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क्या नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा के लिए गेमचेंजर साबित हो पाएंगे?

BSP और कांग्रेस का लंबा अनुभव लेकर सपा में पहुंचे नसीमुद्दीन सिद्दीकी के सामने पार्टी का मुस्लिम चेहरा बनने का मौका तो है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं

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नसीमुद्दीन सिद्दीकी 15 फरवरी को सपा में शामिल हुए
अपडेटेड 16 फ़रवरी , 2026

फरवरी की 15 तारीख को लखनऊ में जब सपा मुख्यालय के मंच पर अखिलेश यादव ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को माला पहनाकर पार्टी की सदस्यता दिलाई, तो यह सिर्फ एक औपचारिक ज्वाइनिंग नहीं थी. यह 2027 की तैयारी का संकेत भी था. 

BSP सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले और बाद में कांग्रेस में आठ साल बिताने वाले सिद्दीकी का साइकिल पर सवार होना कई संदेश दे गया. उन्होंने शेर पढ़ा, 'हयात लेके चलो, कायनात लेके चलो. चलो तो सारे जमाने को साथ ले के चलो...' बदलाव की हुंकार भरी और मुलायम सिंह यादव को याद किया. 

नसीमुद्दीन सिद्दीकी (66 वर्ष) का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. 1988 में बांदा से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले सिद्दीकी 1990 में BSP में शामिल हुए और जल्दी ही मायावती के भरोसेमंद बन गए. 1991 में विधायक बने, 1995 में पहली बार मंत्री और फिर BJP के समर्थन वाली सरकार में कृषि, परिवहन, पर्यावरण, आबकारी जैसे अहम विभाग संभाले. 2007 में जब मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग का दांव खेला, तो सिद्दीकी को BSP के मुस्लिम चेहरे के रूप में आगे किया गया. पूर्ण बहुमत की सरकार में उनके पास पीडब्ल्यूडी और आबकारी समेत कई विभाग थे. पत्नी हुस्ना एमएलसी बनीं, बेटा अफजल लोकसभा का उम्मीदवार बना. 2012 के विधानसभा चुनाव बाद विधान परिषद में विपक्ष के नेता की भूमिका भी मिली.

लेकिन 2017 की हार के बाद समीकरण बदले. संगठन की जिम्मेदारियां छीनी गईं, मध्य प्रदेश भेजा गया और आखिरकार BSP से बाहर कर दिए गए. भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के मामलों की जांचें भी उनके पीछे लगी रहीं. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का रुख किया. 2019 में बिजनौर से लोकसभा चुनाव लड़ा, जमानत नहीं बची. पश्चिम क्षेत्र के अध्यक्ष रहे, पर संगठन में प्रभाव नहीं बना पाए. जनवरी में कांग्रेस छोड़ते हुए कहा कि उन्हें काम नहीं दिया जा रहा. BSP में वापसी की अटकलें चलीं, तीसरे मोर्चे की चर्चा भी हुई, पर आखिरकार उन्होंने सपा का दामन थामा.

अब सवाल है कि सपा के लिए वे कितने उपयोगी साबित होंगे. उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 19 प्रतिशत है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह अनुपात 30 से 45 प्रतिशत तक पहुंचता है. 2022 के विधानसभा चुनाव में विभिन्न आकलनों के मुताबिक 70 से 75 प्रतिशत मुस्लिम वोट सपा गठबंधन को गया था. इसके बावजूद सपा बहुमत से दूर रही. ऐसे में अखिलेश यादव की चुनौती है कि इस वोट को न सिर्फ बनाए रखें बल्कि और संगठित करें.

सपा में लंबे समय तक मुस्लिम राजनीति का बड़ा चेहरा आजम खान रहे. 2022 के बाद कानूनी मामलों में फंसने के बाद जेल जाने और स्वास्थ्य कारणों से उनकी सक्रियता सीमित हुई. वरिष्ठ नेता अहमद हसन का निधन हो चुका है. पार्टी के भीतर मुस्लिम प्रतिनिधित्व है, लेकिन प्रदेश स्तर पर संगठन को साधने वाला अनुभवी चेहरा कम दिखता है. राजनीतिक विश्लेषक राकेश वर्मा कहते हैं, “सपा को एक ऐसा नेता चाहिए जो प्रशासनिक अनुभव के साथ मुस्लिम समाज में संवाद कर सके. सिद्दीकी यह खाली जगह भरने की कोशिश कर सकते हैं, पर भरोसा तुरंत नहीं बनता.”

सिद्दीकी का मजबूत पक्ष संगठन कौशल माना जाता है. BSP के दौर में उन्होंने बुंदेलखंड से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक नेटवर्क बनाया. मौलवियों और मदरसों से संवाद, बिरादरी सम्मेलनों का आयोजन और बूथ स्तर तक पकड़ उनकी पहचान रही. 2007 के चुनाव में BSP को मुस्लिम वोट का लगभग 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मिला था, जो उसके लिए बड़ी उपलब्धि थी. तब सिद्दीकी को इसका श्रेय दिया गया. हालांकि 2017 में BSP का वोट शेयर 22 प्रतिशत रहा, पर सीटें घटकर 19 रह गईं और पश्चिमी यूपी में सफाया हो गया. आलोचकों का कहना है कि सामाजिक समीकरण संभालने में चूक हुई. 

सपा में नसीमुद्दीन सिद्दीकी की एंट्री ऐसे समय हुई है जब पार्टी 2027 के लिए नई सामाजिक रणनीति गढ़ रही है. अखिलेश यादव पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को फिर से मजबूत करना चाहते हैं. एक वरिष्ठ सपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमारे पास मुस्लिम वोट है, पर उसे संगठित रखने और नए इलाकों में पहुंचाने के लिए अनुभवी हाथ चाहिए. सिद्दीकी का अनुभव काम आ सकता है.” लेकिन यह राह आसान नहीं. सपा में पहले से कई मुस्लिम चेहरे सक्रिय हैं. कुछ को आशंका है कि बाहर से आए नेता को ज्यादा महत्व मिलने से आंतरिक असंतोष बढ़ सकता है. 

राजनीतिक विश्लेषक डॉ. सादिक अली मानते हैं, “मुस्लिम राजनीति अब एकध्रुवीय नहीं रही. युवाओं में नई सोच है. सिर्फ पुराना नेटवर्क काफी नहीं होगा. सिद्दीकी को विश्वसनीयता साबित करनी होगी.” विश्वसनीयता का प्रश्न इसलिए भी उठता है क्योंकि सिद्दीकी पर जांचें लंबित हैं. BJP अक्सर BSP शासनकाल के स्मारक और पार्क निर्माण में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाती रही है. अगर सिद्दीकी को सपा में प्रमुख भूमिका मिलती है तो सत्तापक्ष उन्हें निशाने पर ले सकता है. इससे सपा को रक्षात्मक राजनीति करनी पड़ सकती है. हालांकि सपा का तर्क है कि जांचें राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा रही हैं.

मुस्लिम मतदाताओं के भीतर भी विविधता है. पश्चिमी यूपी में जाट मुस्लिम समीकरण, रोहिलखंड में खान बिरादरी, पूर्वांचल में अंसारी और शेख समुदाय, बुंदेलखंड में अपेक्षाकृत कम प्रतिशत. 2022 में जिन 125 से अधिक सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत से ज्यादा है, वहां सपा ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन कई जगह त्रिकोणीय मुकाबले में नुकसान हुआ. अगर सिद्दीकी अपने पुराने संपर्कों के जरिए पश्चिमी और मध्य यूपी में संगठन को मजबूत करते हैं, तो सपा को कुछ अतिरिक्त सीटों का फायदा मिल सकता है. सपा के भीतर यह भी आकलन है कि आजम खान की अनुपस्थिति से जो खालीपन बना है, उसे पूरी तरह कोई नहीं भर सकता. 

आजम खान की पहचान सिर्फ मुस्लिम नेता की नहीं, बल्कि सपा के वैचारिक स्तंभ की रही है. सिद्दीकी का राजनीतिक अतीत BSP और कांग्रेस से जुड़ा रहा है. ऐसे में उन्हें सपा की विचारधारा से सार्वजनिक तौर पर जुड़ाव दिखाना होगा. 15 फरवरी को मंच से उन्होंने समाजवाद और सपा के रिश्ते को अटूट बताया, मुलायम सिंह यादव को श्रद्धांजलि दी और अखिलेश को सबको साथ लेकर चलने वाला नेता कहा. यह शुरुआती संदेश था, पर असली कसौटी जमीनी काम होगी. 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 में मुकाबला सीधा BJP और सपा के बीच होगा. BJP  2017 और 2022 में बहुमत ला चुकी है. 2022 में BJP गठबंधन को करीब 41 प्रतिशत वोट मिले, जबकि सपा गठबंधन को करीब 36 प्रतिशत. यह पांच प्रतिशत का अंतर लगभग 45 से 50 सीटों में तब्दील हो गया. अगर सपा को सत्ता में लौटना है तो उसे कम से कम 3 से 4 प्रतिशत अतिरिक्त वोट जोड़ने होंगे. मुस्लिम वोट पहले से उसके साथ है, इसलिए असली चुनौती गैर यादव पिछड़ों और दलितों में पैठ बढ़ाने की है. सिद्दीकी इस व्यापक रणनीति में कितने सहायक होंगे, यह देखना होगा. 

सिद्दीकी के करीबी एक पूर्व बसपा नेता कहते हैं, “वे जमीन के आदमी हैं, बैठकों में घंटों बैठ सकते हैं, छोटे कार्यकर्ताओं को महत्व देते हैं.” यह गुण सपा के लिए फायदेमंद हो सकता है. पर साथ ही उनकी उम्र 66 वर्ष है और नई पीढ़ी के मतदाता अलग अपेक्षाएं रखते हैं. सोशल मीडिया और डिजिटल अभियान की राजनीति में उनकी पकड़ कितनी है, यह भी अहम होगा. आखिरकार सवाल यही है कि क्या नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा के लिए गेम चेंजर बनेंगे या सिर्फ एक और वरिष्ठ चेहरा साबित होंगे. 

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