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मेरठ कैसे बन रहा भारतीय एथलेटिक्स का नया पावरहाउस?

ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में मेरठ की पारुल और प्रियंका से पदक की उम्मीद जबकि नई पीढ़ी के कई एथलीट एशियन गेम्स के लिए क्वालिफाई कर शहर को एथलेटिक्स का नया गढ़ बना रहे हैं

मेरठ की पारुल चौधरी ने 5000 मीटर दौड़ में जीता स्वर्ण पदक
मेरठ की एथलीट पारुल चौधरी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 7 जुलाई , 2026

उत्तर प्रदेश में खेल नगरी के नाम से पहचाना जाने वाला पश्च‍िमी यूपी का जिला मेरठ एक नई पहचान गढ़ रहा है. यह पहचान है एथलेटिक्स की. लंबी दूरी की दौड़, पैदल चाल, स्प्रिंट और हाई जंप जैसे इवेंट्स में मेरठ के खिलाड़ी लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं.

यही वजह है कि 23 जुलाई से ग्लास्गो में शुरू होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय एथलेटिक्स टीम में मेरठ की दो बेटियां शामिल हैं जबकि हाल में संपन्न 65वीं नेशनल इंटरस्टेट सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप के बाद एशियन गेम्स के लिए भी मेरठ के खिलाड़ियों ने शानदार क्वालिफिकेशन हासिल किया है.

दिलचस्प बात यह है कि इस बार राष्ट्रमंडल खेलों में हॉकी, निशानेबाजी, बैडमिंटन और कुश्ती जैसी पारंपरिक भारतीय पदक स्पर्धाएं शामिल नहीं हैं. ऐसे में भारतीय दल की सबसे बड़ी उम्मीद एथलेटिक्स से है और उत्तर प्रदेश के पांच खिलाड़ियों में दो मेरठ से हैं. यह केवल संयोग नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों में तैयार हुए उस खेल तंत्र का परिणाम है जिसने मेरठ को भारतीय एथलेटिक्स के नए केंद्र के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया है.

मेरठ की दो बेटियां जिन पर देश की निगाहें

ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में मेरठ की सबसे बड़ी उम्मीद लंबी दूरी की धाविका पारुल चौधरी हैं. पिछले कुछ वर्षों में पारुल ने जिस तेजी से खुद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया है, उसने उन्हें भारतीय एथलेटिक्स की सबसे भरोसेमंद खिलाड़ियों में शामिल कर दिया है. पारुल 5000 मीटर और 3000 मीटर स्टीपलचेज दोनों स्पर्धाओं में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी. हाल ही में फ्रांस में आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने 5000 मीटर दौड़ 15 मिनट 04.26 सेकंड में पूरी कर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया. उनके नाम पहले से 3000 मीटर स्टीपलचेज और 5000 मीटर दोनों के राष्ट्रीय रिकॉर्ड दर्ज हैं.

प्रियंका गोस्वामी (फाइल फोटो)
प्रियंका गोस्वामी (फाइल फोटो)

एशियाई खेलों और एशियाई चैंपियनशिप में पदक जीत चुकी पारुल पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में उतरेंगी. उनकी मौजूदा फॉर्म को देखते हुए उनसे पदक की उम्मीद सबसे अधिक की जा रही है. दूसरी ओर, पैदल चाल की ओलिंपियन प्रियंका गोस्वामी लगातार दूसरी बार राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेंगी. दो ओलिंपिक खेल चुकी प्रियंका भारतीय रेस वॉक की सबसे सफल खिलाड़ियों में गिनी जाती हैं. 10 से 35 किलोमीटर तक की कई राष्ट्रीय उपलब्धियां उनके नाम दर्ज हैं. बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने 10 किलोमीटर पैदल चाल में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा था. ग्लास्गो में भी भारतीय दल को उनसे एक और पदक की उम्मीद है.

इन दोनों खिलाड़ियों की सफलता ने मेरठ की लड़कियों के लिए नई प्रेरणा तैयार की है. कुछ वर्ष पहले तक जहां एथलेटिक्स में लड़कियों की संख्या सीमित थी, वहीं अब बड़ी संख्या में युवा खिलाड़ी ट्रैक और फील्ड इवेंट्स को करियर के रूप में चुन रही हैं. कोचों का मानना है कि किसी एक खिलाड़ी की अंतरराष्ट्रीय सफलता पूरे क्षेत्र की खेल संस्कृति को बदल देती है और मेरठ में यही बदलाव साफ दिखाई दे रहा है.

स्प्रिंट से हाई जंप तक, नई पीढ़ी तैयार है

मेरठ की एथलेटिक्स यात्रा केवल पारुल और प्रियंका तक सीमित नहीं है. 65वीं नेशनल इंटरस्टेट सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप ने दिखा दिया कि शहर के पास प्रतिभाओं की नई खेप तैयार है. महिला 400 मीटर स्पर्धा में नीरू पाठक ने 53.47 सेकंड का समय निकालकर एशियन गेम्स का क्वालिफाइंग मानक पार कर लिया. हालांकि वे चौथे स्थान पर रहीं, लेकिन उनका समय निर्धारित क्वालिफिकेशन से बेहतर था. अलीगढ़ से आने वाली नीरू मेरठ के प्रशिक्षण तंत्र से जुड़ी हैं. उनका प्रदर्शन यह संकेत देता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश अब महिला स्प्रिंटिंग में भी मजबूत आधार तैयार कर चुका है.

हाई जंप में ख्याति माथुर ने 1.80 मीटर की छलांग लगाकर एशियन गेम्स के लिए क्वालिफाई किया. पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने जूनियर और राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अच्छे प्रदर्शन किए हैं. जून 2024 में उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 1.86 मीटर रहा था जो उनकी क्षमता का प्रमाण है. तकनीकी दक्षता और दबाव में शांत रहने की उनकी क्षमता उन्हें भविष्य की बड़ी उम्मीद बनाती है.

नीरू पाठक (फाइल फोटो)
नीरू पाठक (फाइल फोटो)

पुरुष वर्ग में जय कुमार ने 400 मीटर दौड़ 45.73 सेकंड में पूरी कर एशियन गेम्स का क्वालिफिकेशन हासिल किया. राष्ट्रीय स्तर पर तीसरा स्थान हासिल करने वाले जय इस बात का उदाहरण हैं कि मेरठ का प्रशिक्षण नेटवर्क पुरुष स्प्रिंटर्स को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में सक्षम हो चुका है. इन तीनों खिलाड़ियों की एक और समानता है. वे नानक चंद स्पोर्ट्स एकेडमी से जुड़े हैं और मेरठ के एनएएस कॉलेज के छात्र रहे हैं.

इसका मतलब है कि शहर में केवल व्यक्तिगत प्रतिभा नहीं बल्कि संस्थागत स्तर पर भी खिलाड़ियों को तैयार करने की व्यवस्थित प्रक्रिया विकसित हो रही है. कोच विशाल और अमिता सक्सेना की जोड़ी ने तकनीकी प्रशिक्षण, फिटनेस, रेस रणनीति और प्रतियोगिता आधारित तैयारी पर विशेष ध्यान दिया है. आधुनिक एथलेटिक्स में यही वैज्ञानिक प्रशिक्षण अंतर पैदा करता है और मेरठ के खिलाड़ी अब उसी मॉडल पर आगे बढ़ रहे हैं.

कोचिंग, प्रतिस्पर्धा और जज्बा, मेरठ की सफलता का असली फॉर्मूला

किसी भी स्पोर्ट सिटी की पहचान केवल खिलाड़ियों से नहीं बनती. उसके पीछे मजबूत कोचिंग व्यवस्था, प्रतिस्पर्धी माहौल, खेल संस्थान और स्थानीय संस्कृति की बड़ी भूमिका होती है. मेरठ की एथलेटिक्स सफलता भी इन्हीं कारकों का परिणाम है. कोच गौरव त्यागी के मुताबिक मेरठ के युवा खिलाड़ी एक-दूसरे को देखकर प्रेरित होते हैं. उनके अनुसार मेरठ में एथलेटिक्स केवल खेल नहीं बल्कि खुद को साबित करने का माध्यम बन चुका है. ख्याति माथुर की सफलता के बाद बड़ी संख्या में लड़कियां हाई जंप की ओर आई हैं. उनके अनुसार लगभग एक दर्जन प्रतिभाशाली महिला हाई जंपर्स नियमित प्रशिक्षण ले रही हैं.

प्रियंका गोस्वामी की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों का असर भी साफ दिखाई देता है. गौरव त्यागी के मुताबिक जब प्रियंका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैदल चाल में सफलता हासिल की तो बड़ी संख्या में लड़कियों ने रेस वॉक अपनाना शुरू किया. आज उनके पास विभिन्न स्पर्धाओं में 250 से अधिक खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे हैं. मेरठ एथलेटिक्स एसोसिएशन के सचिव अनु कुमार का मानना है कि इस क्षेत्र के खिलाड़ियों में संघर्ष करने की स्वाभाविक क्षमता है. उनके अनुसार यहां के खिलाड़ी बेहतर सुविधाओं के लिए रोज मेरठ से दिल्ली तक जाकर अभ्यास करने से भी पीछे नहीं हटते. यही जज्बा उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा रहा है.

खेल विभाग में कोच रहे एक खि‍लाड़ी बताते हैं, “हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं. कैलाश प्रकाश स्टेडियम में सिंथेटिक एथलेटिक्स ट्रैक लगभग तैयार हो चुका है लेकिन आधुनिक उपकरणों का इंतजार अब भी जारी है. यदि यह सुविधा पूरी तरह विकसित हो जाती है तो खिलाड़ियों को दिल्ली या अन्य शहरों का रुख कम करना पड़ेगा और स्थानीय स्तर पर ही उच्च गुणवत्ता का प्रशिक्षण उपलब्ध हो सकेगा.” फिर भी सीमित संसाधनों के बावजूद मेरठ ने जिस तरह अपना खेल इकोसिस्टम विकसित किया है, वह उल्लेखनीय है. शहर में विभिन्न खेलों के 500 से अधिक खिलाड़ी नियमित प्रशिक्षण ले रहे हैं. प्रतिभा, अनुभवी कोच, प्रतियोगी माहौल, खेल संस्थान और खिलाड़ियों की मेहनत ने मिलकर ऐसा वातावरण तैयार किया है जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी लगातार निकल रहे हैं.

ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में पारुल चौधरी और प्रियंका गोस्वामी पर पूरे देश की निगाहें होंगी. वहीं एशियन गेम्स के लिए क्वालिफाई कर चुके नीरू पाठक, ख्याति माथुर और जय कुमार यह संकेत दे चुके हैं कि मेरठ की एथलेटिक्स कहानी अभी शुरुआत भर है.

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