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लखनऊ में मानसून कैसे बन गया ‘हीट स्ट्रेस’ का नया सीजन?

लखनऊ में बढ़ती गर्मी और उमस का मेल मानसून के महीनों में भी ‘हीट स्ट्रेस’ बढ़ा रहा है. आने वाले वर्षों में इसका असर गर्मी से होने वाली मौतों में बढ़ोतरी के साथ अर्थव्यवस्था और उत्पादकता पर भी पड़ सकता है

When sweating stops working: The science behind wet-bulb temperature and why it matters now
हीट स्ट्रेस स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या बन सकता है (फोटो : AI)
अपडेटेड 27 अगस्त , 2026

लखनऊ में मानसून अब सिर्फ बारिश, बादलों और राहत का मौसम नहीं रह गया है. बदलते मौसम के साथ बारिश के महीनों में गर्मी और उमस का ऐसा मेल सामने आ रहा है, जो शहर के लिए नया ‘हीट स्ट्रेस’ पैदा कर रहा है. 

तापमान बहुत ज्यादा न होने के बावजूद वातावरण में मौजूद नमी शरीर की प्राकृतिक कूलिंग व्यवस्था को कमजोर कर देती है. पसीना निकलता है, लेकिन जल्दी सूखता नहीं. 

नतीजा यह होता है कि शरीर को जरूरी ठंडक नहीं मिलती और गर्मी का असर लगातार बढ़ता जाता है. यही स्थिति हीट स्ट्रेस कहलाती है.

सिंधु-गंगा के मैदानों के बीच बसा लखनऊ इस बदलाव के लिहाज से खास तौर पर संवेदनशील है. यहां बढ़ती नमी के साथ घनी आबादी, तेजी से फैलता शहरी क्षेत्र, घटती हरियाली और कंक्रीट का बढ़ता विस्तार गर्मी को और बढ़ा रहे हैं. 

अब गर्मी को सिर्फ थर्मामीटर पर दर्ज तापमान से समझना पर्याप्त नहीं है. हीट इंडेक्स, वेट बल्ब टेंपरेचर और वेट बल्ब ग्लोब टेंपरेचर जैसे इंडिकेटर यह बताते हैं कि तापमान और नमी मिलकर मानव शरीर पर कितना दबाव डाल रहे हैं. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि लखनऊ में इस मौसमी मार का सबसे बड़ा हिस्सा मानसून के महीनों में सामने आया है.

भौगोलिक स्थितियां लखनऊ को हीट स्ट्रेस के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील बनाती हैं
भौगोलिक स्थितियां लखनऊ को हीट स्ट्रेस के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील बनाती हैं

मानसून में 257 दिन गर्मी और उमस

काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के 2015 से 2024 के बीच मौसम संबंधी दैनिक आंकड़ों के आकलन के मुताबिक लखनऊ में दस वर्षों के दौरान 289 ऐसे दिन दर्ज किए गए जब अधिकतम तापमान कम से कम 35 डिग्री सेल्सियस और उमस 60 फीसदी या उससे ज्यादा रही. 

यानी करीब एक साल के बराबर दिन शहर ने ऐसे मौसम में बिताए, जिसमें गर्मी और नमी ने मिलकर शरीर पर अतिरिक्त दबाव डाला. इन आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका मानसून से संबंध है. 289 में से 257 उमस भरे दिन जून से सितंबर के बीच दर्ज किए गए. 

यानी लखनऊ में गर्मी और उमस से पैदा होने वाले ‘कंपाउंड हीट एक्सपोजर’ का करीब 89 फीसदी हिस्सा उन्हीं महीनों में सामने आया, जिन्हें आमतौर पर बारिश और राहत का मौसम माना जाता है. 

यही वजह है कि मानसून अब लखनऊ के लिए सिर्फ बारिश का मौसम नहीं रह गया है. बारिश के साथ हवा में नमी बढ़ती है और अगर तापमान भी ऊंचा बना रहे तो शरीर के लिए खुद को ठंडा करना मुश्किल हो जाता है. यही स्थिति थर्मल स्ट्रेस को जन्म देती है. 

पिछले दशक में इस समस्या की तीव्रता भी बढ़ी है. 2015 से 2019 के बीच लखनऊ में गर्मी और उमस वाले 123 दिन दर्ज हुए थे. यानी सालाना औसत 24.6 दिन. इसके मुकाबले 2020 से 2024 के बीच ऐसे दिनों की संख्या बढ़कर 166 हो गई. 

पांच वर्षों के इन दोनों दौर की तुलना करें तो गर्मी और उमस वाले दिनों में करीब 35 फीसदी की वृद्धि हुई. इस अवधि में सालाना औसत भी बढ़कर 33.2 दिन हो गया. साल 2020 में अकेले 45 दिन ऐसे रहे जब तापमान और उमस दोनों ने मिलकर भीषण गर्मी का असर पैदा किया.

यह बदलाव मौसम के चरित्र में आ रहे परिवर्तन का संकेत है. गर्मी के मौसम में अधिक तापमान स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है लेकिन मानसून में अपेक्षाकृत कम तापमान के साथ ज्यादा नमी कई बार उतना ही खतरनाक साबित हो सकती है. 

मॉनसून में कम तापमान के बावजूद उमस भरा मौसम खतरनाक साबित हो सकता है (सांकेतिक तस्वीर))
मॉनसून में कम तापमान के बावजूद उमस भरा मौसम खतरनाक साबित हो सकता है (सांकेतिक तस्वीर))

शरीर से निकलने वाला पसीना अगर हवा में मौजूद नमी की वजह से वाष्पीकृत नहीं होता तो शरीर की प्राकृतिक ठंडक व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है. इसका असर खासतौर पर लंबे समय तक बाहर रहने वाले लोगों पर पड़ता है. दिहाड़ी मजदूर, निर्माण श्रमिक, रेहड़ी-पटरी वाले, कृषि कामगार और गिग वर्कर ऐसे मौसम में भी काम करने के लिए मजबूर होते हैं. 

बुजुर्गों, बच्चों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए भी यह अतिरिक्त जोखिम पैदा करता है.

बारिश के बावजूद राहत नहीं

मानसून के दौरान बढ़ते थर्मल स्ट्रेस की एक बड़ी वजह सिर्फ दिन की गर्मी नहीं है. लखनऊ की रातें भी गर्म हो रही हैं. यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रात शरीर को दिनभर की गर्मी से उबरने का समय देती है. अगर रात का तापमान भी ऊंचा रहे तो शरीर की रिकवरी प्रभावित होती है. 

लखनऊ में 1981 से 2000 के बीच रात का औसत तापमान 18.92 डिग्री सेल्सियस था. 2001 से 2024 के बीच यह बढ़कर 19.35 डिग्री सेल्सियस हो गया. यानी रात के औसत तापमान में 0.43 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है. गर्म रातों का सिलसिला भी लगातार बना हुआ है.

2024 में लखनऊ में 126 गर्म रातें रिकॉर्ड की गईं. 2015 में ऐसी रातों की संख्या 124 और 2016 में 128 थी. वर्ष 2018 में भी, जब इनकी संख्या अपेक्षाकृत कम रही, 93 गर्म रातें दर्ज हुईं. इसका मतलब है कि गर्मी अब केवल दिन की समस्या नहीं है. 

दिन में बढ़ता तापमान और उमस शरीर पर दबाव डालते हैं और रात में ऊंचा तापमान शरीर को उससे उबरने का पर्याप्त अवसर नहीं देता. अगर यह स्थिति लगातार कई दिनों तक बनी रहे तो गर्मी का असर शरीर में जमा होता जाता है.

भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ने के साथ खासकर सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में नमी के स्तर में भी इजाफा हुआ है. लखनऊ कम ऊंचाई और बेसिन जैसी भौगोलिक स्थिति में बसा है. 

हवा के ठहराव के कारण यहां नमी बनी रहती है और इससे उमस भरी गर्मी का असर बढ़ता है. उनके मुताबिक इसका स्वास्थ्य पर खास असर पड़ सकता है. सांस और गर्मी से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है और घनी आबादी वाले शहर में बड़ी संख्या में लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं. 

वरिष्ठ स्वास्थ्य सलाहकार डॉ. नायरा शकील बताती हैं, “जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए खास चिंता पैदा कर रही है. गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक गर्मी से समय से पहले प्रसव, कम वजन वाले बच्चे, जेस्टेशनल हाइपरटेंशन और प्री-एक्लेम्पसिया का खतरा बढ़ सकता है. अत्यधिक डिहाइड्रेशन और गर्मी का तनाव जेस्टेशनल डायबिटीज जैसी समस्याओं को भी प्रभावित कर सकता है.” 

कंक्रीट का विस्तार बना ‘हीट ट्रैप’

पिछले दो दशकों में राजधानी का विस्तार तेजी से हुआ है. नई आवासीय कॉलोनियां, व्यावसायिक इमारतें, सड़कें और परिवहन ढांचा लगातार बढ़ा है. इसके साथ ही कई इलाकों में हरित और खुली जमीन कंक्रीट में बदल गई. यह बदलाव अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट को बढ़ाता है. 

लखनऊ शहर के तेजी से हो रहे विस्तार से हालात और खराब हुए हैं (सांकेतिक फोटो)
लखनऊ शहर के तेजी से हो रहे विस्तार से हालात और खराब हुए हैं (सांकेतिक फोटो)

कंक्रीट और डामर दिन में सूर्य की गर्मी सोखते हैं और रात में उसे धीरे-धीरे छोड़ते हैं. नतीजा यह होता है कि शहर आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक गर्म बना रहता है. लखनऊ में रात का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों के मुकाबले करीब पांच डिग्री सेल्सियस अधिक रहता है. 

मानसून के दौरान जब हवा में पहले से ही नमी अधिक होती है तब शहरी गर्मी और उमस का यह मेल थर्मल स्ट्रेस को और बढ़ा सकता है. पेड़ों और खुली जमीन की कमी से प्राकृतिक वाष्पीकरण आधारित ठंडक घटती है. घनी आबादी वाले इलाकों में हवा का प्रवाह बाधित होता है. 

गर्मी और नमी स्थानीय स्तर पर फंस सकती है. सड़कें और इमारतें दिन में जमा की गई गर्मी रात तक छोड़ती रहती हैं. एयर कंडीशनर का बढ़ता इस्तेमाल भी इस चक्र को मजबूत कर सकता है. घरों और दफ्तरों के भीतर लोगों को राहत मिलती है लेकिन बाहर निकलने वाली गर्मी स्थानीय वातावरण में अतिरिक्त ऊष्मा जोड़ती है. 

इस तरह एक ऐसा चक्र बनता है जिसमें शहर का बाहरी वातावरण और गर्म होता जाता है. मानसून में इस समस्या का एक अलग पहलू भी है. बारिश के बाद वातावरण में नमी बढ़ जाती है. अगर उसी दौरान तापमान ऊंचा रहता है तो हवा में मौजूद नमी पसीने के वाष्पीकरण को रोकती है. वहीं बादल और बारिश के बावजूद कंक्रीट से जमा गर्मी बनी रह सकती है. 

2050 तक बढ़ सकती हैं गर्मी से मौतें

लखनऊ में बढ़ते थर्मल स्ट्रेस का सबसे गंभीर परिणाम स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है. उपलब्ध आकलन के मुताबिक लखनऊ में अधिक गर्मी से होने वाली सालाना अतिरिक्त मौतों की दर प्रति हजार लोगों पर 0.2 से 0.4 के बीच है. अंदरूनी और निचले इलाकों में बसे शहरों में गर्मी से होने वाली मृत्यु दर तटीय शहरों की तुलना में अधिक हो सकती है. 

इसकी एक वजह रात में समुद्र से मिलने वाली प्राकृतिक ठंडक का अभाव और मजबूत अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव है. भविष्य के अनुमानों में तस्वीर और गंभीर दिखाई देती है. अधिक उत्सर्जन वाली परिस्थितियों में 2050 तक लखनऊ में सभी आयु वर्गों में गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों में करीब 50 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है. 

प्रति हजार आबादी पर गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों की दर 0.6 तक पहुंच सकती है. शहर के संभावित नगरीय विस्तार और आबादी को ध्यान में रखें तो गर्मी से हर साल करीब 4,000 लोगों की मौत का अनुमान सामने आता है. सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर होगा जिनकी आजीविका खुले वातावरण में काम करने पर निर्भर है. 

गर्मी बढ़ने पर काम के घंटे घटेंगे, उत्पादकता कम होगी और आय पर असर पड़ेगा. दूसरी ओर स्वास्थ्य पर होने वाला अतिरिक्त खर्च परिवारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ाएगा. इसलिए लखनऊ के लिए मानसून में बढ़ता थर्मल स्ट्रेस महज मौसम का बदलाव नहीं है. यह स्वास्थ्य, रोजगार, उत्पादकता और शहरी नियोजन से जुड़ी चुनौती है. शहर को गर्मी से निपटने की रणनीति में मानसून को भी शामिल करना होगा. 

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