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पिनराई विजयन को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली लेकिन मुश्किल अभी टली नहीं

भ्रष्टाचार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिनराई विजयन, उनकी बेटी और दामाद से जुड़ी कार्यवाही पर फिलहाल एक हफ्ते की रोक लगाई है, हालांकि अदालत ने आरोपों के गुण-दोष पर कोई फैसला नहीं दिया है और कानूनी लड़ाई अभी जारी है

केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन (फाइल फोटो)
अपडेटेड 22 अक्टूबर , 2026

कॉरपोरेट भ्रष्टाचार से जुड़े CMRL-एक्सालॉजिक मामले में सुप्रीम कोर्ट से केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और उनके परिवार को फिलहाल राहत मिली है. हालांकि यह फैसला न तो उन्हें आरोपों से बरी करता है और न ही मामले का अंत है. पूर्व मुख्यमंत्री के साथ इस मामले में उनकी बेटी टी. वीणा और पूर्व पर्यटन मंत्री व उनके दामाद पी. ए. मोहम्मद रियास आरोपी हैं.

जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की अवकाशकालीन पीठ ने 20 अक्टूबर को कथित CMRL-एक्सालॉजिक लेनदेन से जुड़ी एफआईआर के आधार पर आगे की कार्यवाही पर आंशिक रोक लगा दी. साथ ही केरल हाई कोर्ट की खंडपीठ को याचिकाकर्ताओं की अपीलों पर विचार करने का निर्देश दिया. सतर्कता मामले की कार्यवाही पर यह रोक सिर्फ एक हफ्ते के लिए है इसलिए यह साफ तौर पर अस्थाई राहत है. हालांकि इसका राजनीतिक महत्व इससे कम नहीं हो जाता.

कई महीनों से यह मामला CPM के सबसे प्रभावशाली नेता के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है. हर अदालती आदेश, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के बयान और नए आरोप के साथ यह संकट और गहराता गया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह संकट खत्म नहीं हुआ है लेकिन इसकी रफ्तार जरूर धीमी पड़ी है.

सुप्रीम कोर्ट ने जिन बातों को अहम माना, उनमें सिर्फ आरोपों की प्रकृति ही नहीं बल्कि कानूनी प्रक्रिया का तरीका भी शामिल है. पीठ ने केरल हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश की इस टिप्पणी से असहमति जताई कि कार्यवाही किसी खास व्यक्ति के खिलाफ नहीं थी. 

विजयन की बेटी टी. वीणा (फाइल फोटो)
विजयन की बेटी टी. वीणा (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग कानून की धारा 66(2) के तहत जारी किए गए संवादों में याचिकाकर्ताओं को स्पष्ट रूप से संदेह के दायरे में रखा गया था. पहले दर्ज की गई टिप्पणियां एफआईआर को चुनौती देने के उनके अधिकार को भी प्रभावित कर सकती थीं.

इस तरह अदालत ने उस समस्या को पहचाना जो अक्सर राजनीतिक रूप से संवेदनशील जांचों के केंद्र में होती है. क्या किसी व्यक्ति को गंभीर कानूनी नतीजों वाली प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है जबकि उसे उन धारणाओं को चुनौती देने का पर्याप्त अवसर ही न दिया जाए, जिनके आधार पर कार्रवाई की जा रही है?

पिनराई विजयन और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि एफआईआर दर्ज करने का रास्ता खोलने वाले निर्देश उन लोगों को सुने बिना जारी किए गए, जिन पर इसका सीधा असर पड़ना था. इससे प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ. 

लूथरा ने कहा, "पिनराई 82 साल के हैं और उन्हें महज संदेह के आधार पर हिरासत में लिए जाने और गिरफ्तारी सहित कठोर दंडात्मक कार्रवाई का तत्काल खतरा है." सुप्रीम कोर्ट इस बात से सहमत नजर आया कि प्रक्रिया से जुड़े सवालों की गहराई से जांच की जानी चाहिए.

यह आदेश उस प्रवृत्ति पर भी परोक्ष सवाल उठाता है जो अब देश की राजनीति में आम होती जा रही है. कई बार किसी जांच की प्रक्रिया दोष साबित होने से बहुत पहले ही अपनी रफ्तार पकड़ लेती है. अदालतें अंततः ऐसी कार्यवाही की वैधता पर फैसला कर सकती हैं लेकिन उसके राजनीतिक नतीजे अक्सर उससे पहले ही सामने आने लगते हैं.

पिनराई को फिलहाल तत्काल राहत मिली है. सतर्कता के मामलों में कार्यवाही पर कुछ समय के लिए रोक लग गई है और याचिकाकर्ताओं से उम्मीद की जाती है कि वे हाई कोर्ट की खंडपीठ के सामने अपना पक्ष रखेंगे. इस रोक से ईडी के समन और आगे की कठोर कार्रवाई की आशंका से पैदा हुआ तत्काल दबाव भी कम हुआ है. अब पिनराई और अन्य याचिकाकर्ता 23 अक्टूबर को ईडी के सामने पेश नहीं होने का विकल्प चुन सकते हैं.

हालांकि CPM के लिए दांव पर लगी चीजें एक हफ्ते की राहत से कहीं बड़ी हैं. पार्टी लंबे समय से एक्सालॉजिक विवाद को भ्रष्टाचार का मामला मानने के बजाय राजनीतिक साजिश के तौर पर पेश करती रही है. 

चुनाव में झटका लगने के बाद, जिसने कभी अजेय मानी जाने वाली उसकी राजनीतिक मशीनरी की कमजोरियां उजागर कीं, ये आरोप लगातार असहजता का कारण बने हुए थे. हर कानूनी घटनाक्रम इस दावे को और मजबूत करने का खतरा पैदा करता था कि केरल का सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार अब गंभीर जांच से बच नहीं सकता.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से CPM को अपनी बात रखने के लिए कुछ और जगह मिल गई है. कुछ ही घंटों के भीतर पार्टी नेताओं ने फैसले को अपनी पुरानी दलील की पुष्टि के तौर पर पेश किया कि मामला प्रक्रियागत खामियों और राजनीतिक मंशा पर आधारित था. 

पार्टी के राज्य सचिव एम. वी. गोविंदन ने इस घटनाक्रम को पार्टी के इस रुख की पुष्टि बताया कि आरोपों का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं था. उन्होंने कहा, "यह मामला राजनीतिक कारणों से गढ़ा गया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट और यूडीएफ (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) सरकार की कानूनी और प्रक्रियागत खामियों को सामने रखा है."

राजनीतिक रूप से यह व्याख्या पार्टी के लिए उपयोगी हो सकती है लेकिन कानूनी तौर पर इसे सही मान लेना अभी जल्दबाजी होगी. सुप्रीम कोर्ट ने न तो किसी को निर्दोष या दोषी ठहराया है और न ही आरोपों के गुण-दोष पर कोई फैसला दिया है. अदालत ने सिर्फ इतना कहा है कि प्रक्रिया, निष्पक्षता और अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवालों पर विस्तार से सुनवाई होनी चाहिए.

फिर भी आज की राजनीति में प्रक्रिया महज प्रक्रिया नहीं रह गई है. यह लोगों की धारणा बनाती है राजनीतिक घटनाक्रम की दिशा बदलती है और जनता के फैसले को प्रभावित करती है.

फिलहाल पिनराई विजयन को राहत की कुछ मोहलत मिल गई है. यह राहत कानूनी रूप से आरोपों से मुक्त होने की राह बनती है या फिर लंबी और कठिन लड़ाई के बीच सिर्फ एक विराम साबित होती है, यह देखना बाकी है. केरल की लगातार टकरावपूर्ण होती राजनीति में अस्थाई रोक भी एक बड़ी जीत के तौर पर पेश की जा सकती है.

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