उत्तर प्रदेश की राजनीति में अचानक टूटफूट का एक नया राजनीतिक विमर्श तेजी से आकार लेने लगा है. सवाल यह नहीं है कि समाजवादी पार्टी (SP) टूटेगी या नहीं, बल्कि यह है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगी दल लगातार यह संदेश क्यों दे रहे हैं कि सपा के भीतर बड़ी टूट की जमीन तैयार हो रही है.
वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव का समय जैसे करीब आता जा रहा है राजनीतिक बयानबाजी ने चुनावी माहौल का ट्रेलर दिखाना शुरू कर दिया है. योगी सरकार के मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया कि समाजवादी पार्टी के कई नेता BJP में आने को तैयार बैठे हैं.
इसके तुरंत बाद उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने इससे भी बड़ा दावा करते हुए कहा कि सपा के 25-26 सांसद अलग गुट बनाने की तैयारी में हैं. समाजवादी पार्टी ने दोनों दावों को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन इन बयानों ने प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह किसी वास्तविक राजनीतिक हलचल का संकेत है या फिर चुनाव से पहले विपक्ष को अस्थिर दिखाने की सुनियोजित रणनीति?
बयान से ज्यादा महत्वपूर्ण है बयान देने वाला
राजनीति में कई बार शब्दों से ज्यादा महत्व वक्ता का होता है. यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक ओम प्रकाश राजभर और केशव प्रसाद मौर्य के बयानों को अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक और बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुशील पांडेय का मानना है कि राजभर अक्सर सनसनीखेज राजनीतिक दावे करते रहते हैं, लेकिन जब वही बात प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कहते हैं तो उसका राजनीतिक वजन बढ़ जाता है.
उनकी दलील है कि मौर्य बीजेपी संगठन और केंद्रीय नेतृत्व दोनों के करीबी माने जाते हैं. ऐसे में उनकी टिप्पणी को केवल व्यक्तिगत राय मानना आसान नहीं है. दरअसल, बीजेपी की राजनीति में संदेश अक्सर सीधे नहीं बल्कि संकेतों के माध्यम से दिए जाते हैं. मौर्य का बयान इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. इससे यह धारणा बनाने की कोशिश की गई कि सपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा.
ओम प्रकाश राजभर ने अपने दावे को समाजवादी पार्टी के शासनकाल के कथित घोटालों से जोड़ा. उन्होंने कहा कि 2012 से 2017 के बीच हुए कथित खनन घोटाले और गोमती रिवरफ्रंट परियोजना से जुड़े मामलों में जांच का दबाव बढ़ रहा है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन नेताओं की सूची दी गई थी जो बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. हालांकि इस कथित पत्र का कोई सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है और न ही किसी स्तर पर इसकी पुष्टि हुई है.
इसके बावजूद यह आरोप राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया. कारण साफ है. आरोप का तथ्यात्मक आधार भले कमजोर हो, लेकिन उसका राजनीतिक प्रभाव मजबूत हो सकता है. राजभर ने यहां तक कहा कि पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस और महाराष्ट्र में शिवसेना तथा एनसीपी की तरह अब उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक भूकंप आ सकता है.
अखिलेश का पलटवार और बीजेपी का नैरेटिव
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इन दावों को बीजेपी की पुरानी राजनीतिक शैली करार दिया. उन्होंने कहा कि बीजेपी पहले भी कई दलों में टूट करा चुकी है और नेताओं को लालच, दबाव तथा जांच एजेंसियों के जरिए अपने साथ लाने का आरोप झेलती रही है. अखिलेश ने कहा कि समाजवादी पार्टी पूरी तरह एकजुट है और उसने अपने इतिहास का सबसे बड़ा संकट पहले ही झेला है.
उनका संकेत 2016-17 के उस पारिवारिक संघर्ष की ओर था, जब मुलायम सिंह यादव परिवार के भीतर सत्ता संघर्ष ने पार्टी को दो हिस्सों में बांटने की स्थिति पैदा कर दी थी. अखिलेश का कहना है कि उस संकट से उबरने के बाद पार्टी पहले से अधिक मजबूत होकर निकली. उन्होंने बीजेपी पर पलटवार करते हुए यह भी कहा कि भविष्य में बीजेपी के ही कुछ विधायक पाला बदल सकते हैं.
सोशल मीडिया मंच “एक्स” पर भी उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भविष्यवाणी करने वाले पहले यह बताएं कि उन्हें बीजेपी गठबंधन में कितनी सीटें मिलने वाली हैं. हालांकि कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं कि बीजेपी अयोध्या के राम मंदिर के दान में हुई गड़बड़ी पर से ध्यान हटाने के लिए ऐसी अफवाह उड़ा रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी और उनके सहयोगी नेताओं के इन बयानों को केवल सपा विरोधी हमले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इनके पीछे व्यापक राजनीतिक रणनीति काम कर रही है. राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष गौतम कहते हैं कि यह चुनाव पूर्व कथा प्रबंधन यानी नैरेटिव मैनेजमेंट का क्लासिक उदाहरण है. उनके अनुसार बीजेपी चाहती है कि समाजवादी पार्टी अस्थिर और बिखरी हुई दिखाई दे.
यदि किसी पार्टी के बारे में लगातार यह धारणा बनाई जाए कि उसके नेता असंतुष्ट हैं और कभी भी छोड़कर जा सकते हैं, तो उसका असर कार्यकर्ताओं, समर्थकों और संभावित सहयोगियों पर पड़ता है. गौतम के अनुसार इससे विपक्षी एकता पर भी सवाल खड़े होते हैं और राजनीतिक बहस शासन तथा महंगाई जैसे मुद्दों से हटकर विपक्ष की अंदरूनी स्थिति पर केंद्रित हो जाती है.
कैसे राजनीतिक लक्ष्य साध रहा भगवा कुनबा
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने बीजेपी को पिछाड़कर 37 सीटें जीती थीं और बीजेपी महज 33 सीट पर ही ठहर गई थी. इसके अलावा सपा को बीजेपी से अधिक विधानसभा सीटों पर बढ़त भी मिली थी. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले जैसे बीजेपी नेता टूटकर सपा में शामिल हुए थे उसने भी भगवा दल को रणनीति बदलने में मजबूर किया था. अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा में फूट पड़ने के बयानों से बीजेपी और उसके सहयोगी दल एक साथ तीन राजनीतिक लक्ष्य साधने की कोशिश कर रहे हैं.
पहला, समाजवादी पार्टी को अस्थिर और कमजोर दिखाना. यदि लगातार यह संदेश जाए कि पार्टी के सांसद और विधायक नाराज हैं, तो संगठनात्मक मनोबल प्रभावित हो सकता है. दूसरा, पार्टी के भीतर मौजूद महत्वाकांक्षी नेताओं को संकेत देना कि बीजेपी उनके लिए एक संभावित राजनीतिक विकल्प है. यह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का तरीका भी हो सकता है. तीसरा, राजनीतिक विमर्श को विपक्षी एकता की कमजोरी पर केंद्रित करना.
ओबीसी राजनीति और संदेश की टाइमिंग
दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा राजनीतिक अभियान दो ऐसे नेताओं के जरिए सामने आया है जो अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) राजनीति के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं. केशव प्रसाद मौर्य मौर्य-कुशवाहा समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि ओम प्रकाश राजभर पूर्वांचल में राजभर समुदाय के प्रभावशाली नेता हैं.
दोनों ही बीजेपी गठबंधन की उस सामाजिक इंजीनियरिंग का अहम हिस्सा हैं, जिसका मुकाबला समाजवादी पार्टी अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले से करना चाहती है. यही वजह है कि इन बयानों को केवल राजनीतिक आरोप नहीं बल्कि सामाजिक और चुनावी संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है. बीजेपी यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि गैर-यादव पिछड़ा वर्ग अभी भी उसके साथ मजबूती से खड़ा है और विपक्षी राजनीति में अस्थिरता है.
हालांकि समाजवादी पार्टी के नेताओं का दावा है कि पार्टी में फिलहाल किसी बड़े असंतोष के संकेत नहीं हैं. उनका कहना है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व पूरी तरह अखिलेश यादव के हाथ में है और ऐसा कोई दूसरा शक्ति केंद्र नहीं है जो बड़े पैमाने पर संगठन को प्रभावित कर सके. एक वरिष्ठ सपा नेता का कहना है कि महाराष्ट्र की शिवसेना या एनसीपी की तुलना समाजवादी पार्टी से नहीं की जा सकती. वहां समानांतर शक्ति केंद्र मौजूद थे, जबकि सपा में नेतृत्व को लेकर कोई भ्रम नहीं है. वह यह भी याद दिलाते हैं कि पार्टी 2017 से पहले के पारिवारिक संघर्ष से गुजर चुकी है. उस दौर में भी पार्टी बची रही और बाद में शिवपाल यादव जैसे नेता भी फिर संगठन के साथ आ गए.
यह विवाद केवल टूटफूट की संभावना का नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हो चुकी उस बड़ी नैरेटिव वॉर का हिस्सा है जिसमें लड़ाई सीटों से पहले राजनीतिक मनोविज्ञान पर लड़ी जा रही है. आने वाले महीनों में यह संघर्ष और तीखा होगा, क्योंकि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता अब राजनीतिक संदेशों, सामाजिक समीकरणों और धारणा की राजनीति से होकर गुजरने वाला है.

