतर आकलन कर सकेंगी.

इससे नए ट्रांसफॉर्मर, नई लाइनें और अतिरिक्त सब-स्टेशन समय रहते स्थापित किए जा सकेंगे तथा ट्रांसफॉर्मर फुंकने, वोल्टेज गिरने और बिजली कटौती जैसी समस्याएं कम होंगी. बिजली कंपनियों का यह भी कहना है कि टैरिफ आदेश के अनुसार स्वीकृत भार बढ़ाने के बाद मोबाइल पर मैसेज भेजकर सूचना देने का प्रावधान है और उसी का पालन किया गया है.

उपभोक्ता परिषद का पलटवार, कानून और सब्सिडी दोनों पर सवाल

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद इस पूरी कार्रवाई को उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन बता रही है. परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा का कहना है कि प्रदेश में लगभग 47 लाख उपभोक्ताओं का लोड बढ़ाने से करीब 25 प्रतिशत गरीब उपभोक्ता स्वतः सब्सिडी योजना से बाहर हो गए हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की है जिन्हें अब तक रियायती दरों पर बिजली मिलती थी. परिषद का दावा है कि बीपीएल और कम आय वर्ग के उपभोक्ताओं पर इसका सीधा आर्थिक असर पड़ेगा.

ग्रामीण गरीब उपभोक्ताओं पर प्रतिमाह लगभग 165 रुपए और शहरी गरीब परिवारों पर करीब 435 रुपए तक अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है. प्रदेश में लगभग 1.70 लाख बीपीएल बिजली उपभोक्ता हैं. एक किलोवाट कनेक्शन पर जहां उनका फिक्स्ड चार्ज सीमित था, वहीं दो किलोवाट हो जाने पर फिक्स्ड चार्ज और ऊर्जा शुल्क दोनों बढ़ जाएंगे. उपभोक्ता परिषद का सबसे बड़ा कानूनी तर्क यह है कि उत्तर प्रदेश विद्युत आपूर्ति संहिता-2005 के तहत नॉन-स्मार्ट मीटर उपभोक्ताओं का लोड बढ़ाने से पहले नोटिस देना अनिवार्य है. नोटिस के साथ भार वृद्धि का आधार बताना और उपभोक्ता को आपत्ति दर्ज कराने का अवसर देना भी जरूरी है.

परिषद का कहना है कि प्रदेश के कुल लगभग 3.73 करोड़ बिजली उपभोक्ताओं में केवल करीब 90 लाख के पास स्मार्ट मीटर हैं. बाकी अधिकांश उपभोक्ताओं पर अब भी विद्युत आपूर्ति संहिता-2005 लागू होती है. ऐसे में बिना नोटिस दिए लोड बढ़ाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है. इसी आधार पर परिषद ने 7 जुलाई को विद्युत नियामक आयोग में लोक महत्व का प्रस्ताव दाखिल कर पूरी प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने, प्रत्येक उपभोक्ता को उसका रिकॉर्ड उपलब्ध कराने, सार्वजनिक सुनवाई कराने और मामले की स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है.

परिषद ने केंद्रीय ऊर्जा मंत्री के उस लिखित उत्तर का भी हवाला दिया है जिसमें कहा गया था कि स्मार्ट मीटर लागू होने के बाद उपभोक्ताओं से अधिकतम मांग जुर्माना नहीं लिया जाएगा. परिषद का आरोप है कि उत्तर प्रदेश में न केवल जुर्माना लिया जा रहा है बल्कि साथ ही स्वीकृत भार भी बढ़ाया जा रहा है, जिससे स्मार्ट मीटर उपभोक्ता दोहरी मार झेल रहे हैं.

क्या बिजली का ढांचा अतिरिक्त लोड झेल पाएगा?

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी पक्ष बिजली व्यवस्था की क्षमता से जुड़ा है. उपभोक्ता परिषद का दावा है कि 47 लाख उपभोक्ताओं का स्वीकृत भार बढ़ने से प्रदेश में कुल कनेक्टेड लोड लगभग 3654 मेगावाट बढ़ जाएगा. अकेले लखनऊ में लगभग 3.87 लाख उपभोक्ताओं का लोड बढ़ने से अनुमानित 350 मेगावाट अतिरिक्त मांग पैदा हो सकती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि स्वीकृत लोड केवल बिलिंग का विषय नहीं होता. हर अतिरिक्त किलोवाट का सीधा असर ट्रांसफॉर्मर, फीडर, सब-स्टेशन और वितरण लाइनों पर पड़ता है. अगर नेटवर्क पहले से मजबूत नहीं है तो पीक आवर में ट्रांसफॉर्मर ओवरलोड होना, वोल्टेज गिरना, फीडर ट्रिप करना और स्थानीय बिजली कटौती जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.

लखनऊ पहले ही गर्मियों में इन समस्याओं से जूझता रहा है. ऐसे में अगर वास्तविक वितरण क्षमता बढ़ाए बिना बड़े पैमाने पर कनेक्टेड लोड बढ़ाया गया तो तकनीकी दबाव और बढ़ सकता है. उपभोक्ता परिषद का कहना है कि प्रदेश में इस समय लगभग 480 संचालित 132 केवी सब-स्टेशन हैं, जिनकी कुल ट्रांसफॉर्मेशन क्षमता लगभग 69,529 एमवीए है. जबकि उपभोक्ताओं का कुल कनेक्टेड लोड लगभग 8.57 करोड़ किलोवाट तक पहुंच चुका है. परिषद का मानना है कि उपलब्ध क्षमता और वास्तविक मांग के बीच का यही अंतर बिजली व्यवस्था की मौजूदा परेशानियों की बड़ी वजह है.

ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे का कहना है कि अगर संशोधित स्वीकृत लोड वास्तव में उपभोक्ताओं की वास्तविक बिजली खपत को दर्शाता है तो बिजली कंपनियों को केवल बिलिंग सुधारने से काम नहीं चलेगा. उन्हें बड़े पैमाने पर वितरण ढांचे में निवेश करना होगा. उनके अनुसार आने वाले वर्षों में नए 132 केवी, 220 केवी और 33/11 केवी सब-स्टेशन बनाने होंगे. मौजूदा सब-स्टेशनों में अधिक क्षमता वाले ट्रांसफॉर्मर लगाने होंगे. वितरण स्तर पर अतिरिक्त पावर ट्रांसफॉर्मर स्थापित करने होंगे. उच्च क्षमता की नई ट्रांसमिशन और वितरण लाइनें बिछानी होंगी. पुराने शहरी नेटवर्क का आधुनिकीकरण करना होगा और फीडरों को इस तरह मजबूत करना होगा कि बढ़ती पीक डिमांड को बिना बाधा संभाला जा सके.

अब फैसला सिर्फ बिल का नहीं, भरोसे का भी

उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के स्वीकृत लोड बढ़ाने का विवाद अब एक साधारण प्रशासनिक निर्णय से कहीं बड़ा मुद्दा बन चुका है. एक ओर बिजली कंपनियां इसे वास्तविक खपत के अनुरूप तकनीकी सुधार और भविष्य की नेटवर्क योजना का आधार बता रही हैं, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ता संगठन इसे बिना पारदर्शिता और बिना पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया अपनाए लागू किया गया फैसला मान रहे हैं.

अगर नियामक आयोग यह मानता है कि टैरिफ आदेश के तहत कार्रवाई सही हुई है, तब भी सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि लाखों उपभोक्ताओं को पहले भरोसे में क्यों नहीं लिया गया. अगर उपभोक्ताओं को पहले नोटिस दिया जाता, उनके उपयोग का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाता और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलता, तो शायद इतना व्यापक विरोध नहीं होता. दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न बिजली ढांचे की तैयारी का है. अगर वास्तव में प्रदेश में लाखों उपभोक्ताओं का वास्तविक कनेक्टेड लोड पहले से कहीं अधिक है, तो वितरण प्रणाली को उसी अनुपात में मजबूत बनाना भी उतना ही आवश्यक होगा. अन्यथा आने वाले वर्षों में बढ़ती मांग के साथ ट्रांसफॉर्मर फेल होने, लो-वोल्टेज, ट्रिपिंग और स्थानीय बिजली संकट की घटनाएं बढ़ सकती हैं.

ADVERTISEMENT
Advertisement