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निशांत कुमार अपने व्यक्तित्व और पिता की विरासत के बीच कैसे साधेंगे संतुलन?

नीतीश कुमार के बेटे निशांत अब तक दुनियादारी से अलग-थलग रहे हैं लेकिन JDU में शामिल होने के साथ ही उनके कंधों पर अपने पिता की विरासत और पार्टी को आगे बढ़ाने की पहाड़ सरीखी जिम्मेदारी आ गई है

Nishant with Sanjay Jha and Nitish kumar in CM house after joining the party
JDU की सदस्यता लेने के बाद निशांत कुमार संजय झा के साथ मुख्यमंत्री आवास पहुंचे
अपडेटेड 9 मार्च , 2026

अपनी स्थापना के लगभग 23 साल के इतिहास में JDU दफ्तर के बाहर शायद पहली बार हाथी, घोड़े और ऊंट का जुलूस दिखा होगा. जुलूस के आगे बैंड वाले लगातार धुन बजा रहे थे. हाथी के शरीर पर एक पोस्टर टंगा था, जिस पर लिखा था, “निशांत हैं, तो निश्चिंत हैं”. मौका नीतीश कुमार के बेटे निशांत की बिहार की राजनीति में एंट्री का था; वह घटनाक्रम जो पिछले सवा साल से टल रहा था.

ठीक एक बजे निशांत की कार JDU कार्यालय में पहुंची. वहां पहुंचते ही सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने उन्हें घेर लिया और कार पर गुलाब के फूलों की बारिश कर दी. भीड़ के बीच कड़ी मशक्कत से रास्ता बनाकर उनकी कार को कर्पूरी सभागार तक पहुंचाया गया, जहां पार्टी के वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता पहले से मौजूद थे.

JDU ऑफिस के सामने हाथी लेकर पहुंचे कार्यकर्ता
JDU ऑफिस के सामने हाथी लेकर पहुंचे कार्यकर्ता (फोटो : पुष्यमित्र)

मंच पर उन्हें JDU के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह, प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा, केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर और बिहार सरकार के मंत्रियों- विजेंद्र यादव, विजय चौधरी और श्रवण कुमार के बीच बिठाया गया. मंच पर निशांत बार-बार आगे की तरफ झुकते हुए सकुचाए से बैठे रहे. संजय कुमार झा ने उन्हें पार्टी सदस्यता की पर्ची थमाई. जैसे ही ललन सिंह ने उन्हें पार्टी का पट्टा पहनाया, निशांत ने झुककर उनके पांव छू लिए और इस तरह निशांत विधिवत JDU के हो गए.

इस मौके पर महज एक दिन पहले फिर से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने उमेश कुशवाहा ने कहा, “निशांत जी का पार्टी में आना तकनीकी बात है, इनकी हर सांस में JDU बसा हुआ है.” वहीं, जब निशांत से कुछ कहने के लिए कहा गया, तो हजारों की भीड़ के सामने अपने पहले संबोधन में उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “मेरे पिता ने राज्यसभा जाने का फैसला किया है. यह उनका निजी फैसला है और उसे मैं स्वीकार करता हूं. हम सब मेरे पिता नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में काम करेंगे. पार्टी और जनता ने मुझ पर जो विश्वास किया है, उस पर मैं खरा उतरने की कोशिश करूंगा. पापा ने जो बीस साल में किया है, उसे जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास करूंगा. आप पापा पर विश्वास बनाए रखें.”

उनके पौने दो मिनट के संबोधन के साथ ही यह 15 मिनट का कार्यक्रम समाप्त हो गया. सबसे दिलचस्प बात यह रही कि नीतीश कुमार अपने बेटे के राजनीतिक जीवन की शुरुआत के मौके से गायब थे और कहा जा रहा है कि उन्होंने यहां न आने का फैसला जानबूझकर लिया.

सवा साल से चल रही थी चर्चा

निशांत को राजनीति में आना चाहिए, निशांत राजनीति में आएंगे-  ऐसी चर्चाएं बिहार में जनवरी 2025 से ही चल रही थीं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए लगातार यह कहा जा रहा था कि उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुन लेना चाहिए. ऐसे में 2024 के उत्तरार्ध में पहले नीतीश के करीबी और स्वजातीय पूर्व आईएएस अधिकारी मनीष कुमार वर्मा का नाम सामने आया. उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाकर महासचिव का पद दिया गया और उन्होंने बिहार की यात्रा भी शुरू की. 

हालांकि, 2024 के अंत तक यह कहा जाने लगा कि मनीष अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर रहे हैं. उनकी यात्रा बीच में ही रोक दी गई और फिर निशांत का नाम उत्तराधिकारी के तौर पर उछाला गया. उनका नाम आगे बढ़ाने वालों में नीतीश के ही एक अन्य स्वजातीय मंत्री श्रवण कुमार का नाम प्रमुखता से लिया जाता था.

शुरुआती दौर में यह कहा जाता था कि न तो निशांत और न ही उनके पिता नीतीश इस बात के लिए तैयार हैं कि वे राजनीति में आएं. मगर धीरे-धीरे निशांत घर से बाहर निकलने लगे और मीडिया का सामना करने लगे. वे अपने पिता की राजनीति के बारे में बात करने लगे. कहा जाने लगा कि निशांत के ननिहाल के लोग चाहते हैं कि वे राजनीति में आएं. 

​  JDU के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने निशांत को औपचारिक रूप से पार्टी का सदस्य बनाया  ​(फोटो : पुष्यमित्र)
​ JDU के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने निशांत को औपचारिक रूप से पार्टी का सदस्य बनाया ​(फोटो : पुष्यमित्र)

हालांकि, खुद को लोहिया और कर्पूरी ठाकुर का वैचारिक शिष्य कहने वाले नीतीश के बारे में माना जाता था कि वे जब तक राजनीति में सक्रिय रहेंगे, निशांत को राजनीति में शायद ही आने दें. मगर पिछले दिनों अचानक परिस्थितियां बदलीं. नीतीश राज्यसभा जाने के लिए तैयार हुए और अब निशांत को JDU की सदस्यता दिला दी गई है.

पार्टी के लोग और नीतीश के करीबी बताते हैं कि जल्द ही निशांत बिहार की यात्रा पर निकलेंगे. उन्हें भविष्य में पार्टी संभालने के लिए तैयार किया जाएगा और नीतीश के राज्यसभा जाने की स्थिति में उन्हें बिहार का डिप्टी सीएम भी बनाया जा सकता है.

हालांकि, करीबी लोग यह भी बताते हैं कि अंतर्मुखी स्वभाव के निशांत यह सब करने के लिए बहुत मुश्किल से राजी हुए हैं. तीन मार्च तक वे अपने पिता से कहते रहे, “आप मुझे पार्टी में रख लीजिए, मगर मैं अभी न पार्टी संभाल सकता हूं, न सरकार का कामकाज.” मगर नीतीश कुमार ने इस पर सिर्फ इतना कहा, “अब तो फैसला हो चुका है.”

क्यों खुद को राजनीति के लिए तैयार नहीं पाते निशांत

निशांत को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वे संकोची स्वभाव के हैं. उनका रुझान पिछले कुछ वर्षों में अध्यात्म की तरफ बढ़ा है और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कुछ समस्याएं भी रही हैं. इन सबके साथ निशांत का व्यक्तित्व न तो राजनीतिक हैं और न ही सामाजिक. वे बहुत सीमित दायरे में लोगों से संवाद करते हैं, इसलिए वे राजनीति की भीड़-भाड़, उसके दोहरे जीवन और तनाव से बचना चाहते हैं.

मीडिया में निशांत का जन्म वर्ष 1975 बताया जाता है, मगर सच यह है कि उनका जन्म 20 जुलाई 1980 को हुआ था. तब इमरजेंसी का दौर बीत चुका था और नीतीश एक बार फिर विधानसभा चुनाव हार चुके थे. वे आर्थिक संकटों से भी जूझ रहे थे. इन्हीं परिस्थितियों में समय से पूर्व निशांत का जन्म हुआ. एक नर्स ने अपनी सूझ-बूझ से उनकी जान बचाई थी, जिसका शुक्रिया निशांत के ननिहाल वाले लंबे समय तक करते रहे. यह सारा विवरण नीतीश कुमार के करीबी मित्र उदयकांत मिश्र की किताब 'नीतीश कुमार: अंतरंग दोस्तों की नजर से' में दर्ज है.

परिवार में 'निशि' के नाम से पुकारे जाने वाले निशांत का शुरुआती जीवन ननिहाल में बीता. 1983 में उनकी मां मंजू कुमारी को शिक्षिका की नौकरी मिली. इस दौरान नीतीश उनसे मिलने आया करते थे. 1985 में जब नीतीश पहली बार विधायक बने, तब उन्हें सरकारी आवास मिला और पहली बार नीतीश, मंजू और निशांत साथ रहने आए. नीतीश कुमार को यह आवास RJD के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के साथ मिला था. दोनों परिवार साथ रहते थे. जगदानंद सिंह के बेटे अजीत, जो निशांत के हमउम्र और मित्र थे, ने निशांत के साथ केंद्रीय विद्यालय (बेली रोड) में पांच साल पढ़ाई की और कुछ समय बीआईटी मेसरा में भी साथ रहे.

इंडिया टुडे से बातचीत में अजीत बताते हैं, “निशांत बचपन से ही शारीरिक रूप से कमजोर और सीमित दायरे में रहने वाला लड़का था. उनका परिवार भी नहीं चाहता था कि वे ज्यादा लोगों से घुले-मिलें. मगर विधायक फ्लैट में निशांत ही था जिसके पास पूरा क्रिकेट किट था, इसलिए वह हमारी टीम में रहता था. बीआईटी मेसरा वह पहले चला गया था, मैंने दो साल का ब्रेक लिया था, लेकिन वहां पहुंचने पर हम फिर साथ हो गए. वह मेरी शादी में भी आया था. मेरी शादी के बाद निशांत की मां ने मुझे सपरिवार बुलाया और निशांत से कहा कि देखो अजीत ने शादी कर ली, तुम भी क्यों नहीं कर लेते? इसके बाद धीरे-धीरे हमारा संपर्क कम होने लगा.”

अजीत निशांत कुमार के बारे में चर्चा करते हुए यह भी बताते हैं कि उनका स्वभाव राजनीति वाला नहीं है और वे कार्यकर्ताओं के साथ ज्यादा मेलजोल नहीं रख सकते. अजीत के मुताबिक, “वह शुरू से शर्मीला था और अब तो बिल्कुल सीएम हाउस में बंद रहता है. इसके अलावा वह अस्वस्थ भी रहता है और फिलहाल अध्यात्म ही उसकी मुख्य अभिरुचि है.”

हालांकि, एक पारिवारिक सदस्य का कहना है, “निशांत में कुछ विलक्षण खूबियां हैं. वह अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि का है और चीजों को जल्दी समझ लेता है. उसे तारीखें बहुत याद रहती हैं. इसके अलावा वह बहुत केयरिंग है. परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर वह सेवा में जुट जाता है. उसने अपने मामा का इलाज अपने खर्च पर करवाया और अपनी नानी की भी खूब सेवा की.”

निशांत ने 12वीं की पढ़ाई पटना साइंस कॉलेज से की, लेकिन बीआईटी मेसरा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई उन्हें आखिरी साल में छोड़नी पड़ी. बताया जाता है कि उस वक्त उनकी मां काफी बीमार थीं, जिस कारण वे पटना लौट आए. मां के निधन के बाद वे काफी मानसिक तनाव में रहे और दोबारा वापस नहीं गए.

निशांत के सहयोग के लिए तैयार हो रही टीम

कहा जाता है कि निशांत की इन चुनौतियों का पता परिवार और पार्टी दोनों को है, इसलिए पिछले एक साल से उनकी तैयारी कराई जा रही है. सीएम हाउस से जुड़े लोग बताते हैं कि कुछ खास लोगों को उन्हें राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी दी गई है.

उनके साथ युवा विधायकों की एक टीम बनाई जा रही है. इसमें इस्लामपुर के विधायक रूहेल रंजन प्रमुख हैं, जो बीआईटी मेसरा में निशांत के साथ थे. इनके अलावा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सदानंद सिंह के पुत्र शुभानंद मुकेश, JDU नेता दिनेश कुमार सिंह, लोजपा सांसद वीणा देवी की बेटी और विधायक कोमल सिंह तथा आनंद मोहन के पुत्र चेतन आनंद जैसे युवाओं को उनके साथ जोड़ा जा रहा है.

इनके अलावा नीतीश कुमार के भांजे मनीष (जो JDU का सोशल मीडिया देखते हैं) और उनकी बड़ी बहन के नाती अनुराज (जो पायलट हैं) भी उनका सहयोग करेंगे. अनुराज इन दिनों निशांत के सबसे करीबी माने जाते हैं.

क्या सब संभाल पाएंगे निशांत?

सवाल यही है कि क्या तमाम सहयोगियों के बावजूद निशांत JDU और सरकार की जिम्मेदारी संभाल पाएंगे? क्या वे JDU की मौजूदा ताकत को बरकरार रख पाएंगे?

टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, “निशांत स्वभाव से आत्मकेंद्रित और संकोची हैं. अपनी जॉइनिंग के समय भी वे असहज दिख रहे थे. ऐसा नहीं लगता कि राजनीति के साथ उनका कोई सहज रिश्ता है. अभी जानकारों की टोली उन्हें सलाह देती रहेगी, लेकिन यह कब तक चलेगा, कहना मुश्किल है. उन पर विपक्ष के हमले होंगे और BJP भी चाहेगी कि JDU धीरे-धीरे कमजोर हो. अब देखना यह है कि क्या वे खुद को अपने पिता जैसा राजनेता बना पाते हैं या अपने स्वभाव के विपरीत इस दुनिया से उकताकर इसे छोड़ देते हैं.”

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