
उत्तर प्रदेश में प्रशासन और राजनीति की दुनिया के बीच की दूरी बहुत लंबी नहीं रही है. पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जब आईएएस, आईपीएस, पीसीएस और दूसरी प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी नौकरी छोड़कर सीधे चुनावी राजनीति में उतरे.
ऐसे कुछ अधिकारियों ने किसी स्थापित राजनीतिक दल का दामन थामा और विधानसभा या संसद तक पहुंचे तो कुछ ने अपनी पार्टी बनाकर राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश की.
2013 बैच की पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने करीब 13 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद अगस्त 2026 में इस्तीफा दिया. उनका इस्तीफा सितंबर में स्वीकार हुआ. 29 सितंबर को उन्होंने राजनीति में आने का ऐलान किया और साफ किया कि वे किसी स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने के बजाय जनता के साथ मिलकर अपनी राजनीतिक पहल शुरू करेंगी.
उत्तर प्रदेश को उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा का शुरुआती मैदान बनाया है. उन्होंने लोगों से सीधे जुड़ने के लिए वाट्सएप माध्यम का भी इस्तेमाल किया है. दिव्या मित्तल का मामला इसलिए अलग है क्योंकि उन्होंने राजनीतिक दल में जाने के बजाय खुद राजनीतिक मंच खड़ा करने का संकेत दिया है.
प्रशासनिक सेवा के दौरान मीरजापुर में ग्रामीण इलाकों में पाइप से पानी पहुंचाने की पहल और जिलाधिकारी के रूप में उनकी सार्वजनिक पहचान पहले से बनी हुई थी. आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बेंगलुरु से पढ़ाई तथा प्रशासनिक अनुभव उनके सार्वजनिक प्रोफाइल का हिस्सा हैं.
दूसरी तरफ बरेली के पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने फरवरी 2026 में राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा के गठन का ऐलान किया था. उन्होंने यूपी विधानसभा चुनाव में उतरने की घोषणा की है और बाद में राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी उतारने की बात भी कही.

यानी प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने वाले अधिकारियों के लिए एक रास्ता स्थापित दलों के साथ जाना है तो दूसरा रास्ता अपना राजनीतिक संगठन खड़ा करना भी बन रहा है.
अफसर से नेता बनने की चाह
इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं है. हर अधिकारी के राजनीति में आने की वजह अलग रही है. फिर भी यूपी के उदाहरणों को देखें तो कुछ समान कारण साफ दिखाई देते हैं. पहला कारण है प्रशासनिक अनुभव. आईएएस, आईपीएस या पीसीएस अधिकारी वर्षों तक सरकार की नीतियों को लागू करने, कानून-व्यवस्था संभालने, विकास योजनाओं की निगरानी करने और जनता से सीधे संपर्क में रहते हैं.
जिलाधिकारी या पुलिस अधिकारी के तौर पर उनका काम किसी राजनीतिक प्रतिनिधि की तरह चुनाव जीतने पर आधारित नहीं होता लेकिन उनकी सार्वजनिक पहचान जरूर बन सकती है. ऐसे अधिकारियों को अपने कार्यक्षेत्र की जमीनी समस्याओं, सरकारी मशीनरी की क्षमता और उसकी सीमाओं का प्रत्यक्ष अनुभव होता है.
दिव्या मित्तल ने अपने राजनीतिक प्रवेश की घोषणा करते हुए प्रशासनिक व्यवस्था में देरी और आम लोगों की शिकायतों का समाधान न होने जैसे अनुभवों को अपने फैसले से जोड़ा है. उनका कहना है कि राजनीति के जरिए वे उन लोगों की आवाज बनना चाहती हैं जिनकी समस्याएं सरकारी दफ्तरों में नहीं सुनी जातीं.
दूसरा कारण है निर्णय लेने की भूमिका. प्रशासनिक सेवा में अधिकारी नीतियों को लागू करते हैं जबकि राजनीति में चुना हुआ प्रतिनिधि नीतियां बनाने और राजनीतिक प्राथमिकताएं तय करने की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है. कुछ अधिकारियों के लिए यह बदलाव प्रशासनिक भूमिका से आगे जाकर सार्वजनिक नीति पर सीधे प्रभाव डालने का रास्ता हो सकता है.
तीसरा कारण है सार्वजनिक पहचान. किसी जिले का डीएम, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या बड़े सरकारी विभाग का अधिकारी लंबे समय तक मीडिया और जनता के बीच दिखाई देता है.

सोशल मीडिया के दौर में यह पहचान और व्यापक हो सकती है. दिव्या मित्तल का उदाहरण इसका ताजा नमूना है. उनके प्रशासनिक कार्यों के वीडियो और पोस्ट पहले से इंटरनेट मीडिया पर मौजूद रहे हैं और इस्तीफे के बाद उनके अगले कदम को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई.
चौथा पहलू राजनीतिक दलों की रुचि है. बड़े राजनीतिक दलों के लिए प्रशासनिक अनुभव वाले व्यक्ति कई कारणों से उपयोगी हो सकते हैं. वे शासन, कानून, अर्थव्यवस्था, प्रशासन और योजनाओं की कार्यप्रणाली को करीब से समझते हैं. साथ ही, लंबे प्रशासनिक करियर के कारण उनका सार्वजनिक परिचय भी हो सकता है. यूपी में पिछले वर्षों में कई अधिकारियों को विधानसभा, लोकसभा, विधान परिषद और संगठन में जगह मिली है.
अफसरों के राजनीति में आने का रास्ता हमेशा एक जैसा नहीं रहा. कुछ अधिकारी रिटायरमेंट के बाद राजनीति में आए. कुछ ने सेवा पूरी होने से पहले वीआरएस लिया. कुछ ने इस्तीफा देकर चुनाव लड़ा. और कुछ ने सीधे अपना राजनीतिक संगठन खड़ा किया. 2022 का विधानसभा चुनाव इसका महत्वपूर्ण उदाहरण रहा. पूर्व आईपीएस अधिकारी असीम अरुण ने नौकरी छोड़कर BJP के टिकट पर कन्नौज सदर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.
इसी चुनाव में पूर्व प्रवर्तन निदेशालय अधिकारी राजेश्वर सिंह ने वीआरएस लेकर BJP के टिकट पर सरोजनीनगर से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. इससे पहले मुंबई के पुलिस आयुक्त रहे सत्यपाल सिंह ने जनवरी 2014 में आईपीएस से इस्तीफा देकर BJP का दामन थामा और उसी वर्ष बागपत से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे.
पूर्व आईएएस अरविंद कुमार शर्मा, जिन्हें एके शर्मा के नाम से जाना जाता है, गुजरात कैडर के अधिकारी रहे और वीआरएस के बाद BJP में आए. बाद में उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी मिली.
यानी अफसरों के लिए राजनीति में प्रवेश का मॉडल केवल रिटायरमेंट के बाद पार्टी में शामिल होने तक सीमित नहीं रहा. सेवा के बीच में इस्तीफा या वीआरएस लेकर सीधे चुनाव मैदान में उतरने की परंपरा भी मजबूत हुई है.
यूपी पसंदीदा राजनीतिक मैदान
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य है. यहां लोकसभा की 80 सीटें और विधानसभा की 403 सीटें हैं. इसलिए किसी नए राजनीतिक प्रयोग के लिए यहां संभावित राजनीतिक क्षेत्र बहुत बड़ा है. यही कारण है कि प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के लिए यूपी में राजनीतिक यात्रा शुरू करना अपने आप में महत्वपूर्ण हो सकता है.
लखनऊ में अवध गर्ल्स डिग्री कालेज की प्राचार्य और राजनीतिक शास्त्र विभाग की प्रमुख बीना राय बताती हैं, “यूपी में जिलाधिकारी, मंडलायुक्त, पुलिस अधिकारी और विकास प्राधिकरणों के प्रमुख जैसे पदों पर काम करने वाले अधिकारियों का संपर्क बेहद बड़े सामाजिक दायरे से होता है.
राय के मुताबिक नौकरी के दौरान इन अधिकारियों को ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों, व्यापारियों, किसानों, छात्रों, कर्मचारियों और स्थानीय संगठनों तक से लगातार संवाद करना पड़ता है. यही प्रशासनिक अनुभव बाद में राजनीतिक संपर्कों की बुनियाद बन सकता है.
लेकिन प्रशासनिक पहचान अपने आप में राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं है. चुनावी राजनीति में संगठन, कार्यकर्ता, स्थानीय समीकरण, संसाधन, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और लगातार जनसंपर्क जैसे कई कारक काम करते हैं. यही वजह है कि अफसर से नेता
पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने वीआरएस के बाद आजाद अधिकार सेना नाम से राजनीतिक दल बनाया. इसी तरह अब अलंकार अग्निहोत्री ने राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा बनाया है और दिव्या मित्तल भी स्थापित दल से अलग नागरिकों के साथ राजनीतिक मंच बनाने की बात कर रही हैं.
यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे अफसरों के राजनीति में आने के दो मॉडल सामने आते हैं. पहला, किसी बड़े दल की राजनीतिक मशीनरी का हिस्सा बनकर चुनाव लड़ना. दूसरा, अपनी पहचान और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर स्वतंत्र राजनीतिक आधार तैयार करना.
प्रशासनिक पहचान वोट में बदलती है?
यह सबसे बड़ा सवाल है. प्रशासनिक पद पर रहते हुए किसी अधिकारी के पास अधिकार और सरकारी मशीनरी होती है. राजनीति में यही चीजें उपलब्ध नहीं रहतीं. वहां मतदाता का भरोसा, संगठन की ताकत और चुनावी नेटवर्क निर्णायक भूमिका निभाते हैं. यही वजह है कि किसी अधिकारी का लोकप्रिय या चर्चित होना और उसका चुनाव जीतना दो अलग बातें हैं.
कुछ अधिकारी चुनाव जीतकर विधानसभा या संसद पहुंचे, जबकि कुछ चुनावी राजनीति में उतरने के बावजूद आगे नहीं बढ़ सके. पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन का उदाहरण भी इसी श्रेणी में आता है. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी से राजनीतिक जुड़ाव किया और राज्यसभा के लिए नामित हुए, लेकिन चुनाव के जरिए सदन तक नहीं पहुंच सके.
पूर्व आईएएस विजय शंकर पांडे ने भी अयोध्या से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली. इससे साफ है कि प्रशासनिक करियर राजनीतिक पूंजी जरूर बन सकता है लेकिन वह अकेले चुनावी पूंजी नहीं बन जाता.
2027 से पहले बढ़ेगी हलचल
अगले साल विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं. ऐसे समय में दिव्या मित्तल और अलंकार अग्निहोत्री के उदाहरण यह सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि आने वाले समय में कितने और पूर्व अधिकारी सक्रिय राजनीति की ओर बढ़ेंगे. दिव्या मित्तल का मॉडल अभी शुरुआती चरण में है. संगठन का ढांचा, विचारधारा, सदस्यता, चुनावी रणनीति और संभावित उम्मीदवारों को लेकर तस्वीर आगे स्पष्ट होगी.
अलंकार अग्निहोत्री पहले ही अपना राजनीतिक संगठन घोषित कर चुके हैं और विधानसभा चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं. यूपी में अफसरों का राजनीति की ओर आकर्षण नया नहीं है. नया यह जरूर है कि अब प्रशासनिक अनुभव वाले कुछ लोग सिर्फ स्थापित राजनीतिक दलों में जगह तलाशने के बजाय खुद राजनीतिक संगठन खड़ा करने की कोशिश भी कर रहे हैं.
दिव्या मित्तल की घोषणा इस सिलसिले की ताजा कड़ी है. आने वाला विधानसभा चुनाव यह दिखाएगा कि प्रशासनिक अनुभव को राजनीतिक संगठन और चुनावी जनसमर्थन में बदलने का यह मॉडल किस तरह आकार लेता है.

