
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने BJP की एक असहज सीमा उजागर कर दी है. शायद सम्राट चौधरी के नेतृत्व की भी. बिहार के पहले BJP मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद यह सीमा सामने आई है.
खुद कुशवाहा (कोइरी) समुदाय से आने वाले चौधरी से उम्मीद थी कि वे BJP को लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) सामाजिक समीकरण को मजबूत करने में मदद करेंगे. यही समीकरण पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक सफलता का आधार रहा था.
इसके बजाय BJP को उस सीट पर चौंकाने वाली हार का सामना करना पड़ा, जिस पर वह दशकों से जीतती रही थी और जिसका प्रतिनिधित्व पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन करते थे.
इस नतीजे ने उस सवाल को फिर जिंदा कर दिया है जिसे BJP शायद चौधरी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद खत्म मान रही थी. नीतीश के सक्रिय राजनीति से दूर होने और उनके लंबे राजनीतिक दौर से चौधरी के नेतृत्व की ओर बदलाव अभी पूरा नहीं हुआ है. ऐसे में बिहार में सत्तारूढ़ NDA की महत्वाकांक्षाओं और जमीनी हकीकत के बीच साफ अंतर दिखाई दे रहा है.

तो गठबंधन के लिए लव-कुश समीकरण को कौन संभाल सकता है? इसका एक जवाब राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा हो सकते हैं. वे ऐसे अनुभवी नेता हैं, जिन्होंने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान, अलग संगठन और उस सामाजिक आधार पर अपना दावा बरकरार रखा है, जिसे BJP खोने का जोखिम नहीं उठा सकती.
विडंबना यह है कि BJP के पास कोइरी मुख्यमंत्री है, फिर भी उसे उपेंद्र कुशवाहा पर भरोसा करना पड़ रहा है. यह सिर्फ गठबंधन प्रबंधन का मामला नहीं है. यह इस बात की स्वीकारोक्ति भी है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और किसी सामाजिक समूह पर राजनीतिक पकड़ हमेशा एक ही चीज नहीं होती.
कुशवाहा की बढ़ती अहमियत का सबसे स्पष्ट संकेत बांकीपुर के नतीजे से पहले ही मिल गया था. जून में जब बिहार विधान परिषद की 10 खाली सीटों में से NDA ने नौ पर जीत हासिल की, तब चौधरी मंत्रिमंडल में मंत्री उनके बेटे दीपक प्रकाश को उनमें जगह नहीं मिली.
दीपक किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे इसलिए मंत्री पद पर बने रहने के लिए उनका विधानमंडल का सदस्य होना जरूरी था. 31 जुलाई को, बांकीपुर में मतदान के एक दिन बाद, BJP MLC देवेश कुमार ने इस्तीफा दे दिया. इससे एक सीट खाली हुई और बाद में इसी सीट के जरिए दीपक को विधान परिषद के लिए नामित किया गया ताकि वे मंत्रिमंडल में बने रह सकें.
NDA के पास भारी बहुमत होने के बावजूद सत्तारूढ़ गठबंधन ने आखिरकार उस नेता के बेटे के लिए जगह बनाई, जिसकी अपनी पार्टी BJP से बाहर है. यह सिर्फ गठबंधन की सामान्य व्यवस्था नहीं थी. इससे NDA और BJP में कुशवाहा की बढ़ती अहमियत का एहसास साफ होता है.
बिहार की राजनीति का खालीपन
इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बिहार की राजनीति के उन दो ध्रुवों का कमजोर होना है जिन्होंने दशकों तक राज्य की राजनीति पर दबदबा बनाए रखा. लालू प्रसाद यादव की विरासत आज भी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का आधार है. लेकिन उनके बेटे तेजस्वी यादव अब तक पार्टी के मजबूत मुस्लिम-यादव आधार को व्यापक सामाजिक गठबंधन में बदलने में सफल नहीं हुए हैं, जो चुनाव जीत सके.

दूसरी ओर नीतीश राज्यसभा चले गए हैं और अपने साथ NDA में अपनी सक्रिय राजनीति की वह ऊर्जा भी ले गए हैं, जो उन्होंने वर्षों में बनाई थी. चौधरी अभी अपने पूर्ववर्ती जैसा कद हासिल नहीं कर पाए हैं. नतीजा यह है कि बिहार में एक असामान्य राजनीतिक खालीपन पैदा हो गया है.
लालू का दौर ढल रहा है, नीतीश की सक्रिय राजनीतिक भूमिका खत्म हो रही है, तेजस्वी अभी व्यापक विपक्षी राजनीति पर पकड़ नहीं बना पाए हैं और चौधरी अभी नीतीश जैसी व्यापक OBC अपील कायम नहीं कर पाए हैं. इसी खालीपन में कुशवाहा अपनी मौजूदा विधायी ताकत से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
चौधरी के पास मुख्यमंत्री का पद और BJP का संगठन है. कुशवाहा के पास कुछ अलग है: करीब तीन दशक का राजनीतिक अनुभव, स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और कोइरी समुदाय में लंबे समय से बना हुआ अपना समर्थक आधार.
नीतीश के बाद बिहार की अस्थिर राजनीति में यही चीज उन्हें लव-कुश वोट को साधे रखने के लिए BJP का एक अहम स्वतंत्र सहारा बना सकती है. साथ ही वह एक मजबूत OBC ध्रुव भी बन सकते हैं, जिसे पार्टी की मौजूदा व्यवस्था पूरी तरह मजबूत नहीं कर पा रही है.
आंकड़े इसकी वजह बताते हैं. बिहार के जातीय सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य की आबादी में कोइरी समुदाय की हिस्सेदारी 4.21 फीसदी और कुर्मी समुदाय की 2.87 फीसदी है. दोनों को मिलाकर यह आंकड़ा 7 फीसदी से थोड़ा अधिक होता है. 14.26 फीसदी हिस्सेदारी के साथ यादव राज्य का सबसे बड़ा जातीय समूह हैं.
कुर्मी-कोइरी समूह का राजनीतिक महत्व उस सामाजिक गठबंधन में उसकी ऐतिहासिक भूमिका से जुड़ा है जिसे नीतीश ने RJD के मुस्लिम-यादव वर्चस्व के खिलाफ खड़ा किया था. लव-कुश समीकरण ने नीतीश को गैर-यादव OBC का एक मजबूत आधार दिया और इसके सहारे उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग (EBC), महिलाओं और दलितों के कुछ वर्गों को जोड़कर कहीं व्यापक गठबंधन बनाया.
यह राजनीतिक ढांचा इसलिए कायम रहा क्योंकि नीतीश ने अपेक्षाकृत छोटे जातीय आधार को एक व्यापक सत्ता गठबंधन का केंद्र बना दिया. अब इसके निर्माता राजनीति के केंद्र से दूर हो गए हैं. सवाल यह है कि उनके छोड़े हुए राजनीतिक स्थान को कौन भरेगा?

नीतीश के जाने से पैदा हुए खालीपन को भरने की क्षमता कुशवाहा में हो सकती है. उन्होंने करीब तीन दशक बिहार के बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच काम किया है.
वे समता पार्टी और JD(U) से जुड़े रहे हैं, केंद्र में मंत्री रहे हैं, नीतीश से संबंध तोड़े हैं, अपने राजनीतिक संगठन बनाए हैं, NDA में वापस लौटे हैं और बार-बार बड़े गठबंधन में अपनी जगह को नए सिरे से तय किया है.
कुशवाहा का राजनीतिक सफर सीधा नहीं रहा है. यही बात अब विरोधाभासी रूप से उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है.
कुशवाहा NDA में रहते हुए भी BJP के नेता नहीं बने हैं. जून में उन्होंने RLM के BJP में विलय की संभावना को खारिज कर दिया था और साथ ही कहा था कि उनकी पार्टी NDA की मजबूत सहयोगी बनी रहेगी. इसलिए वे BJP और उन मतदाताओं के बीच पुल का काम कर सकते हैं, जो गठबंधन का समर्थन तो करते हैं लेकिन खुद को पूरी तरह BJP से नहीं जोड़ते.
कुशवाह 'नीतीश 2.0' बन सकते हैं?
कुशवाहा की पार्टी के पास नीतीश की JD(U) जितनी विधायी ताकत नहीं है. लेकिन राजनीतिक उत्तराधिकार की शुरुआत संख्या से नहीं होती. इसकी शुरुआत खालीपन से होती है.
नीतीश की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि लव-कुश पहचान के इर्द-गिर्द एक टिकाऊ गैर-यादव OBC राजनीतिक ध्रुव बनाना और उसे एक व्यापक सत्ता गठबंधन में बदलना था. कुशवाहा के पास एक फायदा है: स्वतंत्रता और राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका.
कुशवाहा BJP में शामिल हुए बिना उससे बातचीत कर सकते हैं. वह कोइरी समुदाय से बात कर सकते हैं, बिना इस धारणा के कि वे ऐसा केवल किसी पद पर रहते हुए कर रहे हैं. वे अपना स्वतंत्र राजनीतिक संगठन भी बनाए रख सकते हैं और साथ ही राज्य सरकार चलाने की जिम्मेदारी से दूर रह सकते हैं.
यही वजह है कि 'नीतीश 2.0' की संभावना दिलचस्प है. इसलिए नहीं कि कुशवाहा पहले ही दूसरे नीतीश बन चुके हैं बल्कि इसलिए कि बिहार एक बार फिर ऐसे स्वतंत्र OBC नेता की तलाश में हो सकता है जो प्रमुख राजनीतिक गठबंधनों के बीच अपनी जगह बना सके.
बांकीपुर के नतीजे के बाद यह धारणा बनी है कि BJP का अपना कोइरी नेतृत्व अभी इस समुदाय को पूरी तरह अपने साथ नहीं जोड़ पाया है. ऐसे में लव-कुश वोट को साधे रखने के लिए BJP को कुशवाहा के रूप में एक अलग और भरोसेमंद सहारे की जरूरत पड़ सकती है.
यही वजह है कि वे आगे चलकर NDA के एक और सहयोगी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं. वे BJP के लिए ऐसे स्वतंत्र OBC सहयोगी बन सकते हैं, जिसकी जरूरत पार्टी को लंबे समय तक बनी रहे.
बड़ी तस्वीर
सवाल यह है कि क्या बिहार का बदलता राजनीतिक ढांचा ऐसी परिस्थितियां पैदा कर रहा है, जिसमें स्वतंत्र OBC पहचान, अलग संगठन और तीन दशक के राजनीतिक अनुभव वाला नेता एक बार फिर राज्य के सत्ता गठबंधन के लिए अपरिहार्य बन सकता है. इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इस पूरे परिदृश्य में कुशवाहा की स्थिति अलग है.
बिहार में अब सुशील कुमार मोदी या रामविलास पासवान जैसे नेता नहीं हैं. वहीं लालू और नीतीश भी राजनीति की अग्रिम पंक्ति से दूर होते दिख रहे हैं. ऐसे में कुशवाहा के पास राज्य के ज्यादातर दूसरे OBC नेताओं की तुलना में ज्यादा राजनीतिक कद और अनुभव है.
उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान, लव-कुश राजनीति से लंबा जुड़ाव और अलग-अलग राजनीतिक गठबंधनों के साथ बातचीत करने की क्षमता उन्हें उनकी मौजूदा चुनावी ताकत से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है.
बिहार के सामने अब सवाल यह नहीं है कि कुशवाहा नीतीश की राजनीतिक विरासत का कितना हिस्सा हासिल कर 'नीतीश कुमार 2.0' बन सकते हैं. सवाल यह है कि इसमें कितना समय लगेगा.
और शायद अब ज्यादा वक्त नहीं लगेगा, जब बिहार पर अपने दम पर कब्जा करने के बाद BJP के हित तेजी से कुशवाहा के हितों से जुड़ते दिखें. वे उसी लव-कुश सामाजिक आधार को सुरक्षित करने में मदद कर सकते हैं जिस पर राज्य की नई राजनीतिक व्यवस्था टिकी होगी.

