scorecardresearch
डार्क मोड

देश के 'सबसे आधुनिक एक्सप्रेसवे' लखनऊ-कानपुर कॉरिडोर पर क्यों उठ रहे सवाल?

13 जुलाई को जिस एक्सप्रेसवे को देश की सबसे आधुनिक सड़क परियोजनाओं में गिना गया था, उसी पर उद्घाटन के तीन हफ्ते के भीतर तीन जगह सड़क दबने लगी है

kanpur lucknow elevated expressway
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उद्घाटन हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ है
अपडेटेड 3 अगस्त , 2026

रविवार की दोपहर. उन्नाव के सदर तहसील क्षेत्र में जगेथा गांव के सामने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर तेज रफ्तार से दौड़ते ट्रकों की कतार लगातार आगे बढ़ रही है. स्पीड 90 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा के बीच है. लेकिन किलोमीटर संख्या 48.5 से 48.9 के बीच पहुंचते ही कई ट्रकों के अगले पहिए अचानक उछलते हैं. सड़क की तीसरी लेन में करीब 400 मीटर तक जगह-जगह हल्की नालियां बन चुकी हैं. डामर नीचे बैठ गया है और सतह समतल नहीं रह गई है. 

कुछ दूरी पर निर्माण एजेंसी पीएनसी के कर्मचारी गिट्टी, सीमेंट और अन्य निर्माण सामग्री उतार रहे हैं. अगले दिन मरम्मत शुरू होनी है. इस एक्सप्रेसवे का महज 21 दिन पहले केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने उद्घाटन किया था. इसे देश की सबसे आधुनिक सड़क परियोजनाओं में गिना गया. दावा किया गया कि अमेरिका और जर्मनी के बाद पहली बार भारत में ऑटोमेटेड इंटेलिजेंस मशीन गाइडेड कंस्ट्रक्शन (AIMGC) तकनीक से सड़क बनाई गई है. 

दावा था कि इससे सड़क की गुणवत्ता और समतलता पहले से कहीं बेहतर होगी. लेकिन उद्घाटन के तीन सप्ताह के भीतर तीन अलग-अलग स्थानों पर सड़क दबने की घटनाओं ने इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

तीन हफ्ते... तीन जगह सड़क दबी, सवाल बढ़ते गए

13 जुलाई को 4,200 करोड़ रुपए की लागत से बने 63 किलोमीटर लंबे लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उद्घाटन हुआ था. इसका उद्देश्य दोनों शहरों के बीच यात्रा समय को करीब 90 मिनट से घटाकर 35 से 40 मिनट करना था. हल्के वाहनों के लिए 120 किलोमीटर और भारी वाहनों के लिए 100 किलोमीटर प्रति घंटा की अधिकतम गति निर्धारित की गई. लेकिन उद्घाटन के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला.

सबसे पहले 25 जुलाई को उन्नाव के कोरारी गांव के पास सड़क धंसने की सूचना सामने आई. इसके बाद 29 जुलाई को बेगमखेड़ा गांव के सामने करीब दस मीटर सड़क बैठ गई. मरम्मत में करीब 36 घंटे लगे, लेकिन पैचवर्क के बाद भी सड़क पूरी तरह समतल नहीं हो सकी. गाड़ियों में अभी-भी झटके लगते हैं.

इसके बाद 1 अगस्त को असोहा ब्लॉक के तूरी गांव के सामने लगभग 20 मीटर हिस्से में सड़क दब गई. भारी वाहनों के गुजरने से वहां नाली जैसी आकृति बनने लगी और पहिए उछलने लगे. अधिकारियों ने निरीक्षण किया लेकिन तत्काल मरम्मत शुरू नहीं हुई.

2 अगस्त को जगेथा गांव के सामने तीसरी बार सड़क दबने की घटना सामने आई. इस बार दायरा पहले से कहीं बड़ा था. करीब 400 मीटर तक तीसरी लेन में कई स्थानों पर सड़क बैठने लगी. हाईस्पीड कॉरिडोर पर यह स्थिति स्वाभाविक रूप से सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाने वाली थी. लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या समस्या केवल सड़क की ऊपरी परत तक सीमित है या फिर निर्माण की मूल प्रक्रिया में कहीं गंभीर चूक हुई है.

तकनीक पर नहीं, निर्माण की बुनियाद पर उठ रहे सवाल

इस एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्माण तकनीक बताई गई थी. भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने दावा किया कि सड़क निर्माण में पहली बार AIMGC तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे सड़क की सतह अत्यंत सटीक और समान बनी है.

इस बारे में असिस्टेंट इंजीनियर रहे एस. के. दीक्ष‍ित का कहना है कि आधुनिक मशीनें केवल सड़क की सतह को बेहतर बना सकती हैं. सड़क की असली मजबूती नीचे की परतों में होती है. उनके अनुसार किसी भी ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे की सफलता का आधार अर्थवर्क और कम्पैक्शन है. 

मिट्टी की हर 25 से 30 सेंटीमीटर मोटी परत को वैज्ञानिक तरीके से दबाया जाना चाहिए. अगर यह प्रक्रिया पूरी गुणवत्ता के साथ नहीं हुई तो पहली अच्छी बारिश के बाद मिट्टी बैठने लगती है और ऊपर बनी सड़क भी धंस जाती है. वे यह भी कहते हैं कि ड्रेनेज सिस्टम उतना ही महत्वपूर्ण है. अगर बारिश का पानी सड़क किनारे से तुरंत नहीं निकलता और सबग्रेड तक पहुंच जाता है तो मिट्टी कमजोर होने लगती है. नतीजतन सड़क की ऊपरी सतह दबने लगती है. 

उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम के पूर्व महाप्रबंधक संदीप गुप्ता भी इसी ओर संकेत करते हैं. उनके मुताबिक सड़क निर्माण में सबसे अधिक समझौता निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण पर होता है. कंपनियां कम बोली लगाकर प्रोजेक्ट हासिल करती हैं और बाद में लागत कम करने के लिए अनुभवी इंजीनियरों की जगह अपेक्षाकृत कम अनुभवी स्टाफ तैनात कर देती हैं.

कई बार काम का बड़ा हिस्सा सब-कॉन्ट्रैक्टर को सौंप दिया जाता है जिससे गुणवत्ता की जवाबदेही और कमजोर हो जाती है. विशेषज्ञों का कहना है कि AIMGC जैसी तकनीक कम्पैक्शन की गुणवत्ता की निगरानी नहीं करती. अगर आधार परत ही कमजोर होगी तो ऊपर की सबसे आधुनिक तकनीक भी सड़क को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रख सकती.

NHAI और निर्माण एजेंसी की क्या कह रहे

लगातार वायरल हो रहे वीडियो और राजनीतिक आरोपों के बीच NHAI और निर्माण एजेंसी पीएनसी ने नुकसान की गंभीरता को कम करके पेश किया है. NHAI का कहना है कि एक्सप्रेसवे कहीं भी संरचनात्मक रूप से धंसा नहीं है. उनके अनुसार केवल लगभग 40 मीटर हिस्से में बिटुमिनस वियरिंग कोर्स यानी सड़क की ऊपरी परत प्रभावित हुई थी. इसे ‘स्लिपेज’ बताया गया, जिसे छह घंटे के भीतर ठीक कर यातायात बहाल कर दिया गया.

NHAI के प्रोजेक्ट डायरेक्टर नकुल प्रकाश वर्मा का कहना है कि पहली घटना के बाद पूरे एक्सप्रेसवे का विस्तृत निरीक्षण कराया गया. उसके आधार पर एहतियाती मरम्मत और रखरखाव का काम चल रहा है. सोशल मीडिया पर वायरल कई वीडियो इसी नियमित मरम्मत कार्य के हैं, न कि किसी नए नुकसान के. 

अथॉरिटी का यह भी कहना है कि एक्सप्रेसवे 15 वर्ष के डिफेक्ट लाइबिलिटी पीरियड (DLP) के अंतर्गत आता है. इस अवधि में निर्माण एजेंसी को बिना किसी अतिरिक्त सरकारी खर्च के सभी दोष दूर करने होंगे. निर्माण एजेंसी पीएनसी के प्रोजेक्ट मैनेजर विजय एस. कुंडू का कहना है कि जहां-जहां सड़क दबी है वहां मरम्मत कराई गई है. अगर जांच में पाया गया कि नीचे की मिट्टी नमी के कारण गीली हो गई है तो उसे पूरी तरह निकालकर दोबारा कंक्रीट और सीमेंट से मजबूत किया जा रहा है.

उनके मुताबिक एक्सप्रेसवे फिलहाल पूरी तरह सुरक्षित है और लगातार पेट्रोलिंग की जा रही है. हालांकि दिलचस्प तथ्य यह है कि पहली घटना के बाद NHAI ने निगरानी से जुड़े दो स्वतंत्र इंजीनियरों और निर्माण कंपनी के एक अधिकारी को हटा दिया. इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि अथॉरिटी ने भी शुरुआती स्तर पर निगरानी में कमी की आशंका मानी है.
 
अब सड़क से ज्यादा राजनीति दौड़ रही है

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे अब केवल इंजीनियरिंग या सड़क निर्माण का विषय नहीं रह गया है. यह तेजी से राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है. समाजवादी पार्टी (सपा) ने सबसे पहले सड़क धंसने के वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए. इसके बाद पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नया वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, "चल कम रहा है, धंस ज्यादा रहा है." उन्होंने परियोजना की लागत पर सवाल उठाते हुए इसे सरकारी दावों और जमीनी हकीकत का अंतर बताया. 

सपा का आरोप है कि उद्घाटन के कुछ ही दिनों में बार-बार मरम्मत होना इस बात का प्रमाण है कि निर्माण गुणवत्ता में गंभीर कमी रही है. पार्टी इसे उत्तर प्रदेश सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल की विफलता बता रही है. कांग्रेस ने भी सरकार पर तीखा हमला बोला है. पार्टी का कहना है कि यह परियोजना भ्रष्टाचार और गुणवत्ता से समझौते का उदाहरण बन गई है. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि जनता के टैक्स के पैसे से बनी सड़कें अगर पहली बारिश भी नहीं झेल पा रहीं तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए. 

दूसरी ओर बीजेपी इसे विपक्ष की ‘भ्रामक राजनीति’ बता रहे हैं. पार्टी नेताओं का कहना है कि किसी भी बड़े एक्सप्रेसवे में शुरुआती अवधि के दौरान नियमित रखरखाव और प्रिवेंटिव मेंटेनेंस सामान्य प्रक्रिया होती है. वायरल वीडियो को संदर्भ से काटकर पेश किया जा रहा है. लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग सबसे बड़ा सवाल आम लोगों का है.

जिस एक्सप्रेसवे को देश की सबसे आधुनिक परियोजनाओं में गिनाया गया, जिस पर प्रति किलोमीटर करीब 57 करोड़ रुपए खर्च हुए और जिसे अत्याधुनिक तकनीक का प्रतीक बताया गया, वह उद्घाटन के तीन सप्ताह के भीतर लगातार मरम्मत की जरूरत क्यों महसूस कर रहा है? यही सवाल आज इस पूरे विवाद की असली धुरी बन चुका है. 

ADVERTISEMENT
Advertisement