
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अयोध्या, काशी और मथुरा के बाद अब नीब करौरी बाबा की विरासत नया केंद्र बनती दिखाई दे रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार बाबा की जन्मस्थली फिरोजाबाद के अकबरपुर से लेकर फर्रुखाबाद के आश्रम, लखनऊ के हनुमान सेतु और वृंदावन के समाधि स्थल तक को एक आध्यात्मिक पर्यटन सर्किट में जोड़ रही है.
पहली नजर में यह पर्यटन और संस्कृति विभाग की पहल है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले इसे केवल पर्यटन परियोजना मानना कहानी को आधा-अधूरा देखना होगा. दरअसल इसके पीछे आस्था, सांस्कृतिक पहचान, स्थानीय अर्थव्यवस्था और व्यापक जनसंपर्क को एक साथ जोड़ने की रणनीति दिखाई देती है.
नीब करौरी बाबा के महासमाधि दिवस पर उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम (यूपीएसटीडीसी) ने श्रद्धालुओं के लिए पांच विशेष टूर पैकेज शुरू किए हैं. दो, तीन और पांच दिन के इन पैकेजों का संचालन मांग के आधार पर दिल्ली और लखनऊ से किया जाएगा.
यानी सरकार अब बाबा से जुड़े अलग-अलग स्थलों को स्वतंत्र धार्मिक स्थलों के बजाय एक संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा के रूप में पेश करना चाहती है. इस सर्किट में फिरोजाबाद का अकबरपुर, फर्रुखाबाद का नीब करौरी आश्रम धाम मंदिर, लखनऊ का हनुमान सेतु मंदिर और वृंदावन का समाधि मंदिर शामिल हैं.
बाबा ने 1973 में वृंदावन में महासमाधि ली थी. फर्रुखाबाद के आश्रम से उनकी करीब 12 वर्ष की साधना जुड़ी होने की मान्यता है.

सबसे महत्वपूर्ण निवेश बाबा की जन्मस्थली अकबरपुर में हो रहा है. फेज-1 में पर्यटन सुविधाओं के विकास पर 8.65 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं. 2.22 करोड़ रुपए की फेज-2 परियोजना का 60 फीसदी से अधिक काम पूरा हो चुका है और दिसंबर 2026 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य है. इसके अलावा 55.44 लाख रुपए की ग्रामीण पर्यटन परियोजना शुरू की जानी है.
अकबरपुर में बहुद्देशीय सभागार, सांस्कृतिक ब्लॉक, बाबा के जीवन और आध्यात्मिक यात्रा पर आधुनिक प्रदर्शनी हॉल, डाइनिंग हॉल, 50 लोगों की कैफेटेरिया, रसोई, शौचालय और करीब 60 लोगों के ठहरने की डॉरमेट्री विकसित की जा रही है. ग्रामीण पर्यटन परियोजना के तहत प्रवेश द्वार, साइनेज, म्यूरल वॉल और पर्यटक सुविधाएं तैयार होंगी.
फर्रुखाबाद के आश्रम के विकास पर 1.51 करोड़ रुपए की परियोजना पूरी हो चुकी है. यानी बाबा की विरासत को सिर्फ मंदिर और दर्शन तक सीमित रखने के बजाय उसे एक अनुभव में बदला जा रहा है. जन्मस्थली, साधना स्थल, हनुमान भक्ति से जुड़ा लखनऊ और समाधि स्थल को एक यात्रा में जोड़कर सरकार बाबा की पूरी आध्यात्मिक कहानी पर्यटक के सामने रखना चाहती है.
इस पूरी कवायद का दूसरा पहलू बाबा की लोकप्रियता को नई पीढ़ी और लोकप्रिय संस्कृति से जोड़ना है. नीब करौरी बाबा के जीवन और शिक्षाओं पर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ इस समय चर्चा में है. फिल्म की टीम ने हाल में लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की थी.
फिल्म ने भारत में अब तक 143.13 करोड़ रुपए नेट और 169.20 करोड़ रुपए ग्रॉस कमाई का आंकड़ा पार किया है. यह मुलाकात अपने आप में एक राजनीतिक-सांस्कृतिक संकेत भी देती है. बाबा की कहानी एक तरफ सरकारी पर्यटन सर्किट के जरिए जमीन पर लाई जा रही है, दूसरी तरफ सिनेमा के जरिए उनकी कहानी देश के व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच रही है.

फिल्म की सफलता ने यह भी दिखाया है कि आध्यात्मिक विषय अब केवल पारंपरिक धार्मिक दर्शकों तक सीमित नहीं हैं. फिल्म के अभिनेता चंदन आनंद ने भी कहा है कि आध्यात्मिक फिल्म में काम करने से उनका नजरिया बदला और उन्होंने बाबा से जुड़े मंदिर की यात्रा भी की.
यानी सरकार के पास अब एक साथ तीन माध्यम हैं. पर्यटन के जरिए स्थल, सिनेमा के जरिए कहानी और मुख्यमंत्री की राजनीतिक-सांस्कृतिक सक्रियता के जरिए संदेश. योगी सरकार का यह मॉडल केवल नीब करौरी बाबा तक सीमित नहीं है. हाल में मथुरा-वृंदावन को अयोध्या और काशी की तर्ज पर विकसित करने की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री ने मंदिर, आस्था, विरासत और पर्यटन को एक ही फ्रेम में रखा.
आस्था के साथ विकास का पैकेज
नीब करौरी बाबा सर्किट की राजनीतिक अहमियत समझने के लिए इसे 2027 के चुनावी कैलेंडर से जोड़कर देखना होगा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इन दिनों प्रदेश के उन इलाकों पर विशेष फोकस कर रहे हैं जहां 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी.
हाल की रिपोर्ट के मुताबिक मई से मुख्यमंत्री 44 जिलों के 115 विधानसभा क्षेत्रों में 38 हजार करोड़ रुपए से अधिक की विकास परियोजनाओं से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल हो चुके हैं. इन सीटों में बड़ी संख्या ऐसी है जहां 2024 में सपा-कांग्रेस गठबंधन आगे रहा था.
ऐसे में धार्मिक पर्यटन को केवल श्रद्धालुओं की सुविधा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा. मंदिर और आश्रम के विकास के साथ सड़क, होटल, परिवहन, स्थानीय बाजार, रोजगार और छोटे कारोबार जुड़ते हैं. यही वह जगह है जहां आस्था का मुद्दा सीधे विकास के मुद्दे से जुड़ जाता है.
राजनीतिक विश्लेषक और आगरा कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. लवकुश मिश्र ने मथुरा के संदर्भ में इसी रणनीति को रेखांकित किया है. उनके मुताबिक 2027 में BJP के लिए हिंदुत्व का मुद्दा बना रहेगा, लेकिन 2024 के बाद इसे नए सामाजिक और विकासात्मक नैरेटिव के साथ जोड़ना जरूरी होगा. मथुरा में योगी ने आस्था और विकास को साथ रखकर यही प्रयोग किया.
नीब करौरी बाबा सर्किट में भी यही मॉडल दिखाई देता है. बाबा की जन्मस्थली पर भवन बनेगा तो स्थानीय रोजगार पैदा होगा. पर्यटक आएंगे तो परिवहन, भोजन, होटल और स्थानीय बाजार को फायदा होगा. प्रदर्शनी और सांस्कृतिक ब्लॉक बनने से बाबा की कहानी को संस्थागत रूप मिलेगा. यानी सरकार के लिए यह एक ऐसा धार्मिक मुद्दा है जिसे सीधे आर्थिक विकास से जोड़ा जा सकता है.
लखनऊ के इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना रहा है कि योगी सरकार ने धार्मिक मेलों और धार्मिक स्थलों को केवल श्रद्धा के आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि पर्यटन, राजनीतिक संवाद और सांस्कृतिक ब्रांडिंग के माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल किया है.
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के प्रोफेसर सुशील पांडेय धार्मिक मेलों के संदर्भ में कहते हैं कि सरकार की यह नीति 2027 से पहले हिंदुत्व के संदेश को मजबूत करने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था और राज्य की छवि से भी जुड़ती है.
नई सामाजिक पहुंच का प्रयोग
नीब करौरी बाबा की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता यह है कि उनकी लोकप्रियता किसी एक क्षेत्र, जाति या राजनीतिक संगठन तक सीमित नहीं है. उनकी छवि हनुमान भक्ति, सेवा, सादगी और आध्यात्मिकता से जुड़ी है.
देश के अलावा विदेशों में भी उनके अनुयायी हैं. ऐसे में उनकी विरासत को विकसित करना किसी एक क्षेत्रीय धार्मिक समूह तक पहुंचने की कोशिश नहीं, बल्कि व्यापक हिंदू आध्यात्मिक नेटवर्क को जोड़ने का प्रयास बन सकता है.
यही वजह है कि अकबरपुर से वृंदावन तक का सर्किट राजनीतिक रूप से दिलचस्प है. फिरोजाबाद और फर्रुखाबाद जैसे उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों को लखनऊ और वृंदावन से जोड़ना एक व्यापक सांस्कृतिक भूगोल तैयार करता है. खास बात यह है कि यह पूरी कवायद अयोध्या मॉडल की हूबहू नकल नहीं है. अयोध्या में केंद्र राम मंदिर है, जबकि यहां केंद्र में एक संत की जीवन यात्रा है.
यूपी में BJP के सामने 2027 में एक तरफ 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बदले सामाजिक समीकरण हैं तो दूसरी तरफ विपक्ष का PDA और सॉफ्ट हिंदुत्व का प्रयोग है. समाजवादी पार्टी अब मंदिर और हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों पर पहले की तुलना में अधिक मुखर होकर BJP के सबसे मजबूत सांस्कृतिक नैरेटिव को चुनौती देने की कोशिश कर रही है.
ऐसे माहौल में BJP के लिए चुनौती सिर्फ हिंदुत्व का संदेश देने की नहीं बल्कि यह दिखाने की भी है कि वह धार्मिक विरासत को विकास और रोजगार से जोड़ सकती है. नीब करौरी बाबा सर्किट इसी दिशा में एक उपयोगी राजनीतिक मॉडल बन सकता है.

