महाराष्ट्र सरकार ने अलग-अलग धर्मों के लिए लागू नागरिक कानूनों में एकरूपता लाने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए राज्य के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform Civil Code) यानी UCC का मसौदा तैयार करने के लिए समिति बनाने का ऐलान किया है. सात सदस्यों की इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना देसाई करेंगी. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई में हाल में हुए विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान इसकी घोषणा की.
समिति में बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर.सी. चव्हाण और जस्टिस एस.जी. मेहरे, पूर्व मुख्य सचिव डी.के. जैन, महाराष्ट्र के पूर्व महाधिवक्ता बीरेंद्र सराफ, पद्मश्री से सम्मानित और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ कार्यकर्ता रमेश पतंगे तथा सामाजिक कार्यकर्ता सुवर्णा रावल भी शामिल हैं.
BJP शासित उत्तराखंड, गुजरात और असम पहले ही UCC लागू कर चुके हैं. जस्टिस रंजना देसाई उत्तराखंड और गुजरात सरकारों की ओर से UCC लागू करने के लिए गठित समितियों की अध्यक्ष रह चुकी हैं. वह पश्चिम बंगाल सरकार की उस समिति का भी हिस्सा हैं, जिसे राज्य के लिए UCC विधेयक के मसौदे की समीक्षा का जिम्मा दिया गया है.
फडणवीस ने राज्य विधानसभा में कहा, "भारतीय संविधान के राज्य के नीति-निर्देशक तत्व कहते हैं कि हर राज्य को यूनिफॉर्म सिविल कोड तैयार करने पर विचार करना चाहिए." उन्होंने कहा कि इसी के तहत यह समिति बनाई जा रही है और यह छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी. उन्होंने यह भी कहा, "हमारा प्रयास रहेगा कि इस कानून को नागपुर में होने वाले आगामी शीतकालीन सत्र (दिसंबर) के दौरान राज्य विधानसभा के दोनों सदनों में पेश किया जाए."
प्रस्तावित कानून में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे विषय शामिल होने की उम्मीद है. यह कानून जाति और धर्म से परे सभी पर लागू होगा. फिलहाल हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी जैसे धार्मिक समुदायों के अपने-अपने कानून हैं. UCC इन कानूनों की जगह लेगा.
UCC लागू करने वाला पहला राज्य उत्तराखंड था. इसके बाद गुजरात ने अपना UCC कानून पारित किया और फिर असम ने भी इसे लागू किया.
समाजवादी पार्टी के विधायक रईस शेख ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार की समिति में अल्पसंख्यक और वंचित समुदायों की आवाज को जगह नहीं दी गई है. उन्होंने कहा, "संविधान के अनुच्छेद 14 और 29 हर धर्म की रक्षा करते हैं और सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देते हैं. लेकिन महाराष्ट्र सरकार की सात सदस्यीय यूनिफॉर्म सिविल कोड समिति में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं है. इसमें केवल सत्तारूढ़ दल की विचारधारा से जुड़े लोग शामिल हैं."
शेख ने कहा, "मुस्लिमों, दलितों और पिछड़े समुदायों की आवाज को दबाकर एक निष्पक्ष UCC तैयार नहीं किया जा सकता. हम सरकार से आग्रह करते हैं कि वह जागे और इस समिति में जानकार अल्पसंख्यक विशेषज्ञों को शामिल करे, ताकि वास्तविक न्याय और समावेशिता सुनिश्चित हो सके."
सामाजिक सुधारक और कार्यकर्ता हामिद दलवई द्वारा स्थापित 'मुस्लिम सत्यशोधक मंडल' 1970 के दशक से UCC की मांग करता रहा है. यह संगठन समुदाय के अपने-अपने कानूनों में सुधार और उन्हें धर्मनिरपेक्ष बनाने के प्रयासों का भी समर्थन करता रहा है.
लेखक और इंडियन सेक्युलर सोसाइटी के संस्थापक हामिद दलवई ने अप्रैल 1966 में एकतरफा मौखिक तलाक से प्रभावित मुस्लिम महिलाओं का राज्य के प्रशासनिक मुख्यालय तक मोर्चा निकाला था. मार्च 1970 में मुस्लिम समाज में सामाजिक और धार्मिक सुधारों के लिए मुस्लिम सत्यशोधक मंडल की स्थापना की गई. हालांकि समुदाय के रूढ़िवादी वर्गों ने इसका विरोध किया. यह मंडल शाह बानो के उस ऐतिहासिक मामले में भी उनके साथ खड़ा रहा था, जिसमें 60 वर्षीय तलाकशुदा महिला के भरण-पोषण का मुद्दा उठा था.

