
राजस्थान में बच्चों के लिए भेजा जाने वाला दूध कथित तौर पर अक्सर उन तक नहीं पहुंच रहा है. ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं कि स्कूली बच्चों को दिया जाने वाला दूध पाउडर या तो कथित तौर पर खुले बाजार में बेचा जा रहा है या फिर पुराने स्टॉक के मामले में उसके खराब होने का खतरा बना हुआ है.
इसका नतीजा यह है कि हजारों छात्रों के आहार में पोषण बढ़ाने के लिए बनाई गई राज्य सरकार की प्रमुख योजना कागजों तक सिमटती जा रही है.
पन्नाधाय बाल गोपाल योजना का लाभ राजस्थान के करीब 65,000 सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 69 लाख से अधिक बच्चों को मिलना है. इस योजना के तहत प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के छात्रों को गर्म दूध उपलब्ध कराया जाना है.
लेकिन शिक्षा विभाग के आंतरिक आंकड़ों के मुताबिक, राज्यभर में दूध की आपूर्ति में 58 फीसदी की कमी है. इससे पता चलता है कि खरीद से लेकर भुगतान, परिवहन और निगरानी तक आपूर्ति व्यवस्था कई स्तरों पर बाधित है.
हाल में तीन महीने तक की गई निगरानी के दौरान राजस्थान ने योजना के लिए स्किम्ड मिल्क पाउडर की जरूरत 3,756.43 मीट्रिक टन आंकी. इसके मुकाबले सिर्फ 1,573.81 मीट्रिक टन की आपूर्ति हुई जो जरूरत का 41.9 फीसदी है. 41 में से कम से कम 17 शैक्षणिक जिलों में स्कूलों तक दूध पाउडर की एक भी खेप नहीं पहुंची. अलवर, भरतपुर, उदयपुर, बीकानेर और कोटा जैसे कई बड़े जिलों में दूध वितरण पूरी तरह बंद रहा.
तत्काल समस्या सरकार की खरीद और वितरण व्यवस्था के भीतर गहराई तक नजर आती है. राज्य शिक्षा विभाग और राजस्थान कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन (RCDF) सुचारू आपूर्ति व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहे हैं.
बताया गया है कि महीनों पहले आवंटन को मंजूरी मिल गई थी लेकिन खरीद और वितरण की प्रक्रिया रुकी रही. डेयरी फेडरेशनों को किए जाने वाले भुगतान ने भी समस्या को और जटिल बना दिया.

इसके साथ ही ब्लैक मार्केट का खतरा भी सामने आया है. जब सरकारी स्कूल दूध के लिए जूझ रहे हैं, तब जांच में सामने आया कि बच्चों के लिए भेजे गए कुछ स्टॉक को ही बाजार में पहुंचाया जा रहा था.
जयपुर जिले के चिथवाड़ी गांव में पुलिस ने करीब 3,000 किलोग्राम सरकारी दूध पाउडर ले जा रहे एक वाहन को पकड़ा. बताया गया कि इन बोरियों पर ‘बिक्री के लिए नहीं- केवल स्कूलों में आपूर्ति के लिए’ लिखा था. आरोप है कि इस दूध पाउडर को खोया (मावा) बनाने वालों तक पहुंचाया जा रहा था.
इसके बाद RCDF ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और एफआईआर दर्ज की गई. जांचकर्ताओं ने पाया कि स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति के रिकॉर्ड में कथित तौर पर हेरफेर की गई थी. इसमें दूध की अधिक खपत या अतिरिक्त स्टॉक दिखाया गया जिससे दूध पाउडर को कथित तौर पर निकालकर बेचने में मदद मिली.
अब समझिए कि यह योजना कैसे काम करती है. RCDF दूध पाउडर की आपूर्ति करता है. वह दूध की खरीद करता है और अतिरिक्त दूध को पाउडर में बदल देता है. स्कूलों में इस दूध पाउडर को गर्म पानी में मिलाकर दूध तैयार किया जाता है.
आपूर्ति संकट ने खाद्य सुरक्षा से जुड़ी दुविधा भी पैदा कर दी है. जब्त किए गए स्टॉक में एक्सपायर्ड दूध पाउडर भी शामिल था. नई खरीद में देरी के कारण स्कूलों के पास पिछली अवधि का बचा हुआ स्टॉक रह गया है.
शिक्षा विभाग ने स्कूलों को चेतावनी जारी कर दूध पाउडर इस्तेमाल करने से पहले उसके निर्माण और मियाद खत्म होने की तारीख जांचने को कहा है.
राजस्थान सरकार स्टॉक का ऑडिट करा रही है, लेकिन कितनी मात्रा में दूध पाउडर की हेराफेरी हुई है, यह अभी साफ नहीं है. राजस्थान के शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश यादव कहते हैं, "हमने आदेश दिया है कि किसी भी एक्सपायर्ड वस्तु को छात्रों को न दिया जाए. जहां भी स्टॉक में कोई अंतर मिलेगा, वहां पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं मिलने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी."
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जिनके कार्यकाल में 2022 में पन्नाधाय बाल गोपाल योजना शुरू की गई थी, ने इस व्यवस्था में आई रुकावट और कल्याणकारी योजनाओं को कथित तौर पर जानबूझकर कमजोर करने को लेकर BJP सरकार पर निशाना साधा है.
गहलोत ने दावा किया है कि बच्चे दूध का इंतजार कर रहे हैं जबकि सरकारी आपूर्ति खुले बाजार में बेची जा रही है. उन्होंने कथित ब्लैक मार्केट नेटवर्क की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है.
हालांकि भजनलाल शर्मा सरकार के सामने इससे भी बुनियादी सवाल है. आखिर पन्नाधाय बाल गोपाल योजना में इतनी बड़ी आपूर्ति की कमी क्यों पैदा हुई? जबकि राजस्थान के बच्चे पहले से ही पोषण से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.
हालिया स्वास्थ्य आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के आहार में पोषक तत्वों की व्यापक कमी है. एनीमिया और कम वजन की समस्या भी गंभीर बनी हुई है. सिर्फ दूध से बच्चों में कुपोषण की समस्या दूर नहीं हो सकती.
लेकिन जब सरकार की कोई योजना इसे नियमित पोषण के पूरक के तौर पर देने का वादा करती है तो उसे व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध न करा पाना उन बच्चों से एक जरूरी सुविधा छीनने जैसा है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है.
राज्य के सतत विकास लक्ष्यों के डैशबोर्ड में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (2023-24) के ताजा आंकड़ों का हवाला दिया गया है. इसके मुताबिक, पांच साल से कम उम्र के 33.3 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं और पांच साल की उम्र के 29.6 फीसदी बच्चे अविकसित कद वाले हैं.
यह बताता है कि कई बच्चे पहले से ही पोषण संबंधी कमजोरियों के साथ स्कूल पहुंचते हैं. ऐसे में जब स्कूली बच्चों के लिए भेजा गया सरकारी दूध कथित तौर पर मिठाई की दुकानों तक पहुंच रहा हो तो समस्या सिर्फ खरीद में देरी तक सीमित नहीं है. यह ऐसी पोषण योजना की तस्वीर पेश करता है, जिसकी गहन जांच और जवाबदेही तय किए जाने की सख्त जरूरत है.

