
महाराष्ट्र का पंढरपुर देश और विदेश में लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है लेकिन भगवान विठोबा के मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए चंद्रभागा नदी में पवित्र स्नान करना खतरे से खाली नहीं होता. नदी की तलहटी में खतरा बना रहता है और यहां हर साल 150 से ज्यादा लोग डूबते हैं. इन मौतों को रोकने के लिए सोलापुर जिला प्रशासन अवैध रेत खनन के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है.
रेत खनन की वजह से नदी की तलहटी में गहरे गड्ढे बन जाते हैं और यहां नहाने वाले अनजान श्रद्धालु डूब जाते हैं. कृष्णा नदी की सहायक नदी भीमा पंढरपुर में घुमावदार और अर्धचंद्राकार रास्ते से बहती है. यही वजह है कि यहां इसे चंद्रभागा कहा जाता है.
मुंबई से 350 किलोमीटर से ज्यादा दूर पंढरपुर की वारी यानी धार्मिक यात्रा में भगवान विठोबा के लाखों श्रद्धालु पैदल चलकर मंदिर पहुंचते हैं. आषाढ़ (जून-जुलाई) और कार्तिक (नवंबर) के महीनों में वारकरी भक्ति परंपरा के संतों जैसे निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम की पालकियों के साथ श्रद्धालु पैदल पंढरपुर जाते हैं.
इस साल जुलाई में आषाढ़ी वारी (24 जुलाई से 26 जुलाई) के दौरान करीब 32 लाख वारकरी पंढरपुर पहुंचे. पिछले साल यह संख्या 27 लाख थी. वारकरी और भगवान विठोबा के मंदिर आने वाले दूसरे श्रद्धालु भी चंद्रभागा में डुबकी लगाते हैं. भगवान विठोबा को विठ्ठल और पांडुरंग के नाम से भी जाना जाता है, जबकि उनकी पत्नी रुक्मिणी हैं.

ऐसा माना जाता है कि चंद्रभागा में डुबकी लगाने से आध्यात्मिक पुण्य मिलता है. आषाढ़ी और कार्तिकी वारी के अलावा हर महीने दो बार एकादशी के दिन भी पंढरपुर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं.
सोलापुर के जिला कलेक्टर एस. कार्तिकेयन का कहना है कि प्रशासन सोनार जैसी तकनीक की मदद से नदी की तलहटी के ढाई किलोमीटर लंबे हिस्से का नक्शा तैयार करेगा. इसके बाद छह फीट से ज्यादा गहरे इलाकों में घेराबंदी की जाएगी और चेतावनी वाले बोर्ड लगाए जाएंगे.
उनका कहना है, "नदी के पानी के लिए एक रास्ता तैयार किया जाएगा, पानी को फिल्टर किया जाएगा और फिर उसे स्नान कुंड में छोड़ा जाएगा ताकि श्रद्धालु वहां डुबकी लगा सकें." यह कुंड नवंबर-दिसंबर 2027 तक तैयार होने की उम्मीद है और यह महाराष्ट्र सरकार की पंढरपुर मंदिर कॉरिडोर परियोजना का हिस्सा है. इस परियोजना का मकसद मंदिर और उसके आसपास की भीड़ कम करना, रास्ता सुगम बनाना और लोगों को बेहतर सुविधाएं देना है.
प्रशासन डूबने से होने वाली मौतों को रोकने के लिए AI से चलने वाले कैमरों का इस्तेमाल करेगा. इसके साथ ही नदी की तलहटी से रेत निकालने और उसे गधों से ढोने पर रोक लगाने के लिए भी कार्रवाई की जाएगी.
यहां हर साल औसतन 150 से ज्यादा लोगों की मौत होती है, जिसमें नदी के बहाव में आगे जाकर बरामद होने वाले शव भी शामिल हैं. हालांकि, यात्रा के मौसम में बढ़ाई गई निगरानी की वजह से आषाढ़ी वारी के दौरान होने वाली मौतों में कमी आई है. मौतों की संख्या 2022 में नौ से घटकर 2023 में तीन हो गई. 2024 में एक भी मौत नहीं हुई जबकि इस साल दो लोगों की मौत हुई. कार्तिकी वारी के दौरान भी मौतों की संख्या 2021 में सात से घटकर 2022 में तीन रह गई और उसके बाद से एक भी मौत नहीं हुई है.
सोलापुर जिला कलेक्टर कार्यालय के अधिकारियों के मुताबिक 150 से ज्यादा स्वयंसेवकों, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, को बचाव अभियान और नाव चलाने की ट्रेनिंग दी गई. इन्हें एकादशी के दौरान तैनात किया गया. इनमें से 27 स्वयंसेवक पंढरपुर शहर और तालुका से थे.
विठोबा या विठ्ठल को भगवान कृष्ण के एक रूप के तौर पर पूजा जाता है. हालांकि माना जाता है कि वे पहले एक लोक देवता थे (या कुछ मान्यताओं के मुताबिक वीर पत्थर या वीरगल्ल भी थे), जो बाद में हिंदू या ब्राह्मण परंपरा का हिस्सा बने. लेखक और शोधकर्ता आर.सी. ढेरे ने बताया है कि अलग-अलग संप्रदायों और धार्मिक मान्यताओं ने विठोबा को अलग-अलग तरह से अपना माना है. इनमें धनगर चरवाहा समुदाय से लेकर बौद्ध और जैन धर्म मानने वाले लोग भी शामिल हैं.
अपनी चर्चित किताब ‘श्री विठ्ठल: एक महासमन्वय’ में आर.सी. ढेरे ने विवादित दावा किया था कि असली विठ्ठल की मूर्ति पंढरपुर में नहीं बल्कि पंढरपुर के पास माढ़ा में है.
वारी परंपरा की शुरुआत कब हुई, यह पूरी तरह साफ नहीं है. कुछ लोगों का मानना है कि 13वीं सदी के भक्ति संत ज्ञानेश्वर ने इसकी शुरुआत की थी. हालांकि इतिहासकारों का कहना है कि इसके बारे में इससे भी पुराने कुछ संदर्भ मिलते हैं. मंदिर का मौजूदा ढांचा ज्यादातर मराठा काल का है. शिलालेखों से भी पता चलता है कि होयसल और सेउना यादव राजा महादेव ने मंदिर को संरक्षण दिया था.
वारकरी संप्रदाय में अलग-अलग जातियों के संत हुए हैं. इनमें नामदेव, ज्ञानेश्वर, गोरोबा कुंभार, सावता माली, चोखामेला, एकनाथ और तुकाराम शामिल हैं. पी.जी. सहस्रबुद्धे ने लिखा है कि वारकरी या भक्ति परंपरा की शुरुआत नाथ संप्रदाय से हुई थी.

