
दुनिया का सबसे बड़ा ऑफिस कॉम्प्लेक्स सूरत डायमंड बोर्स इस मकसद से बनाया गया था कि सूरत को वैश्विक हीरा कारोबार का केंद्र बनाया जा सके. लेकिन इसके खुलने के दो साल बाद भी इसकी ज्यादातर मंजिलें खाली और अंधेरी हैं. इसकी कई वजहों में से एक सरकार की टैक्स व्यवस्था भी है.
दुनिया में बिकने वाले हर 15 में से लगभग 14 हीरों को सूरत में तराशा जाता है. शहर लंबे समय से कच्चे हीरों के कारोबार पर भी अपना नियंत्रण चाहता रहा है. फिलहाल यह कारोबार एंटवर्प और तेजी से उभरते दुबई के जरिए होता है. लेकिन यह कोशिश अब तक सफल नहीं हो सकी है.
ऐतिहासिक रूप से कच्चे हीरों का कारोबार दो माध्यमों से होता रहा है. वैश्विक कच्चे हीरा कारोबार का करीब 65 फीसदी हिस्सा प्राइमरी मार्केट से आता है. इसमें खनन कंपनियां सीधे अनुबंधित खरीदारों, निर्माताओं और कारोबारियों को हीरे बेचती हैं.
बाकी कच्चे हीरों का कारोबार सेकेंडरी चैनलों के जरिए होता है. इनमें टेंडर, नीलामी और ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म शामिल हैं. ऐसे प्लेटफॉर्म बोनास, हेनिग, कोइन इंटरनेशनल और दूसरी कंपनियां चलाती हैं. भारत में कच्चे हीरों का कारोबार केंद्र बनने से ट्रेडिंग और मैन्युफैक्चरिंग एक साथ जुड़ सकेगी. इससे सही कीमत तय करने में मदद मिलेगी, लेनदेन और लॉजिस्टिक्स की लागत घटेगी, वैश्विक कारोबारी आकर्षित होंगे और हीरा सप्लाई चेन में भारत की वैल्यू एडिशन की हिस्सेदारी बढ़ेगी.

भारतीय निर्माता फिलहाल कच्चे हीरों को देखने और खरीदने के लिए नियमित रूप से दुबई, एंटवर्प और दूसरे वैश्विक कारोबार केंद्रों की यात्रा करते हैं. इससे लागत बढ़ती है, प्रबंधन का समय खर्च होता है और ऐसी अक्षमताएं पैदा होती हैं जिनसे बचा जा सकता है. इसलिए दुनिया के सबसे बड़े हीरा निर्माण केंद्र के करीब कच्चे हीरों का कारोबार लाना इस उद्योग के लिए स्वाभाविक अगला कदम माना जाता है.
जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (GJEPC) के कार्यकारी निदेशक सब्यसाची रे कहते हैं, "सेकेंडरी मार्केट के लेनदेन परंपरागत रूप से दुबई, एंटवर्प और हांगकांग में केंद्रित रहे हैं. इसकी वजह वहां की अनुकूल टैक्स व्यवस्था, नियामकीय स्थिरता, कारोबार में आसानी, भुगतान की लचीली व्यवस्था और विकसित वित्तीय इकोसिस्टम है. भारत में दुनिया का प्रमुख कच्चा हीरा कारोबार केंद्र बनने की क्षमता है. लेकिन इसके लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और कारोबार को आसान बनाने वाला टैक्स और नियामकीय ढांचा जरूरी है."
भारत के मुंबई और सूरत में बनाए गए स्पेशल नोटिफाइड जोन (SNZs) का उद्देश्य था कि वैश्विक खनन कंपनियां सीधे भारतीय खरीदारों को कच्चे हीरे बेच सकें. लेकिन किसी भी बिक्री पर विदेशी विक्रेता को भारत में भारी आयकर देना पड़ता था. इसलिए खनन कंपनियां यहां सिर्फ हीरे प्रदर्शित करती थीं, जबकि असली सौदा कहीं और होता था. उद्योग के अनुमान के मुताबिक, भारतीय SNZs में दिखाए गए करीब 60 फीसदी कच्चे हीरे वापस दुबई या एंटवर्प भेजे जाते थे, वहां उनकी बिक्री होती थी और फिर उन्हें दोबारा भारत लाया जाता था.
दुबई में प्रदर्शित किए गए कच्चे हीरों पर कोई डायरेक्ट टैक्स नहीं लगता. बेल्जियम में यह दर सिर्फ 0.187 फीसदी है. इसके मुकाबले भारत में विदेशी कंपनियों पर लगभग 40 फीसदी टैक्स लगता था. ऐसे में कारोबारियों के लिए फैसला आसान था.
व्यापार नीति पर विश्लेषण प्रकाशित करने वाले दिल्ली स्थित थिंक-टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के आंकड़े भी यही रुझान दिखाते हैं. भारत के कच्चे हीरा आयात में बेल्जियम की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2020 के 37.9 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2024 में 17.6 फीसदी रह गई. वहीं दुबई की हिस्सेदारी 36.3 फीसदी से बढ़कर 2025 में करीब 64.5 फीसदी हो गई.
जुलाई 2024 के केंद्रीय बजट को इस समस्या का समाधान बताया गया था. इसमें ऑनलाइन कच्चे हीरों की खरीद पर लगने वाला 2 फीसदी इक्वलाइजेशन लेवी खत्म कर दिया गया. साथ ही 'सेफ हार्बर' व्यवस्था लागू की गई, जिसके तहत विदेशी खनन कंपनियां SNZ में होने वाली बिक्री पर 4 फीसदी का तय लाभ घोषित कर सकती हैं.
लेकिन इससे कारोबार में कितना बदलाव आया, यह अलग सवाल है. एक साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी ऐसा कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है कि खनन कंपनियों ने बड़े पैमाने पर SNZs के जरिए कारोबार शुरू किया हो. उपलब्ध ताजा आंकड़ों में भी दुबई का दबदबा बरकरार है.
इस बीच सूरत की उम्मीदों को कुछ अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. वैश्विक कच्चे हीरों का बाजार मंदी में है. डी बीयर्स ने 2026 के उत्पादन का अनुमान घटा दिया है. कंपनी ने कीमतों में भी कटौती की है और अपने साइट-होल्डर्स की सूची भी छोटी की है. लैब में तैयार किए गए हीरे अब अमेरिका में होने वाली सगाई की अंगूठियों में आधे से ज्यादा हिस्सेदारी रखते हैं. वहीं एंटवर्प का हीरा कारोबार भी 2025 में 22 फीसदी से ज्यादा घट गया.
वैश्विक सुस्ती के बावजूद भारत के घरेलू बाजार की संभावनाओं का अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुआ है. अब उद्योग इसी पर दांव लगा रहा है. हीरा कारोबारियों का अनुमान है कि भारत में कच्चे हीरों का कारोबार शुरू होने से रोजगार और उद्यमिता के बड़े अवसर पैदा होंगे. इससे हीरा कारोबार, छंटाई, लॉजिस्टिक्स और इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में नई नौकरियां पैदा होंगी.
इससे भारतीय कंपनियों को वैश्विक कच्चे हीरा कारोबार में ज्यादा सक्रिय रूप से हिस्सा लेने का भी प्रोत्साहन मिलेगा. साथ ही बैंकिंग, बीमा, ट्रेड फाइनेंस और पेशेवर सेवाओं जैसे क्षेत्रों को मजबूती मिलेगी. इससे भारत के हीरा निर्माण इकोसिस्टम में निवेश, वैल्यू एडिशन और विकास को भी बढ़ावा मिलेगा.

