
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब करीब पांच महीने का समय बचा है और सत्तारूढ़ BJP के सामने सबसे बड़ी चुनौती चुनाव से पहले सकारात्मक माहौल बनाए रखने की है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मोर्चे पर लगातार सक्रिय हैं.
सरकार की योजनाओं, नियुक्तियों और विकास कार्यों को सामने रखने के साथ वे सीधे जनता के बीच अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं. लेकिन BJP के भीतर चुनावी तस्वीर को लेकर पूरी तरह बेफिक्री नहीं है. पार्टी के एक धड़े को युवाओं में रोजगार और भर्ती परीक्षाओं को लेकर बढ़ती बेचैनी, जातीय समीकरणों में खिंचाव और संगठन के भीतर मतभेदों की चिंता है.
2024 के लोकसभा चुनाव में BJP की सीटें घटकर 33 रह गई थीं जबकि समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. इस नतीजे ने विपक्ष को BJP के पुराने सामाजिक समीकरण को चुनौती देने का मौका दिया.
अखिलेश यादव का PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का फॉर्मूला इसी रणनीति का हिस्सा है. ऐसे में 2027 की लड़ाई में योगी आदित्यनाथ के सामने सिर्फ सरकार के कामकाज का हिसाब देने की चुनौती नहीं है बल्कि BJP के सामाजिक आधार को भी फिर से मजबूत करने की परीक्षा है.
युवा नाराजगी साधने की कोशिश
युवाओं के बीच रोजगार का सवाल चुनावी मुद्दा न बने, इसके लिए योगी सरकार ने पिछले कुछ महीनों में कई कदम उठाए हैं. सितंबर की शुरुआत में उत्तर प्रदेश कॉर्पोरेशन फॉर आउटसोर्सिंग सर्विसेज यानी UPCOS की शुरुआत को इसी रणनीति की अहम कड़ी माना जा रहा है. इसका उद्देश्य करीब 3.5 लाख आउटसोर्स कर्मचारियों और उनके परिवारों के हितों को सुरक्षा और लाभ का ढांचा देना है.

इससे पहले मुख्यमंत्री ने छह महीने में एक लाख युवाओं को नियुक्ति पत्र देने का ऐलान किया था. सरकार का दावा है कि उसके करीब साढ़े नौ साल के कार्यकाल में 9.3 लाख से ज्यादा नौकरियां दी गई हैं. पुलिस और शिक्षक भर्ती के बड़े अभियान के अलावा मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान के जरिए युवाओं को अपना कारोबार शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.
तकनीकी और कॉरपोरेट संस्थानों में छात्रों के लिए स्टाइपेंड वाली इंटर्नशिप भी शुरू की गई है. सरकार ने केंद्रीयकृत फैमिली कार्ड की व्यवस्था भी शुरू की है जिसके जरिए ऐसे परिवारों की पहचान की जा रही है जिनके किसी सदस्य के पास सरकारी या निजी नौकरी नहीं है.
राजनीतिक तौर पर इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि इससे सरकार को रोजगार की जरूरत वाले परिवारों तक सीधे पहुंच बनाने का एक नया माध्यम मिल सकता है.
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक युवाओं की समस्या केवल बेरोजगारी तक सीमित नहीं है. बड़ी संख्या में शिक्षित युवा ऐसी नौकरियां कर रहे हैं जो उनकी योग्यता और कौशल के अनुरूप नहीं हैं. इसे अंडर-एम्प्लॉयमेंट की समस्या के तौर पर देखा जा रहा है.
ऐसे युवाओं के बीच यह धारणा पैदा हो सकती है कि शिक्षा हासिल करने के बाद भी उन्हें अपनी क्षमता के मुताबिक अवसर नहीं मिल रहे. यही समस्या Gen Z की नाराजगी को ज्यादा जटिल बनाती है. भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितता, परीक्षा परिणाम में देरी, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल सोशल मीडिया पर तेजी से राजनीतिक मुद्दा बनते हैं.
इस वर्ग के लिए सरकार की घोषणा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि नौकरी की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और समयबद्ध है. मेरठ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल कहते हैं, “BJP के लिए आने वाले महीनों में रोजगार के आंकड़ों के साथ-साथ युवाओं की धारणा बदलना भी जरूरी होगा. यदि सरकार रोजगार की उपलब्धियों को सीधे नियुक्ति और अवसर से जोड़ पाती है तो यह असंतोष कम किया जा सकता है. लेकिन अगर भर्ती और रोजगार के सवाल लगातार विवादों में रहे तो विपक्ष के लिए यह बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है.”
जातीय समीकरण में बढ़ती बेचैनी
योगी सरकार के सामने दूसरी और ज्यादा पेचीदा चुनौती जातीय समीकरण की है. 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में BJP ने गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित समुदायों के बीच मजबूत पकड़ बनाई थी. यही सामाजिक आधार BJP की लगातार चुनावी सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है.

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष ने इस समीकरण को तोड़ने के लिए PDA की रणनीति को और धार दी है. BJP के भीतर चिंता इस बात को लेकर है कि OBC समुदायों के एक हिस्से में पार्टी के फिर से ऊंची जातियों की पार्टी होने की धारणा मजबूत न हो जाए.
पार्टी के कुछ नेताओं के मुताबिक अधिकारियों और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच जातीय आधार पर बने वॉट्सएप ग्रुप भी इस तरह की धारणाओं को हवा दे रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि ऊंची जातियों के भीतर भी राजनीतिक तनाव की चर्चा है.
ठाकुर और ब्राह्मण के बीच राजनीतिक दूरी तथा दोनों समुदायों से जुड़े नेताओं के बीच कथित मतभेद समय-समय पर चर्चा में आते रहे हैं. अगर चुनावी माहौल में ये मतभेद खुलकर सामने आते हैं तो BJP के लिए सामाजिक संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो सकता है.
विवेक नौटियाल के मुताबिक BJP का सबसे बड़ा चुनावी कौशल अलग-अलग सामाजिक समूहों को एक व्यापक हिंदुत्व और विकास के नैरेटिव में जोड़ना रहा है. 2027 में यही मॉडल फिर परीक्षा में होगा. पार्टी को OBC और दलित मतदाताओं को यह भरोसा दिलाना होगा कि सत्ता और अवसरों में उनकी हिस्सेदारी मजबूत है जबकि ऊंची जातियों के भीतर भी असंतोष को बढ़ने से रोकना होगा.
हालांकि यहीं योगी आदित्यनाथ की व्यक्तिगत लोकप्रियता BJP के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है. मुख्यमंत्री की कानून-व्यवस्था वाली छवि, अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संदेश और महिला मतदाताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता जातीय समीकरण से अलग एक व्यापक राजनीतिक आधार तैयार करते हैं.
BJP नेताओं का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोनों महिला मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हैं. ऐसे में चुनाव से पहले महिलाओं को केंद्र में रखकर नई योजनाएं और कार्यक्रम सामने आ सकते हैं. राजनीतिक तौर पर यह BJP के लिए जातीय ध्रुवीकरण से आगे बढ़कर एक व्यापक महिला वोट बैंक को साधने की कोशिश होगी.
सपा का PDA दांव
समाजवादी पार्टी का PDA फॉर्मूला BJP के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बनकर उभरा है. अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाने की कोशिश की है. इसका मकसद सपा के पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार को विस्तार देकर गैर-यादव OBC और दलित समुदायों के बड़े हिस्से तक पहुंच बनाना है.

कांग्रेस भी जातिगत प्रतिनिधित्व के सवाल को जोर-शोर से उठा रही है. राहुल गांधी का 'जितनी आबादी, उतना हक' का नारा और जातिगत जनगणना की मांग इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है. सरकारी नौकरियों और संस्थानों में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर उठाए जा रहे सवाल BJP के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनका सीधा असर युवाओं के बीच पड़ सकता है.
सरकारी नौकरियों में SC, ST और OBC के आरक्षित पदों को 'नॉट फाउंड सूटेबल' बताकर खाली रखे जाने के आरोपों को भी विपक्ष राजनीतिक मुद्दा बना रहा है. BJP के सामने यहां दोहरा दबाव है. एक तरफ OBC और दलित समुदायों में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल हैं दूसरी तरफ ऊंची जातियों के युवाओं में आरक्षण और मेरिट को लेकर अपनी अलग चिंताएं हैं.
UGC के इक्विटी नियमों का विवाद भी इसी व्यापक सामाजिक बहस का हिस्सा बन गया. इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा मजबूत करना था, लेकिन ऊंची जातियों के एक वर्ग में इसके प्रावधानों को लेकर असंतोष पैदा हुआ.
सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद इस विवाद ने दिखाया कि जाति और प्रतिनिधित्व का सवाल अब सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं है बल्कि युवा मतदाताओं के बीच भी इसकी गहरी राजनीतिक संवेदनशीलता है.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक BJP को PDA के जवाब में केवल जातीय राजनीति करने से बचना होगा. उसे विकास, कानून-व्यवस्था, कल्याणकारी योजनाओं और हिंदुत्व के साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व का ऐसा संतुलन बनाना होगा जो उसके पुराने सामाजिक गठजोड़ को कमजोर न होने दे.
सपा-कांग्रेस का तालमेल
BJP के लिए राहत की सबसे बड़ी संभावना विपक्ष की एकजुटता में कमजोरी हो सकती है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटें जीतकर BJP से बेहतर प्रदर्शन किया जबकि कांग्रेस ने भी गठबंधन के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की.
इस नतीजे के बाद अखिलेश यादव का राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ा है और कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अपनी भूमिका को लेकर ज्यादा मुखर है. लेकिन 2027 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों के लिए अलग परीक्षा होगा. 403 सीटों पर उम्मीदवारों का चयन, सीट बंटवारा और स्थानीय स्तर पर संगठन की ताकत के सवाल पर दोनों पार्टियों के बीच मतभेद उभर सकते हैं.
सपा जहां OBC और PDA के आधार को मजबूत करना चाहती है, वहीं कांग्रेस अल्पसंख्यक और युवा वोटरों के बीच अपनी राजनीतिक जगह बढ़ाना चाहती है. दोनों दलों का सामाजिक विस्तार कई सीटों पर एक-दूसरे से टकरा सकता है. ऐसे में सीट बंटवारे पर जल्दी सहमति बनाना आसान नहीं होगा.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सपा और कांग्रेस समय रहते सीटों और रणनीति पर स्पष्ट समझौता कर लेते हैं तो BJP के सामने विपक्षी चुनौती काफी मजबूत हो सकती है. खासकर अगर OBC, दलित और अल्पसंख्यक वोटों का बड़ा हिस्सा एक दिशा में जाता है तो BJP के 2022 के सामाजिक समीकरण पर असर पड़ सकता है.
इसके उलट अगर दोनों पार्टियां सीटों और नेतृत्व को लेकर आपसी खींचतान में उलझती हैं तो इसका सीधा लाभ BJP को मिलेगा. BJP के लिए यही सबसे बड़ा राजनीतिक अवसर होगा कि विपक्षी वोटों का बिखराव बना रहे और वह अपने विकास, कानून-व्यवस्था, हिंदुत्व और महिला कल्याण के मुद्दों के जरिए व्यापक वोट आधार बनाए रखे.
आने वाले महीनों में यही तय होगा कि 2027 का चुनाव योगी की लोकप्रियता और सरकार के कामकाज के इर्द-गिर्द घूमेगा या फिर जातीय प्रतिनिधित्व, रोजगार और युवा असंतोष विपक्ष के लिए BJP के खिलाफ बड़ा चुनावी हथियार बन जाएगा.

