
12 अक्टूबर को आजमगढ़ के मुहम्मदपुर विकास खंड में अमौड़ा-मोहिउद्दीनपुर टोल प्लाजा के पास आयोजित जनसभा में असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को निशाने पर लिया. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख ने मुस्लिम समाज से अपनी राजनीतिक नेतृत्व क्षमता पहचानने की अपील करते हुए कहा, “हमें किसी गांधी या नेहरू की जरूरत नहीं.”
ओवैसी का संदेश था कि मुस्लिम मतदाता दूसरों के नेतृत्व पर निर्भर रहने के बजाय अपने बीच से नेता तैयार करें. उन्होंने सपा पर आरोप लगाया कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के नेतृत्व में मुस्लिम समुदाय ने पार्टी का साथ दिया लेकिन उसे अपने स्वतंत्र नेतृत्व को आगे बढ़ाने के पर्याप्त अवसर नहीं मिले.
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी का यह हमला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आजमगढ़ सपा के मजबूत राजनीतिक क्षेत्रों में गिना जाता है. यहां मुस्लिम और यादव मतदाताओं के समीकरण ने पार्टी की राजनीति को लंबे समय तक मजबूती दी है. वर्तमान में आजमढ़ जिले की सभी 10 विधानसभा सीटों पर सपा का कब्जा है.
आजमगढ़ के बाद 18 अक्टूबर को ओवैसी रामपुर पहुंचे. यहां भी उन्होंने कहा, “हम किसी नेहरू, गांधी या यादव को अपना नेता नहीं बनाएंगे.” उन्होंने मुस्लिम युवाओं को राजनीतिक नेतृत्व में आगे लाने की बात कही और यह संदेश दिया कि समुदाय के लोग केवल दूसरे दलों की सभाओं में भीड़ जुटाने या उनके चुनावी अभियान में काम करने तक सीमित न रहें.

उनके भाषण में ‘अब्दुल अब दरी नहीं बिछाएगा’ का उल्लेख भी इसी राजनीतिक संदेश का हिस्सा था. रामपुर का चयन भी राजनीतिक रूप से अहम है. यह जिला लंबे समय से सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान की राजनीति से जुड़ा रहा है. यहां मुस्लिम नेतृत्व की स्वतंत्र पहचान का सवाल उठाकर ओवैसी ऐसे मतदाताओं के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनका एक बड़ा हिस्सा अब तक सपा के साथ जुड़ा रहा है.
पश्चिमी यूपी तक निशाना
ओवैसी ने 14 जून को बहराइच जिले के मटेरा विधानसभा क्षेत्र में सभा करके 2027 के चुनाव के लिए AIMIM का अभियान शुरू किया था. मटेरा से शौकत अली को संभावित उम्मीदवार घोषित करने और अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में बड़ी संख्या में सीटों पर प्रत्याशी उतारने की बात के साथ पार्टी ने अपनी चुनावी तैयारी का संकेत दिया था.
सितंबर में ओवैसी ने कानपुर में सभा की. इसके बाद पार्टी ने श्रावस्ती और आजमगढ़ में कार्यक्रम तय किए. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रामपुर, कैराना और मेरठ को भी अभियान में शामिल किया गया. AIMIM के प्रवक्ता शादाब चौहान के मुताबिक रामपुर में 18 अक्टूबर, कैराना में 25 अक्टूबर और मेरठ में 14 नवंबर को सभाओं का कार्यक्रम रखा गया है.
इन सभाओं का साझा संदेश राजनीतिक प्रतिनिधित्व और मुस्लिम नेतृत्व है. लेकिन ओवैसी की रणनीति केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सभा करने तक सीमित नहीं है. पार्टी उन सीटों पर भी अपनी संभावना तलाश रही है जहां उसके उम्मीदवारों को पहले चुनाव में उल्लेखनीय वोट मिले या जहां मुकाबला कम अंतर से तय हुआ था.
मुबारकपुर और शाहगंज की मिसाल
AIMIM की चुनावी संभावनाओं को समझने के लिए 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं. आजमगढ़ की मुबारकपुर सीट पर पार्टी के उम्मीदवार रहे शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को 36,460 वोट मिले थे. उन्हें कुल मतों का 16.27 प्रतिशत समर्थन मिला. सपा के अखिलेश ने 80,726 वोट लेकर सीट जीती, जबकि BJP के अरविंद जायसवाल को 51,623 और BSP के अब्दुस्सलाम को 48,734 वोट मिले थे. मुबारकपुर का परिणाम बताता है कि AIMIM ने एक सीट पर उल्लेखनीय समर्थन हासिल किया था.
हालांकि इस प्रदर्शन को पार्टी के स्थायी जनाधार का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी. गुड्डू जमाली अब सपा में हैं और विधान परिषद सदस्य हैं. इसलिए 2027 में मुबारकपुर पर पार्टी की स्थिति इस बात से भी तय होगी कि वह किस उम्मीदवार को उतारती है और स्थानीय स्तर पर कितना संगठन खड़ा कर पाती है.
जौनपुर की शाहगंज सीट पर भी 2022 का चुनावी गणित उल्लेखनीय रहा. यहां AIMIM के नायब अहमद खान को 8,128 वोट मिले थे. निषाद पार्टी के रमेश सिंह ने 87,233 वोट लेकर जीत दर्ज की, जबकि सपा के शैलेंद्र यादव ललई को 86,514 वोट मिले. जीत का अंतर केवल 719 वोट था. AIMIM उम्मीदवार को मिले वोट इस अंतर से काफी अधिक थे.

बाराबंकी की कुर्सी सीट पर भी ऐसा ही उदाहरण मिलता है. 2022 में BJP के सकेंद्र प्रताप को 1,18,720 और सपा के राकेश कुमार वर्मा को 1,18,503 वोट मिले. BJP की जीत का अंतर केवल 217 वोट था. AIMIM के कुमैल अशरफ खान को 8,541 वोट मिले थे. मुबारकपुर, शाहगंज और कुर्सी के ये नतीजे AIMIM की संभावित भूमिका के अलग-अलग उदाहरण हैं.
मुबारकपुर में पार्टी के उम्मीदवार को 16 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे जबकि शाहगंज और कुर्सी में उम्मीदवारों को मिले वोट जीत के अंतर से अधिक थे. इन सीटों पर 2027 में पार्टी का प्रभाव उसके उम्मीदवार, संगठन और पिछले समर्थन को बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगा.
पूर्वांचल की सीटों पर नजर
ओवैसी की राजनीतिक मुहिम के लिहाज से आजमगढ़, जौनपुर और मऊ के कुछ विधानसभा क्षेत्र महत्वपूर्ण हो सकते हैं. आजमगढ़ में मुबारकपुर के अलावा गोपालपुर, निजामाबाद और आजमगढ़ सदर; जौनपुर में शाहगंज और जौनपुर सदर; तथा मऊ में मऊ सदर और घोसी ऐसी सीटें हैं जिन पर AIMIM के संभावित विस्तार का आकलन किया जा सकता है.
इन सीटों पर पार्टी की संभावनाओं को लेकर उम्मीदवारों की पहचान, संगठन की मौजूदगी और स्थानीय चुनावी समीकरणों की जांच जरूरी होगी. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ओवैसी के लिए चुनौती मुस्लिम मतदाताओं की मौजूदगी को अपने समर्थन में बदलने की है.
बरेली के एक कालेज में शिक्षक अजीजुल हलीम कहते हैं, “मुस्लिम मतदाता किसी एक दल के साथ हर सीट पर समान रूप से मतदान नहीं करते. स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार की छवि, जातीय समीकरण और BJP के खिलाफ चुनावी प्रतिस्पर्धा भी उनके निर्णय को प्रभावित कर सकती है.” इसीलिए AIMIM की संभावित भूमिका का आकलन केवल मुस्लिम आबादी के आधार पर नहीं किया जा सकता.
पार्टी को यह भी साबित करना होगा कि उसके उम्मीदवार स्थानीय स्तर पर सपा, बसपा और दूसरे दलों के प्रत्याशियों के मुकाबले विश्वसनीय विकल्प बन सकते हैं.
गठबंधन की पेशकश और सपा से टकराव
ओवैसी की मौजूदा रणनीति में एक विरोधाभास भी दिखाई देता है. वह BJP विरोधी दलों के साथ गठबंधन की संभावना की बात करते रहे हैं लेकिन साथ ही सपा पर मुस्लिम नेतृत्व को पर्याप्त जगह न देने का आरोप लगाते हैं.
सितंबर में कानपुर की सभा के दौरान उन्होंने विपक्षी गठबंधन की संभावना पर बात की थी और 2 अक्टूबर तक स्थिति स्पष्ट करने की समयसीमा दी थी. उनका आरोप था कि सपा की ओर से गठबंधन के प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली. इसके बाद भी AIMIM ने अपने चुनावी कार्यक्रम जारी रखे.
पार्टी की ओर से लगभग 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का संकेत दिया गया है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस रणनीति के दो संभावित रास्ते हैं. पहला, विपक्षी दलों के साथ सीटों के बंटवारे पर समझौता. दूसरा, अलग चुनाव लड़कर अपने उम्मीदवारों के जरिए राजनीतिक आधार बढ़ाना.
दोनों ही स्थितियों में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का सवाल पार्टी के अभियान का प्रमुख हिस्सा बना रहेगा. रामपुर की सभा के बाद कांग्रेस और सपा की ओर से ओवैसी के बयानों पर प्रतिक्रिया भी सामने आई. दोनों दलों ने उनके रुख की आलोचना की और उन पर राजनीतिक विभाजन बढ़ाने का आरोप लगाया. इससे स्पष्ट है कि ओवैसी का मुस्लिम नेतृत्व वाला विमर्श केवल AIMIM के संगठन तक सीमित नहीं रहा बल्कि विपक्षी दलों के बीच भी राजनीतिक बहस का विषय बन गया है.
2022 का प्रदर्शन और 2027 की परीक्षा
2022 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 96 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे लेकिन पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी. उसका प्रदेशव्यापी वोट प्रतिशत करीब 0.43 रहा. यह आंकड़ा बताता है कि व्यापक स्तर पर पार्टी का चुनावी आधार सीमित था हालांकि मुबारकपुर जैसी कुछ सीटों पर उसे उल्लेखनीय समर्थन मिला था. अब ओवैसी आजमगढ़ और रामपुर जैसे जिलों में सभाओं के जरिए मुस्लिम नेतृत्व, राजनीतिक हिस्सेदारी और युवाओं को अवसर देने का सवाल उठा रहे हैं.
उनकी रणनीति का मकसद अपने समर्थकों को एक अलग राजनीतिक विकल्प के पक्ष में संगठित करना है. सपा के लिए यह चुनौती होगी कि वह अपने पारंपरिक मतदाताओं के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब कैसे देती है.
ओवैसी की सभाओं से फिलहाल इतना स्पष्ट है कि AIMIM उत्तर प्रदेश में मुस्लिम नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाकर सपा के राजनीतिक आधार में जगह तलाश रही है. 2027 में ओवैसी की असली परीक्षा यही होगी कि वह रैलियों में उठाए जा रहे नेतृत्व के सवाल को कितनी सीटों पर वास्तविक चुनावी समर्थन में बदल पाते हैं.
सपा के लिए चुनौती उनके भाषणों से ज्यादा उन सीटों पर होगी जहां AIMIM का उम्मीदवार स्थानीय स्तर पर समर्थन जुटाने में सफल होता है. अंतिम तस्वीर उम्मीदवारों की घोषणा, गठबंधन की स्थिति और चुनावी मैदान में मतदाताओं के व्यवहार से ही स्पष्ट होगी.

