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राजस्थान के स्कूल विवाद में CJP और BJP के लिए क्या सबक छिपे हैं?

जयपुर जिले के रामपुरा-कंवरपुरा में स्कूल विवाद पर CJP और ग्रामीणों की भिड़ंत ने दिखाया कि जमीनी मुद्दे कैसे राजनीतिक रंग ले सकते हैं. इस पूरे घटनाक्रम में CJP और BJP, दोनों के लिए कई सबक छिपे हैं

CJP कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के बीच हाथापाई
अपडेटेड 26 अगस्त , 2026

जयपुर जिले का रामपुरा-कंवरपुरा करीब 700 मतदाताओं वाला गांव है. यहां ज्यादातर आबादी ब्राह्मणों की है और गांव को आम तौर पर सत्तारूढ़ BJP का समर्थक माना जाता है. यह बगरू विधानसभा क्षेत्र में आता है जहां 2023 से कैलाश चंद वर्मा विधायक हैं.

41 वर्षीय वर्मा ने पहली बार 2013 में यह सीट जीती थी लेकिन 2018 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. वे राजस्थान विश्वविद्यालय से सामाजिक विज्ञान में पीएचडी कर चुके हैं.

21 अगस्त को रामपुरा-कंवरपुरा अचानक मीडिया की सुर्खियों में आ गया जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपने सह-संस्थापक और प्रवक्ता आशुतोष रांका के गांव के सरकारी स्कूल जाने की घोषणा की. 

यह दौरा CJP के 'स्कूल ठीक करो' अभियान का हिस्सा था. इस अभियान के तहत संगठन ने कार्यकर्ताओं और आम लोगों से गांवों के स्कूलों की स्थिति का वीडियो बनाने और उसे सामने लाने की अपील की है ताकि सरकारों को जवाबदेह ठहराया जा सके.

रामपुरा-कंवरपुरा जयपुर विकास प्राधिकरण की सीमा के किनारे बसा है. गांव के कुछ शहरीकृत मकानों के ऊपर ऊंची इमारतें नजर आती हैं. लेकिन यहां कई गलियों में पक्की सड़कें नहीं हैं और नालियों का पानी खुले में बहता है.

गांव के एक निवासी के मुताबिक, यहां के रहने वाले गेंदबाज अशोक शर्मा ने 2026 में इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) में डेब्यू किया था. एक बुजुर्ग ग्रामीण ने इंडिया टुडे की टीम से अपने घर पर चाय पीने का आग्रह किया. 

CJP कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उनके साथ मारपीट हुई और गाड़ियों के साथ तोड़फोड़ की गई
CJP कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उनके साथ मारपीट हुई और गाड़ियों के साथ तोड़फोड़ की गई

वहीं हाल ही में CA फाउंडेशन की परीक्षा पास करने वाली एक युवती ने चाय परोसी. उसने यूनिवर्सिटी महारानी कॉलेज से कॉमर्स में स्नातक किया है. वह गांव से जयपुर आने-जाने के लिए रोज बस से करीब एक-एक घंटे का सफर करती थी.

उस युवती के घर के सामने ही ग्रामीणों का बनाया एक मंदिर है जिस पर करीब 1.25 करोड़ रुपए खर्च होने की बात कही जाती है. उसके बाहर बढ़ते तनाव में युवती की खास दिलचस्पी नहीं दिखी. 

मंदिर के एक तरफ जर्जर प्राथमिक स्कूल है जिसे एक साल पहले असुरक्षित घोषित किया जा चुका है. दूसरी तरफ किसान लाल चंद शर्मा की ओर से उपलब्ध कराया गया अस्थाई स्कूल है. दो बीघा जमीन के मालिक लाल चंद ने बच्चों के लिए जगह बनाने के लिए अपने मवेशियों को दूसरी जगह कर दिया है.

CJP के दौरे से नाराज एक युवक ने कहा, “अगर हम यह मंदिर बना सकते हैं तो नया स्कूल बनाने के लिए भी पैसा बचा सकते हैं और दान दे सकते हैं.” इसके साथ ही उसका कहना था, “हम नहीं चाहते कि कोई बाहरी व्यक्ति प्रचार के लिए यहां आए. हम सिर्फ चाहते हैं कि सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी करे. स्कूल की मरम्मत और दोबारा निर्माण के लिए कुछ पैसा पहले ही मंजूर हो चुका है.”

कई ग्रामीणों ने पहले ही तय कर लिया था कि वे CJP को स्कूल के आसपास नहीं आने देंगे. कुछ लोगों ने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से उनका रास्ता रोकने का सुझाव दिया. कुछ ने मीडिया से अपनी गाड़ियां दूर खड़ी करने को कहा ताकि CJP कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के बीच टकराव होने पर गाड़ियां नुकसान से बच सकें.

इसके बाद CJP कार्यकर्ता वहां पहुंचे. उनकी संख्या उन्हें रोकने के लिए जमा हुए स्थानीय लोगों से ज्यादा थी. एक ग्रामीण ने उन्हें 'कॉकरोच' कहकर ताना मारा. इसके बाद कहासुनी हुई और फिर हाथापाई शुरू हो गई. 

राजस्थान में सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतें कोई असामान्य बात नहीं है (सांकेतिक तस्वीर)
पिछले साल झालावाड़ के एक स्कूल का एक कमरा ढहने से 7 बच्चों की मौत हो गई थी (सांकेतिक तस्वीर)

CJP कार्यकर्ता रेखा शर्मा का मोबाइल फोन छीनकर तोड़ दिया गया. उनके साथ शिवानी शर्मा नाम की एक अन्य महिला भी थीं जिन्होंने खुद को इंजीनियर बताया. स्थानीय लोगों ने गांव की कुछ महिलाओं को बुलाया जिन्होंने दोनों महिलाओं को वहां से निकालकर पास की सुरक्षित जगह पहुंचाया.

कई वाहनों को भी निशाना बनाया गया. CJP कार्यकर्ताओं की एक SUV समेत कम से कम 12 वाहनों के शीशे लाठियों और पत्थरों से तोड़ दिए गए. एक व्यक्ति ने अपना खून से सना हाथ दिखाते हुए दावा किया, “मैंने चार तोड़े.”

ज्यादातर CJP कार्यकर्ता जल्दी वहां से निकल गए. ऐसा लगता है कि स्थानीय लोगों को CJP कार्यकर्ताओं को स्कूल में प्रवेश से रोकने के लिए पहले ही तैयार किया गया था. मौके पर पुलिस की एक गाड़ी और राज्य खुफिया विभाग के कुछ कर्मचारी भी मौजूद थे.

ग्रामीणों की ओर से दान की गई जमीन पर बना यह करीब 40 साल पुराना स्कूल लगभग पांच साल से खराब स्थिति में है. स्थानीय लोग समय-समय पर खुद इसकी मरम्मत करते रहे हैं. 

राजस्थान में करीब 6.5 लाख स्कूल कमरों में से 80 हजार से ज्यादा के असुरक्षित होने का अनुमान है. वहीं करीब 65 हजार स्कूलों में से लगभग 1 फीसदी के पास अपनी इमारत ही नहीं है.

राजस्थान में प्राथमिक स्कूलों का शेड या अस्थाई जगहों पर चलना कोई असामान्य बात नहीं है. माता-पिता के लिए अक्सर यह ज्यादा जरूरी होता है कि बच्चों को घर के पास किसी तरह पढ़ाई मिलती रहे, बजाय इसके कि वे पक्की इमारत बनने का इंतजार करें. 

लेकिन समस्या की गंभीरता पिछले साल तब सामने आई जब मरम्मत के बाद भी एक कमरा ढह गया और सात छात्रों की मौत हो गई. यह घटना पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के विधानसभा क्षेत्र झालावाड़ में हुई थी.

राजस्थान में सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतें कोई असामान्य बात नहीं है (सांकेतिक तस्वीर)
राजस्थान में सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतें कोई असामान्य बात नहीं है (सांकेतिक तस्वीर)

पिछले साल बारिश के दौरान ऐसी और इमारतें गिरीं और लोग घायल हुए. इसके बाद राजस्थान हाई कोर्ट ने स्कूलों का सर्वे कराने का आदेश दिया. इस सर्वे में सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे राजस्थान के बच्चों के लिए मौजूद जानलेवा हालात से जुड़े चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए.

मीडिया पिछले कई वर्षों से इस समस्या को उजागर करता रहा है. अधिकारियों का कहना है कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद स्कूलों में पढ़ाई मुफ्त हो गई और मरम्मत के लिए इस्तेमाल होने वाली बिल्डिंग डेवलपमेंट फंड की व्यवस्था खत्म हो गई. 

अब स्कूलों को सालाना सिर्फ 10,000 रुपए मिलते हैं जो खेल के मैदानों की सफाई के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं.

यह ऐसा मामला है जिसमें नीतियां बनाने वालों ने अपने फैसलों के जमीनी असर को ठीक से नहीं समझा. लेकिन राज्य सरकार भी मौजूदा इमारतों के रखरखाव और नई इमारतें बनाने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराने में नाकाम रही है.

आलोचकों का कहना है कि पिछले साल राजस्थान के स्कूलों की मरम्मत और दोबारा निर्माण के लिए अनुमानित करीब 6,000 करोड़ रुपए उपलब्ध कराना असंभव नहीं था. पिछली कांग्रेस सरकार पर महंगी परियोजनाओं को प्राथमिकता देने के लिए भी सवाल उठे थे. 

इनमें 1,500 करोड़ रुपए की लागत वाला कोटा रिवरफ्रंट शामिल था. इसके अलावा हजारों करोड़ रुपये बड़ी मूर्तियों और स्मारकों, सड़क अंडरपास और ऐसी इमारतों पर खर्च किए गए, जिनका हमेशा इस्तेमाल नहीं हो पाया.

साफ है कि प्राथमिकताएं स्कूल, सार्वजनिक परिवहन, गांव और शहर की सड़कें, नालियां और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर खर्च से हट गई हैं. 

CJP के अभियान ने दिखाया है कि सोशल मीडिया के जरिए ऐसे बुनियादी मुद्दों को भी तेजी से लोगों तक पहुंचाया जा सकता है. क्या यही वजह थी कि 21 अगस्त की सुबह शिक्षा विभाग ने रामपुरा-कंवरपुरा स्कूल में नए बोर्ड और दूसरी सामग्री जल्दबाजी में पहुंचा दी?

दोपहर तक शिक्षा विभाग के अधिकारी वहां पहुंच गए और कुछ ही घंटों में स्कूल को गांव की एक बेहतर इमारत में स्थानांतरित कर दिया गया. बाद में CJP सदस्यों ने आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस ने उन्हें स्कूल तक पहुंचने के लिए सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई. 

पुलिस का कहना था कि CJP ने न तो सुरक्षा मांगी थी और न ही दौरे की अनुमति ली थी. आखिरकार CJP और विरोध कर रहे ग्रामीणों, दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई.

रामपुरा-कंवरपुरा स्कूल को असुरक्षित घोषित किए जाने के बाद सरकार ने छात्रों को 3.5 किलोमीटर दूर बीलवा के एक स्कूल में भेजने की योजना बनाई थी. लेकिन ज्यादा दूरी होने के कारण बहुत कम बच्चे वहां जा सके. इसके बाद पूर्व पशुशाला की जगह को अस्थाई स्कूल के तौर पर इस्तेमाल किया गया. इसके बाद छात्रों की संख्या में काफी गिरावट आई.

CJP के अभियान के राजनीतिक संदर्भ ने भी तनाव बढ़ा दिया है. राजस्थान में अगले महीने स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं और उसके बाद पंचायत चुनाव होंगे. 

BJP कार्यकर्ताओं और कुछ ग्रामीणों को डर है कि CJP कार्यकर्ता स्कूल के मुद्दे का इस्तेमाल गांव में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरने के लिए कर रहे हैं.

हालांकि पूरा गांव न तो CJP के विरोध में था और न ही सरकार के समर्थन में. कुछ ग्रामीणों ने चुपचाप बताया कि स्कूल की खराब हालत के कारण उनका मतदान केंद्र भी खत्म हो गया. कुछ ने सरकार पर उनकी समस्याओं से आंखें मूंदने का आरोप लगाया.

एक ग्रामीण ने विधायक वर्मा के इस दावे पर सवाल उठाया कि उन्होंने स्कूल की मरम्मत के लिए 12 लाख रुपए दिए हैं. उसने पूछा कि 21 अगस्त की सुबह ढहते स्कूल भवन पर काम मंजूर होने का दावा करने वाले पोस्टर क्यों लगाए गए जबकि वास्तव में पैसा कलेक्टर की ओर से मंजूर किया गया था.

क्या 21 अगस्त का टकराव टाला जा सकता था? CJP के कुछ कार्यकर्ता उस घटना के बाद सदमे में थे और रो रहे थे. उन्होंने अपने साथ गंभीर मारपीट होने का आरोप लगाया. लेकिन CJP प्रशासन को बचाव की मुद्रा में लाने में सफल रही. 

इससे एक राजनीतिक सवाल उठता है: अगर CJP कार्यकर्ताओं को हर बार रोका जाता है तो क्या BJP अनजाने में उसका कद और प्रचार बढ़ाने का जोखिम नहीं उठा रही?

CJP के लिए भी इसमें एक अहम सबक है: टकराव से सुर्खियां तो मिल सकती हैं, लेकिन इसके ऐसे नतीजे भी हो सकते हैं, जो तत्काल प्रचार से कहीं आगे तक असर डालें.

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