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चढ़ावा विवाद के बाद राम मंदिर में बदल रही दान की परंपरा

चढ़ावा चोरी विवाद के बावजूद रामलला के दर्शनार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. हालांकि श्रद्धालु अब सोने-चांदी के बजाय नकद दान को प्राथमिकता देते हुए अधिक सतर्क नजर आ रहे हैं

राम मंदिर (फाइल फोटो)
राम मंदिर (फाइल फोटो)
अपडेटेड 16 जुलाई , 2026

अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि मंदिर इन दिनों दानपात्र से कथित चढ़ावा चोरी के मामले और उससे जुड़े आरोप-प्रत्यारोप के कारण राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है. श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर उठे सवालों के बीच एसआईटी जांच चल रही है, आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो चुका है और कुछ लोगों को जेल भी भेजा जा चुका है.

हालांकि, इन घटनाक्रमों के बीच यदि अयोध्या की सड़कों, मंदिर परिसर और राम पथ पर नजर डाली जाए तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है. मंदिर के बाहर दर्शनार्थियों की लंबी कतारें हैं, घंटियों की आवाज गूंज रही है, प्रसाद और पूजा सामग्री की दुकानें श्रद्धालुओं से भरी हैं और पूरे शहर में धार्मिक उत्साह पहले की तरह कायम है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस विवाद का श्रद्धालुओं की आस्था पर कोई प्रत्यक्ष असर नहीं दिख रहा. 21 जून से 14 जुलाई के बीच महज 24 दिनों में 21 लाख से अधिक श्रद्धालु रामलला के दर्शन कर चुके हैं. केवल तीन दिनों में दर्शनार्थियों की संख्या 70 से 80 हजार के बीच रही, जबकि बाकी अधिकांश दिनों में औसतन 80 हजार से अधिक भक्त मंदिर पहुंचे.

कई अवसरों पर यह संख्या एक लाख का आंकड़ा भी पार कर गई. मंदिर प्रशासन और स्थानीय जानकारों के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में इस अवधि में श्रद्धालुओं की संख्या लगभग 20 फीसद अधिक रही है. जून के पहले सप्ताह में चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुरोध पर योगी सरकार ने तत्काल एसआईटी जांच शुरू कराई.

आठ प्राथमिक जांच रिपोर्ट आने के बाद ट्रस्टी डॉ. कृष्णमोहन की तहरीर पर रामजन्मभूमि थाने में मुकदमा दर्ज हुआ और आरोपितों को जेल भेजा गया. इसके बावजूद मंदिर में आने वाले भक्तों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट नहीं आई. मंदिर के प्रवेश द्वार पर श्रद्धा का वही प्रवाह बना रहा जिसने यह संकेत दिया कि विवाद और आस्था को अधिकांश श्रद्धालु अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं.

'जांच हो, लेकिन मंदिर की गरिमा पर आंच नहीं'

अयोध्या में स्थानीय लोगों, पुजारियों, दुकानदारों और श्रद्धालुओं से बातचीत में एक समान भावना सामने आती है. अधिकांश लोगों का कहना है कि यदि दान के प्रबंधन में कहीं भी गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए. लेकिन, वे यह भी चाहते हैं कि इस पूरे विवाद को राम मंदिर की पवित्रता या अयोध्या की धार्मिक पहचान से नहीं जोड़ा जाए.

टूर एंड ट्रैवल ऑपरेटर सत्येंद्र त्रिपाठी कहते हैं, "राम मंदिर के निर्माण के लिए कई पीढ़ियों ने इंतजार किया. अनगिनत लोगों ने अपना जीवन इस आंदोलन को समर्पित कर दिया. अगर दान के प्रबंधन में कोई गड़बड़ी हुई है तो कानून अपना काम करे लेकिन इससे मंदिर की पवित्रता पर सवाल नहीं उठने चाहिए." हनुमानगढ़ी और रामजन्मभूमि क्षेत्र के आसपास भी ऐसी ही सोच देखने को मिलती है.

स्थानीय दुकानदार नंदलाल गुप्ता कहते हैं, "भारत के हर कोने से लोग यहां श्रद्धा लेकर आते हैं, राजनीति करने नहीं. पिछले कुछ वर्षों में अयोध्या का अभूतपूर्व विकास हुआ है. लोग अयोध्या को भगवान राम के कारण याद रखें, विवादों के कारण नहीं." स्थानीय निवासी महंत राजेश दास का मानना है कि पारदर्शिता धार्मिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का आधार है. उनके शब्दों में, "आस्था व्यक्तियों से ऊपर होती है. यदि गलतियां हुई हैं तो उनकी जांच हो और जवाबदेही तय हो, लेकिन इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ का माध्यम नहीं बनने देना चाहिए." 

रिटायर्ड शिक्षक वी. एन. अरोड़ा भी इसी भावना को आगे बढ़ाते हैं. वे कहते हैं, "हमारे बुजुर्गों ने दशकों तक संघर्ष देखा, अदालतों की लड़ाई देखी. उस लंबे इतिहास को किसी एक विवाद के कारण नहीं भुलाया जा सकता. न्याय भी जरूरी है और अयोध्या की गरिमा भी." हालांकि सभी प्रतिक्रियाएं एक जैसी नहीं हैं. सुल्तानपुर से दर्शन करने आईं सृष्टि श्रीवास्तव अपनी नाराजगी भी जताती हैं. उनका कहना है, "हम जो दान करते हैं, वह मंदिर के रखरखाव और श्रद्धालुओं की सेवा के लिए होता है. यह किसी की जेब में जाने के लिए नहीं है. इसलिए यदि चोरी हुई है तो दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए." यानी, अयोध्या में आस्था और जवाबदेही दोनों की मांग साथ-साथ चल रही है.

दान जारी, लेकिन बदल गया चढ़ावे का स्वरूप

यदि इस विवाद का सबसे स्पष्ट प्रभाव कहीं दिखाई देता है तो वह दान देने की शैली में है. पड़ताल में सामने आया कि श्रद्धालु दान देना बंद नहीं कर रहे, बल्कि पहले की तुलना में कहीं अधिक सतर्क होकर दान कर रहे हैं. मंदिर के भीतर चढ़ावा व्यवस्था से जुड़े कर्मचारियों के अनुसार कुछ महीने पहले तक दानपात्रों में नोटों के साथ बड़ी संख्या में सोने-चांदी के आभूषण, अंगूठियां, चेन, झुमके, कंगन, ब्रेसलेट और बहुमूल्य सिक्के मिलना सामान्य बात थी. 

कई श्रद्धालु भावुक होकर अपने शरीर पर पहने आभूषण तक भगवान को अर्पित कर देते थे. चढ़ावा गणना के दौरान नोटों के बीच से ये आभूषण निकलते थे और उन्हें अलग सुरक्षित रखा जाता था. अब तस्वीर बदल चुकी है. मंदिर परिसर में कार्यरत एक कर्मचारी, जिन्होंने नाम प्रकाशित न करने का अनुरोध किया, बताते हैं कि चोरी की घटना सामने आने के बाद श्रद्धालु पहले की तरह श्रद्धा से दान तो कर रहे हैं, लेकिन अब बहुमूल्य वस्तुएं दान करने से बच रहे हैं. बड़े नोटों की अपेक्षा छोटे मूल्य के नोट अधिक मिल रहे हैं और सोने-चांदी के आभूषण लगभग न के बराबर रह गए हैं. 

चढ़ावा गणना से जुड़े एक अन्य कर्मचारी के अनुसार, "पहले जब दानपात्र खोले जाते थे तो नोटों के बीच से सोने-चांदी के सिक्के और आभूषण मिलना सामान्य बात थी. अब कई-कई दिनों तक ऐसा कुछ नहीं मिलता. पिछले दस दिनों में दानपात्र से कोई भी बहुमूल्य आभूषण नहीं निकला." यानी श्रद्धालुओं की आस्था बरकरार है, लेकिन उन्होंने अपने दान के तरीके में सावधानी जोड़ दी है. यह बदलाव बताता है कि भक्त भगवान पर तो पहले जैसा ही भरोसा रखते हैं, लेकिन दान के प्रबंधन को लेकर अधिक पारदर्शिता और सुरक्षा चाहते हैं. बैंक अधिकारियों के अनुसार दानपात्रों में प्रतिदिन लगभग 18 से 20 लाख रुपये की नकद धनराशि अभी भी प्राप्त हो रही है. इससे स्पष्ट है कि नकद दान की प्रवृत्ति बनी हुई है, जबकि बहुमूल्य वस्तुओं का दान कम हो गया है.

पारदर्शिता बढ़ाने के प्रयास और कर्मचारियों की चुनौती

चढ़ावा चोरी के मामले के बाद मंदिर प्रशासन ने कुछ व्यवस्थाओं में बदलाव भी किए हैं. अब यदि कोई श्रद्धालु सोने-चांदी का बहुमूल्य आभूषण दान करना चाहता है तो उसके लिए अलग प्रक्रिया बनाई गई है. दान देने वाले का नाम, पता और आभूषण का पूरा विवरण तत्काल दर्ज किया जाता है. इसके लिए एक कर्मचारी अलग से नियुक्त किया गया है.पहले ऐसी औपचारिक व्यवस्था नहीं थी. इन कदमों का उद्देश्य श्रद्धालुओं में भरोसा कायम करना और दान की पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है. हालांकि इसके समानांतर एक दूसरी चुनौती भी सामने आई है. 

जानकारी के अनुसार चढ़ावा गणना व्यवस्था इस समय कर्मचारियों की कमी से जूझ रही है. बताया जाता है कि 23 कर्मचारियों के एक साथ काम छोड़ने के बाद अब तक उनकी जगह नई नियुक्तियां नहीं हो सकी हैं. वर्तमान में केवल 13 कर्मचारी ही प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक दान की गणना का कार्य संभाल रहे हैं. स्थिति यह है कि पहले जहां छह-छह घंटे की दो शिफ्टों में काम होता था, वहीं अब एक लंबी शिफ्ट में पूरा काम कराया जा रहा है.

कर्मचारियों का कहना है कि काम का दबाव बढ़ गया है, लेकिन पारिश्रमिक में कोई बदलाव नहीं हुआ. थर्ड पार्टी एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों को लगभग 15 हजार रुपये मासिक वेतन मिलने की बात सामने आई है, जिसे लेकर लंबे समय से असंतोष भी बताया जाता है. कर्मचारियों की कमी के कारण अब कई बार बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों को भी स्वयं काउंटिंग प्रक्रिया में सहयोग करना पड़ रहा है. साथ ही वे नियमित रूप से काउंटिंग रूम का निरीक्षण भी कर रहे हैं, ताकि निगरानी और जवाबदेही मजबूत हो सके.

आस्था बनाम विवाद : अयोध्या की नई तस्वीर

मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में पिछले कुछ सप्ताह में मामूली कमी जरूर दर्ज की गई है, लेकिन सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों का कहना है कि इसका मुख्य कारण मौसम है, न कि विवाद. उनके अनुसार उमस, बारिश और गर्मी की छुट्टियां समाप्त होने के बाद स्कूल खुलने से इस समय हर वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या कुछ कम हो जाती है. इसे चढ़ावा विवाद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. राम पथ पर चलते हुए यह स्पष्ट महसूस होता है कि राष्ट्रीय स्तर पर चल रही राजनीतिक बहस का असर स्थानीय धार्मिक जीवन पर सीमित है. बाजारों में प्रसाद, पूजा सामग्री और स्मृति चिह्न बेचने वाली दुकानों पर पहले जैसी चहल-पहल है. मंदिर परिसर में दर्शन की व्यवस्था सामान्य रूप से चल रही है और श्रद्धालुओं के चेहरे पर विवाद से अधिक भगवान राम के दर्शन की उत्सुकता दिखाई देती है. 

इस पूरे घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक संकेत भी दिया है. भक्तों की आस्था में कमी नहीं आई है, लेकिन वे धार्मिक संस्थाओं से पहले की तुलना में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा कर रहे हैं. यही कारण है कि नकद दान जारी है, लेकिन बहुमूल्य आभूषणों के दान में स्पष्ट कमी दिखाई दे रही है. लोग भगवान पर नहीं, बल्कि दान प्रबंधन की व्यवस्था पर अधिक निगरानी चाहते हैं. 

अयोध्या की मौजूदा तस्वीर इस मायने में दिलचस्प है कि यहां दो समानांतर भावनाएं एक साथ मौजूद हैं. पहली, भगवान राम के प्रति अटूट श्रद्धा, जिसने लाखों लोगों को लगातार मंदिर तक पहुंचाया है. दूसरी, यह स्पष्ट अपेक्षा कि श्रद्धालुओं की ओर से अर्पित प्रत्येक दान का उपयोग पूरी ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ हो. यही कारण है कि चढ़ावा चोरी के आरोपों और जांच के बावजूद मंदिर के द्वार पर आस्था की धारा अविरल बह रही है, जबकि दान देने का तरीका पहले की तुलना में कहीं अधिक सोच-समझकर अपनाया जा रहा है.

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