पूरे अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के आरक्षण के भीतर सब-कोटा को लेकर दलित समूहों के बीच बढ़ती खींचतान के बीच महाराष्ट्र सरकार ने कहा है कि इस मामले में कोई भी फैसला सभी पक्षों की बात सुनने के बाद ही लिया जाएगा.
देवेंद्र फडणवीस सरकार में सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट ने भरोसा दिया कि अनुसूचित जातियों के सब-कैटेगराइजेशन की प्रक्रिया में समाज के किसी भी वर्ग के साथ अन्याय नहीं होगा. उन्होंने कहा, "यह प्रक्रिया पारदर्शी, कानूनी और ईमानदार तरीके से लागू की जा रही है."
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना से आने वाले शिरसाट अनुसूचित जातियों में दूसरे सबसे बड़े समूह मातंग समुदाय की समस्याओं को लेकर हुई एक बैठक में बोल रहे थे.
मार्च में पटना हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनंत मनोहर बदर की अध्यक्षता वाली एक सदस्यीय समिति ने अनुसूचित जाति के कोटे के सब-कैटेगराइजेशन के ढांचे को लेकर अपनी रिपोर्ट महाराष्ट्र सरकार को सौंपी थी. राज्य सरकार ने मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल की अध्यक्षता में एक और समिति बनाई है. यह समिति इस रिपोर्ट पर सुझाव और आपत्तियां मंगाएगी और लोगों की सुनवाई करेगी.
शिरसाट ने कहा कि बदर समिति की रिपोर्ट को सरकार ने अभी स्वीकार नहीं किया है. विभिन्न वर्गों से मिले सुझावों, आपत्तियों और ज्ञापनों पर विचार किया जाएगा और उनकी सुनवाई की जाएगी. इसके बाद ही सब-कैटेगराइजेशन का प्रस्ताव राज्य मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा.
पिछले अगस्त में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने राज्यों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण करने की अनुमति दी थी.
महाराष्ट्र में अनुसूचित जातियों को 13 फीसदी आरक्षण मिलता है. हालांकि कुछ हिंदू दलित संगठन, जिनमें ज्यादातर मातंग समुदाय के संगठन हैं, आरोप लगाते हैं कि बौद्ध दलितों ने अन्य समूहों की कीमत पर आरक्षण के ज्यादातर लाभ हासिल कर लिए हैं. ये महार समुदाय के वे लोग हैं जिन्होंने 1956 में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया था. हालांकि बौद्ध दलित नेता इस आरोप से इनकार करते हैं.
हिंदू दलित संगठनों का कहना है कि अनुसूचित जाति के कोटे के भीतर कुछ श्रेणियों के लिए आरक्षण तय करने या सब-कोटा की व्यवस्था से उनके हितों की रक्षा हो सकेगी. अनुसूचित जाति की श्रेणी में 59 जातियां शामिल हैं और इनमें बौद्ध दलितों की संख्या सबसे ज्यादा है.
राज्य की आबादी में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी करीब 12 फीसदी है. माना जाता है कि BJP और संघ परिवार ने हिंदू दलित समूहों के बीच अपनी पैठ बनाई है. BJP विधान परिषद सदस्य अमित गोरखे जैसे मातंग नेताओं को बौद्ध दलित और चर्मकार समूहों के खिलाफ खड़ा माना जा रहा है.
दोनों खेमों की ओर से मोर्चे निकाले गए हैं. सब-कैटेगराइजेशन के समर्थकों और विरोधियों ने यह लड़ाई सोशल मीडिया पर भी पहुंचा दी है.
राज्य में आंतरिक कोटे की मांग का एक उदाहरण पहले से मौजूद है. 30 फीसदी आरक्षण पाने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को OBC श्रेणी (19 फीसदी) और विमुक्त जाति एवं घुमंतू जनजाति (VJNT) (11 फीसदी) में बांटा गया है. VJNT को आगे विमुक्त जाति (VJ) (विमुक्त जनजातियां, 3 फीसदी) और घुमंतू जनजाति (NT) (2.5 फीसदी), C (धनगर समुदाय, 3.5 फीसदी) और D (वंजारी समुदाय, 2 फीसदी) में बांटा गया है.
पूर्व मंत्री और NCP विधायक राजकुमार बडोले ने कहा है कि बदर समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है, फिर भी उस पर सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं. उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया जाति आधारित जनगणना के बाद ही शुरू की जानी चाहिए. साथ ही अनुसूचित जातियों में विभिन्न जातियों की आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक प्रगति से जुड़े मौजूदा आंकड़े भी उपलब्ध होने चाहिए.
बडोले ने यह भी कहा कि किसी जाति को अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल करने के लिए राष्ट्रपति के आदेश की जरूरत होती है, लेकिन राज्यों को अनुसूचित जातियों के भीतर सब-कैटेगराइजेशन करने का अधिकार अपने विवेक से नहीं दिया जा सकता.
इस कदम के विरोधियों को यह भी डर है कि कोटे के भीतर कोटा करने से दलितों के बीच एकजुटता कमजोर होगी. दलितों में छुआछूत के कलंक जैसी समान सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियां रही हैं.
1965 में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूचियों में संशोधन को लेकर केंद्र सरकार की ओर से गठित सलाहकार समिति की रिपोर्ट में कहा गया था, "कुछ समय से यह सामने आता रहा है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए तय विभिन्न लाभों और रियायतों का बड़ा हिस्सा संख्या में बड़ी और राजनीतिक रूप से संगठित समुदायों को मिल जाता है. छोटे और अधिक पिछड़े समुदाय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में पीछे छूट जाते हैं, जबकि वे विशेष सहायता के अधिक हकदार होते हैं.”
इसी रिपोर्ट के मुताबिक, “राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक और बड़े समूहों के राजनीतिक क्षेत्र में अपनी ताकत दिखाने से बचने का कोई रास्ता नहीं है. लेकिन योजना और विकास के मामलों में हमारा मानना है कि लाभों का वितरण चुनिंदा आधार पर अधिक पिछड़े और छोटे समूहों पर केंद्रित होना चाहिए."

