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जानलेवा साबित हो रहा डीजे का शोर?

डीजे की तेज आवाज के दौरान मौत और स्वास्थ्य संकट के हालिया मामलों ने यूपी में ध्वनि प्रदूषण, प्रशासनिक निगरानी और नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं

DJ
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अपडेटेड 25 सितंबर , 2026

बलरामपुर के डिवाइन पब्लिक स्कूल में 21 सितंबर की सुबह बाकी दिनों की तरह ही क्लास चल रही थी. कक्षा दो की सात साल की वैष्णवी तिवारी अपनी सीट पर बैठी थी. बाहर से गणेश प्रतिमा विसर्जन का जुलूस गुजर रहा था. 

जुलूस में डीजे बज रहा था और आवाज इतनी तेज थी कि स्कूल के भीतर तक उसका असर महसूस हो रहा था. करीब 10:58 बजे अचानक वैष्णवी अपनी सीट से गिर पड़ी. कुछ देर बाद वह संभली लेकिन फिर गिर गई और इस बार उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. 

शिक्षक उसे अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. स्कूल की शिक्षिका इकरा खान के मुताबिक, बच्ची की हालत बिगड़ने के समय डीजे की आवाज और तेज हो गई थी तथा क्लासरूम में कंपन महसूस हो रहा था. पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित किया, डीजे की गाड़ी और साउंड सिस्टम जब्त किया और मामले की जांच शुरू की.

बलरामपुर की यह घटना अब सिर्फ एक बच्ची की अचानक मौत का मामला नहीं रह गई है. इसने उस सवाल को फिर सामने ला दिया है कि धार्मिक आयोजनों, जुलूसों और शादियों में मनोरंजन के नाम पर बजने वाला डीजे आखिर कितनी आवाज तक स्वीकार्य है और उस सीमा को लागू कौन कर रहा है. 

पुलिस ने फिलहाल यह नहीं कहा है कि वैष्णवी की मौत डीजे के शोर से ही हुई. बच्ची का पोस्टमार्टम भी नहीं हुआ इसलिए मौत की निश्चित चिकित्सकीय वजह सामने नहीं आई है. लेकिन डीजे की तेज आवाज, बच्ची के अचानक अस्वस्थ होने और उसी समय स्कूल के बाहर जुलूस गुजरने की परिस्थितियों की जांच पुलिस कर रही है.

बलरामपुर डिवाइन स्कूल स्कूल की सीसीटीवी फुटेज, लाल घेरे में वैष्णवी. बाहर बज रहा डीजे
बलरामपुर डिवाइन स्कूल की सीसीटीवी फुटेज, लाल घेरे में वैष्णवी; बाहर बज रहा डीजे

बलरामपुर में सवाल सिर्फ डीजे पर नहीं

बलरामपुर पुलिस ने 23 सितंबर को बालाजी हाई-टेक डीजे के मालिक चंद्र प्रकाश वर्मा और ऑपरेटर रामपाल सैनी को गिरफ्तार किया. दोनों के खिलाफ बीएनएस की धारा 105 और 223 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है. पुलिस ने पिकअप वाहन, डीजे सिस्टम और जुलूस में इस्तेमाल दूसरे उपकरण जब्त किए हैं. 

जांच में यह देखा जा रहा है कि जुलूस स्कूल के पास कब पहुंचा उस समय साउंड सिस्टम किस तरह चलाया जा रहा था और बच्ची के गिरने से ठीक पहले और बाद में क्या हुआ. पुलिस ने स्कूल और आसपास के सीसीटीवी फुटेज भी सुरक्षित किए हैं.

मामले में पुलिस की अपनी कार्यप्रणाली भी जांच के दायरे में आई है. बलरामपुर के एएसपी विशाल पांडे के मुताबिक, मेवालाल चौकी प्रभारी शैलेंद्र कुमार यादव को जांच में लापरवाही के आरोप में निलंबित किया गया है, जबकि कोतवाली नगर के इंस्पेक्टर संतोष कुमार मिश्रा को कारण बताओ नोटिस दिया गया है. 

कार्रवाई एसपी मार्तंड प्रकाश सिंह के निर्देश पर हुई. यानी मामला केवल डीजे संचालक की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है. जुलूस के दौरान नियमों की निगरानी और उनके पालन की जिम्मेदारी भी सवालों के घेरे में है. 

बलरामपुर की घटना के बाद पुलिस ने डीजे संचालकों के साथ बैठक कर ध्वनि की निर्धारित सीमा में ही सिस्टम चलाने, न्यायालय और प्रशासन के आदेशों का पालन करने तथा रात 10 बजे के बाद डीजे नहीं बजाने के निर्देश दिए. खास बात यह है कि स्कूल, अस्पताल और न्यायालय जैसे स्थान साइलेंस जोन की श्रेणी में आते हैं जहां सामान्य इलाकों के मुकाबले और कम ध्वनि सीमा लागू होती है.

डीजे का असल

ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 के तहत आवासीय क्षेत्रों में दिन के समय 55 और रात में 45 डेसिबल की सीमा है. वाणिज्यिक क्षेत्रों में यह सीमा 65 और 55 डेसिबल तथा औद्योगिक क्षेत्रों में 75 और 70 डेसिबल है. 

साइलेंस जोन में दिन के समय 50 और रात में 40 डेसिबल की सीमा निर्धारित है. नियमों में दिन का समय सुबह 6 बजे से रात 10 बजे और रात का समय रात 10 बजे से सुबह 6 बजे माना गया है. यहीं से असली सवाल खड़ा होता है. 

प्रदेश में गणेश उत्सव, दुर्गा पूजा, बारात, धार्मिक जुलूस और दूसरे आयोजनों में कई जगह बड़े-बड़े साउंड सिस्टम लगाए जाते हैं. जानकारों के मुताबिक, कई आयोजनों में 12 से 15 फीट ऊंचे साउंड सिस्टम लगाए जाने और ध्वनि के अत्यधिक स्तर तक पहुंचने की शिकायतें सामने आती रही हैं.

ज्यादा शोर तनाव और हृदय से जुड़ी दिक्कतों की वजह बन सकता है (सांकेतिक तस्वीर)
ज्यादा शोर तनाव और हृदय से जुड़ी दिक्कतों की वजह बन सकता है (सांकेतिक तस्वीर)

समस्या सिर्फ आवाज की ऊंचाई नहीं, उसकी निरंतरता और बास की तीव्रता भी है. बड़े स्पीकर से निकलने वाली कम आवृत्ति की ध्वनि आसपास की खिड़कियों, दरवाजों और दूसरे ढांचों में कंपन पैदा कर सकती है. बलरामपुर के स्कूल में शिक्षकों ने भी इसी तरह के कंपन की बात कही है. 

ऐसे में किसी स्कूल, अस्पताल या रिहायशी इलाके से जुलूस गुजरते समय सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं कि डीजे चल रहा है या नहीं. यह देखना भी जरूरी है कि उस समय वास्तविक ध्वनि स्तर कितना था.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अत्यधिक पर्यावरणीय शोर नींद में खलल, सुनने की क्षमता पर असर, संज्ञानात्मक प्रभाव और हृदय संबंधी समस्याओं के जोखिम से जुड़ा है. लंबे समय तक अत्यधिक शोर से तनाव प्रतिक्रिया सक्रिय हो सकती है और ब्लड प्रेशर तथा हृदय संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं. 

हालांकि किसी एक व्यक्ति की अचानक मौत को केवल शोर से जोड़ने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है. यानी 100 या 150 डेसिबल जैसी किसी कथित ध्वनि सीमा का दावा तभी निर्णायक माना जा सकता है, जब मौके पर प्रमाणित उपकरण से उसका मापन हुआ हो. 

केवल तेज आवाज सुनाई देना और वास्तविक डेसिबल स्तर एक ही बात नहीं है. यही वजह है कि डीजे के मामलों में डेसिबल मीटर से मौके की जांच और उसका रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाता है.

डेसिबल मीटर बिना जांच कैसे हो

यूपी में समस्या नियमों की कमी से ज्यादा उनके पालन और निगरानी की है. लाउडस्पीकर और एम्प्लीफायर के इस्तेमाल के लिए अनुमति की व्यवस्था है. अनुमति के साथ समय और ध्वनि सीमा जैसी शर्तें भी जुड़ी होती हैं. इसके बावजूद जुलूस और आयोजनों में कई बार वास्तविक ध्वनि स्तर मापे बिना ही डीजे चलते रहते हैं. 

गोरखपुर में पुलिस ने हाल में 100 से अधिक डीजे संचालकों को नोटिस देकर निर्धारित ध्वनि मानकों का पालन करने के निर्देश दिए हैं. संचालकों को ध्वनि प्रदूषण नियमों के तहत सीमा में आवाज रखने और सक्षम अधिकारी की लिखित अनुमति के बिना एम्प्लीफायर इस्तेमाल नहीं करने को कहा गया है. 

रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक डीजे और एम्प्लीफायर के इस्तेमाल पर रोक के निर्देश भी दोहराए गए हैं. लेकिन नोटिस के बाद अगला सवाल कार्रवाई का है. कितने डीजे की मौके पर जांच हुई? कितने में डेसिबल मीटर से ध्वनि मापी गई? कितनों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई? कितने उपकरण जब्त हुए? और कितने आयोजकों की अनुमति रद्द हुई? 

इन सवालों का जवाब ही बताएगा कि ध्वनि नियंत्रण वास्तव में लागू हो रहा है या सिर्फ त्योहारों से पहले बैठकों और चेतावनियों तक सीमित है.

बलरामपुर में पुलिस ने घटना के बाद डीजे संचालकों को बुलाकर निर्देश दिए हैं. लेकिन इस घटना ने यह भी दिखाया कि कार्रवाई का सबसे प्रभावी तरीका घटना के बाद मुकदमा दर्ज करना नहीं बल्कि घटना से पहले जोखिम वाले स्थानों की पहचान करना है. 

स्कूल, अस्पताल, वृद्धाश्रम, घनी आबादी और साइलेंस जोन से जुलूस का रास्ता गुजरता है तो पहले से ध्वनि सीमा तय होनी चाहिए. मौके पर डेसिबल मीटर से जांच होनी चाहिए और उल्लंघन की स्थिति में तत्काल उपकरण बंद कराने की व्यवस्था होनी चाहिए.

बलरामपुर की वैष्णवी की मौत का अंतिम चिकित्सकीय कारण अभी जांच का विषय है. इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि उसकी जान डीजे के शोर ने ही ली. लेकिन उसकी क्लास के बाहर बजते डीजे, क्लासरूम में महसूस हुए कंपन, उसी समय बच्ची की तबीयत बिगड़ने और बाद में पुलिस की कार्रवाई ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है. 

उत्सव मनाने का अधिकार अपनी जगह है लेकिन उस उत्सव की आवाज किसी दूसरे की जिंदगी के लिए जोखिम न बन जाए, इसकी जिम्मेदारी प्रशासन, आयोजक और डीजे संचालक सभी की है.
 

डीजे के शोर से जुड़ी मौतों के प्रमुख मामले

  • दिसंबर 2025, मुजफ्फरनगर : जिले के अहरोड़ा गांव में बारात के दौरान तेज डीजे की आवाज के बीच कक्षा 9 की 14 वर्षीय छात्रा राशि की तबीयत बिगड़ने और हार्ट अटैक से मौत की खबर सामने आई. परिजनों के मुताबिक डीजे की तेज आवाज के दौरान उसकी सांस तेज चलने लगी और वह बेहोश होकर गिर गई. हालांकि जांच रिपोर्ट में डीजे की आवाज को मौत का चिकित्सकीय रूप से स्थापित कारण नहीं बताया गया है.
  • 25 अप्रैल 2026, सुल्तानपुर : बल्दीराय थाना क्षेत्र के दरियापुर गांव में बारात के साथ बज रहे तेज डीजे की आवाज से पोल्ट्री फार्म में अफरा-तफरी मचने का मामला सामने आया. फार्म संचालक साबिर अली ने आरोप लगाया कि तेज आवाज से 140 मुर्गियों की मौत हो गई.  शिकायत के बाद पुलिस ने डीजे संचालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की. यह मामला मानव स्वास्थ्य से अलग, तेज ध्वनि के पशुओं पर असर से जुड़ा है.
  • 25 अगस्त 2026, बरेली:  अलीगंज क्षेत्र के महोलिया गांव में 60 वर्षीय कमला देवी अपनी बहू के साथ मंदिर जा रही थीं. रास्ते में तेज आवाज और बेस वाला डीजे बज रहा था. परिजनों के अनुसार डीजे के पास पहुंचते ही उनके सीने में तेज दर्द हुआ, वे जमीन पर बैठ गईं और कुछ देर बाद उनकी मौत हो गई.  पुलिस के मुताबिक परिजनों ने पोस्टमार्टम कराने से इनकार कर दिया, इसलिए मौत की स्पष्ट चिकित्सकीय वजह सामने नहीं आ सकी. 
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