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महाराष्ट्र में अब पानी की हर बूंद का रखा जाएगा हिसाब

महाराष्ट्र सरकार 'वॉटर 7/12' के जरिए गांवों में जल भंडार का पूरा रिकॉर्ड तैयार करेगी. इसके साथ ही पानी बचाने वालों को 'वॉटर क्रेडिट' देकर उसे कारोबार योग्य संपत्ति बनाने की भी तैयारी है

यूपी के गांवों में होगी अबाध्य जल आपूर्ति
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 9 जुलाई , 2026

महाराष्ट्र सरकार पहली बार गांवों के लिए 'वॉटर 7/12' नाम का एक अहम जल ऑडिट सिस्टम शुरू करेगी. इसे देश की पहली राज्यव्यापी जल सूची और जल ऑडिट पहल बताया जा रहा है. इसके तहत जल भंडार का आकलन किया जाएगा. पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल का पता लगाया जाएगा. साथ ही कार्बन क्रेडिट की तर्ज पर कारोबार योग्य 'वॉटर क्रेडिट' की व्यवस्था शुरू की जाएगी.

इस सिस्टम को पायलट परियोजना के तौर पर लागू किया जाएगा. इसका फैसला मुंबई में राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया गया. बैठक में राजस्व, जल आपूर्ति एवं स्वच्छता और ग्रामीण विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. दुनिया के पहले डिजिटल वॉटर बैंक एक्वेरियम (AqVerium) के संस्थापक सुब्रमण्य कुसनूर भी मौजूद थे.

कुसनूर ने आईआईटी बॉम्बे के जल विशेषज्ञ अविनाश कदम और अर्थशास्त्री उदय नायर के साथ मिलकर आधुनिक 'वॉटर अकाउंटिंग फ्रेमवर्क' और 'वॉटर बैलेंस-शीट' विकसित की है. यह प्रणाली जल संसाधनों का ऑडिट करेगी. इससे ग्राम पंचायत और जलग्रहण क्षेत्र स्तर पर जल भंडार की पारदर्शी निगरानी संभव होगी. इसमें पानी का आगमन, निकासी और सालाना शेष जल भंडार दर्ज होगा. ऑडिट में जल भंडारण और खपत का सटीक रिकॉर्ड रखा जाएगा. इससे आंकड़ों के आधार पर पानी के इस्तेमाल से जुड़े फैसले लिए जा सकेंगे. जवाबदेही और जल प्रबंधन भी सुनिश्चित होगा.

अधिकारियों के मुताबिक इस सिस्टम का लक्ष्य 'मापी जा सकने वाली संपत्ति के रूप में पानी' की अवधारणा विकसित करना और जल भंडार का सत्यापन करना है. शुरुआती जल भंडार, पुनर्भरण और आपूर्ति में से उपयोग और निकासी घटाकर पानी की अधिकता या कमी का हिसाब लगाया जाएगा. जिन शहरी या ग्रामीण क्षेत्रों में पानी अधिशेष होगा, वे अपने वॉटर क्रेडिट ज्यादा पानी खपत करने वाले उद्योगों को बेच सकेंगे. इनमें बीयर, शीतल पेय और पैकेज्ड पानी बनाने वाले उद्योग शामिल हैं.

इस सिस्टम को राज्य सरकार की प्रमुख 'जलयुक्त शिवार' अभियान जैसी जल संरक्षण योजनाओं से भी जोड़ा जाएगा. इस अभियान का उद्देश्य जल संकट दूर करना है. पानी फाउंडेशन जैसी संस्थाओं की पहलों को भी इसमें शामिल किया जाएगा. इसका मतलब है कि पानी बचाने वाले व्यक्तियों और समुदायों को 'वॉटर क्रेडिट' के रूप में प्रोत्साहन मिलेगा. वे इन्हें एक संपत्ति के रूप में आय का स्रोत भी बना सकेंगे.

कुसनूर कहते हैं कि जल संकट और भूजल स्तर में गिरावट का असर पीने के पानी और कृषि के लिए पानी की कमी के रूप में दिखाई दे रहा है. उनके मुताबिक, "अगर पानी को मुद्रा जितना सम्मान नहीं दिया जाएगा तो कोई भी उसका सम्मान नहीं करेगा."

जल ऑडिट उसी तरह किए जाएंगे जैसे वित्तीय ऑडिट होते हैं. इसके आधार पर पानी की उपलब्धता और कमी की बैलेंस-शीट तैयार की जाएगी. वर्षा और बोरवेल जैसे जल स्रोतों का मानचित्र तैयार होगा. भूजल संबंधी आंकड़े महाराष्ट्र की ग्राउंडवॉटर सर्वे एंड डेवलपमेंट एजेंसी और भू-स्थानिक यानी जियो-स्पेशियल मैपिंग के आधार पर जुटाए जाएंगे. पानी के उपयोग और कमी की निगरानी के लिए ब्लॉकचेन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा.

कुसनूर ने बताया कि सातारा जिले के मारुल हवेली और पुणे जिले के खेड़ शिवापुर के कडूस में जल पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) की मैपिंग शुरू की जा चुकी है. इस परियोजना के लिए एक नगर परिषद पर भी विचार किया जा रहा है. इसका फोकस जल संचयन, पुनर्चक्रण और पानी का आर्थिक उपयोग (मॉनिटाइजेशन) होगा.

एक्वेरियम दुनिया का एकमात्र मंच है जो एक्वाक्रेडिट्स यानी वॉटर क्रेडिट जारी करता है. इसमें 1,000 लीटर पानी को एक क्रेडिट के बराबर माना जाता है. कुसनूर ने कहा कि अब तक करीब 70 लाख वॉटर क्रेडिट जारी किए जा चुके हैं.

एक्वाक्रेडिट को ‘एक मानकीकृत और कारोबार योग्य इकाई के रूप में बताया गया है, जो एक किलोलीटर संरक्षित, पुनर्चक्रित या संचित पानी का प्रतिनिधित्व करती है. हर क्रेडिट का स्वतंत्र सत्यापन किया जाता है और उसे अपरिवर्तनीय लेजर में दर्ज किया जाता है.’ ये वॉटर क्रेडिट पुनर्चक्रित पानी, वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण से हुई बचत के लिए जारी किए जाते हैं.

कंक्रीटीकरण के कारण पानी जमीन में नहीं समा पाता. इससे भूजल स्तर प्रभावित होता है. अधिकारियों ने कहा कि इस समस्या को देखते हुए शहरी क्षेत्रों की लगभग 15 प्रतिशत जमीन बिना पक्की छोड़े जाने का प्रस्ताव है, ताकि पानी जमीन में रिस सके. बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की जगह क्लस्टर आधारित या विकेंद्रीकृत मॉडल का प्रस्ताव भी रखा गया है, ताकि ज्यादा क्षेत्रों को इसका लाभ मिल सके. पानी की खपत का सटीक रिकॉर्ड रखने के लिए सभी जल आपूर्ति कनेक्शनों पर मीटर लगाने पर भी विचार किया जा रहा है.

महाराष्ट्र जल संसाधन नियामक प्राधिकरण के अनुसार, पश्चिमी घाट के पूर्व में स्थित पांच नदी घाटियों में से चार- कृष्णा, गोदावरी, तापी और नर्मदा- में भरोसेमंद जल उपलब्धता का केवल 55 प्रतिशत हिस्सा ही उपलब्ध है. इन चार घाटियों में राज्य की 92 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि और 60 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण आबादी रहती है.

इन चार नदी घाटियों के लगभग 49 प्रतिशत क्षेत्र, जहां 43 प्रतिशत आबादी रहती है, को पहले से ही जल की कमी वाले या अत्यधिक जल संकट वाले क्षेत्र माना जाता है. आबादी और आर्थिक विकास बढ़ने के साथ इन क्षेत्रों का दायरा लगातार बढ़ने की आशंका है.

MWRRA के अनुसार, शेष 45 प्रतिशत जल प्रवाह पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों से आता है. इनका उद्गम पश्चिमी घाट में है. ये नदियां मानसून पर निर्भर हैं और अरब सागर में जाकर मिलती हैं.

महाराष्ट्र का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 3.08 करोड़ हेक्टेयर है. इसकी कृषि योग्य भूमि 2.25 करोड़ हेक्टेयर है. इसमें से 40 प्रतिशत क्षेत्र सूखा प्रभावित है जबकि लगभग 7 प्रतिशत क्षेत्र बाढ़ प्रभावित है.

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