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यूपी में गन्ने के खेत बने तेंदुओं का ठिकाना, वन विभाग के सामने बढ़ी चुनौती

मुरादाबाद-बिजनौर में गन्ने के खेत तेंदुओं के लिए सुरक्षित ठिकाना बने, पिछले 42 दिनों में 25 हमलों से बढ़ी चिंता. पिंजरे, ड्रोन और निगरानी टीमों के बावजूद वन विभाग तेंदुओं की बढ़ती गतिविधियों पर काबू नहीं पा सका है

तेंदुए ने ली बच्ची की जान (ai image)
मानसून और सर्दियों के दौरान तेंदुओं के लिए गन्ने के खेत सुरक्षित पनाहगाह बन जाते हैं (फोटो : AI)
अपडेटेड 15 अगस्त , 2026

3 अगस्त को 20 साल की रविता अपनी मां संतोष देवी को खेत में तलाशने पहुंची थी. उन्हें उम्मीद थी कि 45 वर्षीय संतोष खेत में काम कर रही होंगी. लेकिन वहां उन्होंने जो देखा वह शायद ही कभी भूल पाएं.

संतोष मृत पड़ी थीं और उनके शरीर पर तेंदुआ बैठा था. रविता के मुताबिक, तेंदुआ उनकी मां के चेहरे और छाती को खा रहा था. वे बताती हैं कि तेंदुए को देखकर वह इतनी डर गई थीं कि शोर तक नहीं मचाया. 

उन्हें आशंका थी कि शोर करने पर तेंदुआ उन पर भी हमला कर देगा. वे किसी तरह घर पहुंची और परिवार को सूचना दी. परिजन मौके पर पहुंचे तो तेंदुआ वहां से भाग गया. 

यह घटना मुरादाबाद के लालापुर पीपलसाना गांव की है. यह अकेली घटना नहीं है. पिछले कुछ समय में मुरादाबाद और बिजनौर की सीमा से लगे गांवों में तेंदुओं की लगातार मौजूदगी और हमलों ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है. 

42 दिन में 25 हमले

मुरादाबाद में पिछले 42 दिनों में तेंदुओं के करीब 25 हमले सामने आने से वन विभाग की चुनौती का अंदाजा लगाया जा सकता है. 3 अगस्त को लालापुर पीपलसाना में संतोष देवी की मौत ने पूरे इलाके को हिला दिया. इससे पहले जुलाई में ठाकुरद्वारा के राईभूड़ क्षेत्र में चारा काट रही युवती पर तेंदुए ने हमला किया था. 

बिजनौर में बीते आठ महीनों के दौरान 50 तेंदुओं को पकड़ा जा चुका है
बिजनौर में बीते आठ महीनों के दौरान 50 तेंदुओं को पकड़ा जा चुका है

मार्च में ठाकुरद्वारा क्षेत्र में तीन साल के बच्चे को तेंदुए ने दबोच लिया था. बच्चे की मां ने साहस दिखाकर तेंदुए से भिड़कर उसे बचाया था. 

यहां के मलकपुर समाली गांव में भी तेंदुए के हमले लगातार सामने आए हैं. 11 अगस्त को 22 वर्षीय पुष्पेंद्र खेत में काम कर रहा था, तभी उस पर तेंदुए ने हमला कर दिया. उसी दिन 52 वर्षीय तस्लीम पर शाम को खेत से घर लौटते समय हमला हुआ. दोनों घायलों का इलाज चल रहा है. 

इससे पहले इसी इलाके में तीन लोगों पर हमले की सूचना सामने आ चुकी है. ठाकुरद्वारा क्षेत्र में तेंदुए ने सिर्फ इंसानों को ही निशाना नहीं बनाया है. यहां कुत्ते, नीलगाय और घोड़े तक उसके शिकार बने हैं. 

ग्रामीणों का कहना है कि तेंदुए की मौजूदगी अब खेतों तक सीमित नहीं रह गई है. गांवों के आसपास उसकी आवाजाही बढ़ी है और शाम ढलने के बाद लोग अकेले घर से बाहर निकलने में भी डर रहे हैं. 

मुरादाबाद के डीएफओ डॉ. विनय कुमार पांडे का कहना है कि तेंदुए से संबंधित हर सूचना को गंभीरता से लिया जा रहा है. जहां से तेंदुए की मौजूदगी की सूचना मिल रही है, वहां टीम भेजकर निगरानी की जा रही है और जरूरत के अनुसार पिंजरे लगाए जा रहे हैं. लोगों से भी सतर्क रहने की अपील की गई है. 

बिजनौर में भी हालात कम गंभीर नहीं हैं. डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर जय सिंह कुशवाहा के मुताबिक, पिछले आठ महीनों में इलाके से करीब 50 तेंदुए पकड़े जा चुके हैं. इसके बावजूद लगातार तेंदुए दिखने की सूचनाएं मिल रही हैं. 

उन्होंने बताया कि करीब 400 गांवों में निगरानी बढ़ाई गई है और अलग-अलग स्थानों पर करीब 100 पिंजरे लगाए गए हैं. बिजनौर में अब तक तेंदुए के हमले में एक मौत और इंसानों पर हमले के करीब सात मामले सामने आने की बात अधिकारी ने कही है.

गन्ने के खेत बने तेंदुओं की पनाहगाह

मुरादाबाद और बिजनौर के ग्रामीण इलाकों में तेंदुओं की बढ़ती मौजूदगी का सबसे बड़ा कारण गन्ने के खेत माने जा रहे हैं. दोनों जिलों की सीमा से लगे इलाकों में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर होती है. इसके अलावा रामगंगा नदी और उसके आसपास की झाड़ियां तेंदुओं को छिपने और एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराती हैं. 

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ये तेंदुए जरूरी नहीं कि सीधे जंगलों से निकलकर आबादी में पहुंच रहे हों. गन्ने के घने खेत उनके लिए लंबे समय से सुरक्षित ठिकाने बने हुए हैं. इसी वजह से स्थानीय स्तर पर इन्हें कई बार 'गन्ने वाले तेंदुए' भी कहा जाता है. 

भारतीय वन्यजीव संस्थान की देश में तेंदुओं की स्थिति से संबंधित रिपोर्ट में भी गन्ने के खेतों में तेंदुओं की मौजूदगी का उल्लेख किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, गन्ने के खेत तेंदुओं को पर्याप्त सुरक्षा और छिपने की जगह देते हैं. खासतौर पर मानसून और सर्दियों में इन खेतों में उनकी मौजूदगी बढ़ सकती है. 

मादा तेंदुए के लिए गन्ने के खेत में शावकों का जन्म देना और सुरक्षित रखना आसान होता है
मादा तेंदुए के लिए गन्ने के खेत में शावकों का जन्म देना और सुरक्षित रखना आसान होता है

मादा तेंदुए शावकों को जन्म देने और उनके पालन-पोषण के लिए भी गन्ने के खेतों का इस्तेमाल कर सकती हैं. यही वजह है कि गन्ने की कटाई तक ग्रामीणों और वन विभाग दोनों के लिए चुनौती बनी रहती है. 

मानसून ने इस चुनौती को और बढ़ा दिया है. वन्यजीव विशेषज्ञों के शोध में भी मानव-तेंदुआ संघर्ष की घटनाओं में मानसून के दौरान बढ़ोतरी का उल्लेख मिलता है. बारिश के दौरान तेंदुए गीली जमीन से बचने के लिए खेतों में अपेक्षाकृत सुरक्षित और सूखी जगह तलाश सकते हैं. गन्ने की घनी फसल उन्हें ऐसी जगह उपलब्ध कराती है.

एक जगह घेराबंदी, दूसरी जगह हमले की सूचना

वन विभाग के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि तेंदुओं की मौजूदगी का दायरा लगातार बड़ा हो रहा है. मुरादाबाद की ठाकुरद्वारा और कांठ तहसील के साथ डिलारी और भोजपुर क्षेत्र में भी तेंदुओं की गतिविधियां सामने आ रही हैं. 

बिजनौर की चांदपुर और नगीना तहसील भी हॉटस्पॉट बनी हुई हैं. अधिकारियों का अनुमान है कि कांठ, डिलारी, भोजपुर और ठाकुरद्वारा के गन्ने के खेतों में बड़ी संख्या में तेंदुए सक्रिय हो सकते हैं. वन विभाग एक इलाके में घेराबंदी और तलाश अभियान शुरू करता है तो दूसरे क्षेत्र से तेंदुआ दिखने या हमले की सूचना आ जाती है. 

मुरादाबाद में तेंदुओं को पकड़ने के लिए ठाकुरद्वारा क्षेत्र में अब तक 19 पिंजरे लगाए जा चुके हैं. संवेदनशील क्षेत्रों में ड्रोन कैमरों से निगरानी बढ़ाई गई है. संभावित ठिकानों और तेंदुओं के आने-जाने के रास्तों पर वन विभाग की टीमें नजर रख रही हैं. 

12 अगस्त को वन संरक्षक आदर्श कुमार और डीएफओ डॉ. विनय कुमार पांडे भी ठाकुरद्वारा में मौके पर मौजूद रहे और अभियान की निगरानी की. इसके बावजूद उसी दौरान दूसरे इलाकों से हमले की खबरें सामने आती रहीं. 11 अगस्त की सुबह ठाकुरद्वारा में एक तेंदुआ पकड़ा गया, लेकिन इसके बाद डिलारी क्षेत्र में दो युवकों पर तेंदुए के हमले की सूचना ने साफ कर दिया कि एक तेंदुए को पकड़ लेना समस्या का समाधान नहीं है. 

वन विभाग ने मुरादाबाद में तेंदुओं की बढ़ती मौजूदगी, रेस्क्यू और आगे की रणनीति को लेकर विशेषज्ञों से सुझाव भी मांगे हैं. विभाग को अभी विशेषज्ञों की रिपोर्ट का इंतजार है. बिजनौर में भी विभाग ने बड़े पैमाने पर निगरानी अभियान चलाया है. डीएफओ जय सिंह कुशवाहा के अनुसार, आठ महीनों में 50 तेंदुओं को पकड़ने के बावजूद नए सिरे से उनके दिखाई देने की घटनाएं सामने आ रही हैं. 

इससे संकेत मिलता है कि समस्या सिर्फ कुछ तेंदुओं को पकड़ने तक सीमित नहीं है. तेंदुओं के लिए अनुकूल आवास और खेतों में उपलब्ध शिकार के कारण उनकी आवाजाही लगातार बनी रह सकती है. 

वन विभाग के लिए दूसरी चुनौती यह भी है कि पकड़े गए तेंदुओं के बाद इलाके में सक्रिय बाकी तेंदुओं की वास्तविक संख्या का कोई स्पष्ट आकलन नहीं है. अधिकारियों को आशंका है कि बिजनौर से कुछ तेंदुए मुरादाबाद की ओर आए हो सकते हैं, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों जिलों में कुल कितने तेंदुए सक्रिय हैं.

मुरादाबाद शहर की सीमा के करीब भी तेंदुए की मौजूदगी की सूचना ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है. मुरादाबाद के गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय के पास रामगंगा नदी किनारे तेंदुआ दिखाई देने की सूचना के बाद वन विभाग ने विश्वविद्यालय के आसपास खेतों में पिंजरे लगाने का फैसला किया है. नदी, झाड़ियां और आसपास के खेत तेंदुए को शहर की ओर बढ़ने के लिए सुरक्षित रास्ता उपलब्ध करा सकते हैं.

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