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विदेशियों को क्यों भाने लगी 'मेड इन यूपी' शराब?

उत्तर प्रदेश से शराब उत्पादों के निर्यात में 45.4 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी हुई है और इसका निर्यात करने वाले राज्यों में सातवें या आठवें स्थान पर रहने वाला यूपी पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर तीसरे स्थान पर पहुंच गया है

वाइन टेस्टर की जॉब में मिलती है बढ़िया सैलरी.(Photo: pexels )
वाइन टेस्टर की जॉब में मिलती है बढ़िया सैलरी.(Photo: pexels )
अपडेटेड 21 अगस्त , 2026

उत्तर प्रदेश की पहचान लंबे समय से देश के सबसे बड़े शराब बाजारों में होती रही है, लेकिन अब राज्य की शराब देश की सीमाओं से बाहर भी अपनी जगह बना रही है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश से शराब उत्पादों के निर्यात में 45.4 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी हुई है.

यह बढ़ोतरी राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है. अप्रैल से जून के बीच भारत से कुल 965 करोड़ रुपए मूल्य के शराब उत्पादों का निर्यात हुआ, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 122.3 करोड़ रुपए रही. यानी देश से हुए कुल शराब निर्यात का करीब 13 प्रतिशत हिस्सा यूपी से आया.

मात्रा के लिहाज से भी उत्तर प्रदेश की तस्वीर तेजी से बदल रही है. इस तिमाही में भारत से करीब 8.13 करोड़ लीटर शराब उत्पादों का निर्यात किया गया. इसमें लगभग 1.05 करोड़ लीटर का उत्पादन उत्तर प्रदेश की डिस्टिलरीज में हुआ था. यानी देश से बाहर जाने वाली शराब की एक बड़ी मात्रा अब यूपी की डिस्टिलरीज से निकल रही है.

खास बात यह है कि पारंपरिक रूप से शराब निर्यात करने वाले राज्यों में सातवें या आठवें स्थान पर रहने वाला यूपी पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर तीसरे स्थान पर पहुंच गया है. महाराष्ट्र और पंजाब के बाद अब उत्तर प्रदेश शराब निर्यात के बड़े केंद्र के तौर पर उभर रहा है. सवाल है कि आखिर यूपी में बनी शराब की विदेशी बाजार में मांग क्यों बढ़ रही है?

डिस्टिलरीज किसानों से गन्ना और अनाज की खरीद बढ़ा रही हैं
यूपी की डिस्टिलरीज गन्ना और अनाज की खरीद बढ़ा रही हैं जिससे किसानों को भी फायदा हो रहा है (सांकेतिक तस्वीर)

क्या इसकी वजह सिर्फ राज्य सरकार की नई आबकारी निर्यात नीति है या यूपी की डिस्टिलरीज ने भी बदलते वैश्विक बाजार की जरूरत के मुताबिक खुद को तैयार किया है? और क्या यह तेजी आगे भी कायम रह पाएगी?

ऐसे सस्ती हुई मेड इन यूपी शराब

यूपी की शराब को विदेशी बाजार तक पहुंचाने की राह आसान बनाने के लिए प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस साल फरवरी में पहली बार तीन वर्षों के लिए अलग आबकारी निर्यात नीति लागू की है. आबकारी निर्यात नीति 2026 से 2029 तक प्रभावी रहेगी.

इसके साथ वर्ष 2026-27 की नई आबकारी नीति भी लागू की गई है. दोनों नीतियों को फरवरी में हुई कैबिनेट बैठक में मंजूरी दी गई थी. इन नीतियों को लागू करने में प्रदेश के आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल और आबकारी आयुक्त आदर्श सिंह की बड़ी भूमिका है.
 
इससे पहले शराब निर्यात के लिए उत्तर प्रदेश में अलग से ऐसी नीति नहीं थी. सरकार ने नई नीति में उन शुल्कों को कम करने की कोशिश की है, जो उत्पाद को विदेशी बाजार में पहुंचाने की लागत बढ़ाते हैं. यही वजह है कि उद्योग जगत यूपी के शराब निर्यात में आई तेज वृद्धि को नई नीति से जोड़कर देख रहा है.

सरकार ने विदेशी शराब, बीयर और वाइन पर लगने वाला फ्रैंचाइजी शुल्क समाप्त कर दिया है. नई नीति में ब्रांड रजिस्ट्रेशन फीस भी माफ कर दी गई है. इसके अलावा बोतल भराई शुल्क में भी घरेलू और विदेशी बाजार के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई है.

भारत में निर्मित विदेशी शराब और वाइन की 2000 एमएल बोतल के लिए देश के भीतर निर्यात का भराई शुल्क 0.79 से 4.11 रुपए और विदेश निर्यात के लिए 0.32 से 4.11 रुपए निर्धारित किया गया है. 1000 एमएल की बोतल के लिए यह शुल्क घरेलू निर्यात में 0.40 से 2.05 रुपए और विदेशी निर्यात के लिए 0.16 से 2.05 रुपए प्रति बोतल रखा गया है.

यूपी की नई आबकारी नीति में फलों से तैयारी होने वाली वाइन को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है (सांकेतिक तस्वीर)
यूपी की नई आबकारी नीति में फलों से तैयारी होने वाली वाइन को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है (सांकेतिक तस्वीर)

750 एमएल से 60 एमएल तक की बोतलों के लिए भी अलग-अलग शुल्क तय किए गए हैं. बीयर को भी इस नीति में राहत मिली है. ड्राफ्ट बीयर के 50 लीटर के केग के लिए देश के भीतर निर्यात का बोतल भराई शुल्क 7.55 रुपए से 36.23 रुपए रखा गया है, जबकि यूपी में निर्मित बीयर को विदेशी बाजार में भेजने के लिए यह शुल्क 3.10 रुपए से 36.23 रुपए निर्धारित किया गया है.

यानी सरकार की कोशिश यह है कि यूपी में बनने वाले शराब उत्पादों की लागत कम हो और वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरे देशों और भारतीय राज्यों के उत्पादों से मुकाबला कर सकें. इसके लिए सिर्फ उत्पादन बढ़ाने पर जोर नहीं है, बल्कि ब्रांडिंग, लेबलिंग, पंजीकरण और फ्रैंचाइजी जैसे खर्चों को भी कम किया गया है.

ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष विनोद गिरी इसे राज्य की सक्रिय नीति का परिणाम मानते हैं. उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश देश का पहला और एकमात्र राज्य है जिसने शराब के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विशेष नीति बनाई है.

वे बताते हैं कि नीति तैयार करने से पहले मौजूदा ढांचे का अध्ययन किया गया और ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश हुई जिससे उद्यमियों के साथ किसानों को भी फायदा हो. हालांकि गिरी यह भी साफ करते हैं कि सिर्फ नीति के सहारे निर्यात की रफ्तार लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती. इसके लिए अच्छे गुणवत्ता वाले उत्पाद भी जरूरी हैं. उनके मुताबिक, यूपी के पास बेहतर नीति ढांचा है, अब इसे अच्छे उत्पादों के साथ जोड़ने की जरूरत है.

कारोबार बढ़ने का फायदा किसानों तक

शराब के निर्यात में आई तेजी का असर सिर्फ डिस्टिलरी और आबकारी विभाग तक सीमित नहीं है. उत्पादन बढ़ने के साथ इसका असर कृषि और उससे जुड़े कई दूसरे क्षेत्रों पर भी दिखाई दे रहा है. उत्तर प्रदेश में डिस्टिलरीज किसानों से गन्ना और अनाज की खरीद बढ़ा रही हैं. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा मिल रहा है और किसानों के लिए स्थानीय स्तर पर बाजार मजबूत हो रहा है.

आबकारी आयुक्त आदर्श सिंह के मुताबिक, यूपी में डिस्टिलरीज किसानों से अधिक गन्ना और अनाज खरीद रही हैं, जिससे ग्रामीण आय बढ़ रही है. शराब उत्पादन बढ़ने के साथ कांच की बोतलों, पैकेजिंग सामग्री, लॉजिस्टिक्स और परिवहन सेवाओं की मांग भी बढ़ रही है. इन क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं.

यूपी के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य के पास शराब उत्पादन के लिए जरूरी कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता है. गन्ना उत्पादन में राज्य देश के प्रमुख राज्यों में है. इसके अलावा अनाज का भी बड़ा उत्पादन होता है.

डिस्टिलरीज के बढ़ते नेटवर्क और कच्चे माल की उपलब्धता ने राज्य को शराब और ENA उत्पादन के लिए मजबूत आधार दिया है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बोतलबंद शराब और एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल यानी ENA के उत्पादन में 163 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. ENA शराब निर्माण में इस्तेमाल होने वाला महत्वपूर्ण कच्चा माल है.

सरकार ने ड्यूटी स्ट्रक्चर और रजिस्ट्रेशन फीस में बदलाव करके भी उत्पादन और निर्यात को बढ़ाने की कोशिश की है. इसका उद्देश्य डिस्टिलरीज के लिए कारोबार को आसान बनाना और यूपी में बने उत्पादों को दूसरे राज्यों तथा विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाना है.

यहां से कहानी सिर्फ शराब की बिक्री की नहीं रह जाती. डिस्टिलरी में बढ़ता उत्पादन गन्ने और अनाज की मांग बढ़ाता है. इसके बाद बोतल, पैकेजिंग, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की जरूरत बढ़ती है. यानी शराब उद्योग के विस्तार का असर उससे जुड़े कई दूसरे कारोबारों तक पहुंचता है.

ग्लोबल मार्केट पर नजर

उत्तर प्रदेश का शराब निर्यात बढ़ा है लेकिन आगे की राह आसान नहीं है. महाराष्ट्र लंबे समय से शराब निर्यात में सबसे आगे है. उसके पास कई बड़े बंदरगाहों तक आसान पहुंच है, जिससे विदेशी बाजारों में उत्पाद भेजने में उसे स्वाभाविक बढ़त मिलती है. पंजाब भी शराब निर्यात के मामले में लंबे समय से दूसरे स्थान पर बना हुआ है.

अब यूपी पहली बार तीसरे स्थान पर पहुंचकर इन दोनों राज्यों को चुनौती दे रहा है. यूपी की चुनौती इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि समुद्री बंदरगाहों की सीधी सुविधा न होने के बावजूद उसने निर्यात में इतनी तेज बढ़ोतरी दर्ज की है.

राज्य के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह केवल शुल्क और नीति में राहत के दम पर अपनी हिस्सेदारी बढ़ा पाएगा या फिर अपने ब्रांड को अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिला सकेगा. यही वह जगह है जहां गुणवत्ता और ब्रांडिंग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है.

विनोद गिरी का कहना है कि भारत का वैश्विक शराब कारोबार में हिस्सा अभी एक फीसदी से भी कम है. इसका मतलब है कि भारतीय शराब के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी संभावनाएं मौजूद हैं. अगर भारतीय कंपनियां गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार करती हैं और उन्हें सही ब्रांडिंग के साथ विदेशी बाजार में उतारा जाता है तो कारोबार को कई गुना बढ़ाया जा सकता है.

उत्तर प्रदेश सरकार भी अब सिर्फ पारंपरिक शराब उत्पादों पर निर्भर नहीं रहना चाहती. नई आबकारी निर्यात नीति में राज्य में फलों से तैयार होने वाली वाइन को विदेशी बाजार में उपलब्ध कराने की संभावना पर भी जोर दिया गया है.

यूपी में फलों का बड़ा उत्पादन होता है. ऐसे में आम, अमरूद, लीची और दूसरे फलों से तैयार वाइन के लिए नया बाजार तैयार किया जा सकता है. इससे स्थानीय कृषि उत्पादों को अतिरिक्त मूल्य मिलने के साथ किसानों की आय बढ़ाने का रास्ता भी खुल सकता है.

अगर यूपी इन मोर्चों पर सफल रहा तो आने वाले वर्षों में ‘मेड इन यूपी’ शराब की पहचान सिर्फ देश के बाजार तक सीमित नहीं रहेगी. राज्य की डिस्टिलरीज किसानों से लेकर पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स उद्योग तक एक बड़ी आर्थिक श्रृंखला को गति दे सकती हैं.

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