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लखनऊ कैसे बना देश का सबसे साफ हवा वाला शहर?

इंदौर को एक अंक से पछाड़कर लखनऊ बना देश का सबसे साफ हवा वाला बड़ा शहर, इलेक्ट्रिक वाहन, धूल नियंत्रण, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन और हरियाली बढ़ाने के प्रयासों का मिला फायदा

Rumi Gate, Lucknow
लखनऊ का रूमी गेट
अपडेटेड 8 सितंबर , 2026

लखनऊ की पहचान लंबे समय से नवाबी तहजीब, चौड़ी सड़कों और तेजी से फैलते शहरी इलाके वाले शहर के रूप में रही है. लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस पहचान में एक नया अध्याय जुड़ा है. भारी ट्रैफिक, लगातार होते निर्माण कार्य और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच उत्तर प्रदेश की राजधानी ने देश के सबसे साफ हवा वाले बड़े शहर का खिताब अपने नाम कर लिया है. 

‘स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026’ में 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों की श्रेणी में लखनऊ ने 198 अंक हासिल कर पहला स्थान पाया. महज एक अंक के अंतर से उसने पिछले सात वर्षों से देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब हासिल करते आ रहे इंदौर को पीछे छोड़ा. इंदौर को 197 और जबलपुर को 195 अंक मिले. 

नई दिल्ली में घोषित इन नतीजों में 47 शहरों को शामिल किया गया था. इस श्रेणी में चेन्नई, जमशेदपुर, कोटा, कोलकाता और मदुरै सबसे निचले पांच स्थानों पर रहे. देश की राजधानी दिल्ली 30वें और मुंबई 37वें स्थान पर रही. पुरस्कार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव ने प्रदान किए. 

लखनऊ की इस कामयाबी को सिर्फ किसी एक योजना या एक उपाय का नतीजा नहीं माना जा सकता. नगर निगम अधिकारियों के मुताबिक, सड़क की धूल, वाहनों से निकलने वाला धुआं, खुले में कचरा जलाना और कचरा प्रबंधन जैसे प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों को एक साथ निशाना बनाया गया.

लखनऊ नगर निगम ने कचरा प्रबंधन से लेकर हर मोर्चे पर अच्छा काम किया है (सांकेतिक तस्वीर)
लखनऊ नगर निगम ने कचरा प्रबंधन से लेकर हर मोर्चे पर अच्छा काम किया है (सांकेतिक तस्वीर)

इलेक्ट्रिक वाहनों से कचरा उठाने से लेकर मशीनों से सड़कों की सफाई, सड़कों को पक्का करने, कचरे की वैज्ञानिक प्रोसेसिंग और शहर में हरियाली बढ़ाने तक कई स्तरों पर काम किया गया.

सड़क की धूल से इलेक्ट्रिक सफाई तक

लखनऊ की करीब 42 लाख की आबादी वाले शहर के लिए वायु प्रदूषण की सबसे बड़ी चुनौतियों में सड़क की धूल और वाहनों का उत्सर्जन रहे हैं. शहर के तेजी से विस्तार के साथ निर्माण कार्य बढ़े और सड़कों पर वाहनों का दबाव भी लगातार बढ़ता गया. 

ऐसे में नगर निगम ने पारंपरिक सफाई व्यवस्था के साथ मशीनों और इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल बढ़ाया. घर-घर कचरा उठाने के लिए करीब 1,100 इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसका दोहरा फायदा हुआ. एक तरफ कचरा नियमित रूप से घरों से उठाने की व्यवस्था मजबूत हुई, दूसरी तरफ नगर निगम के कचरा उठाने वाले वाहनों से होने वाला उत्सर्जन घटा. 

लखनऊ की मेयर सुषमा खरकवाल के मुताबिक, इस दिशा में अभी काम पूरा नहीं हुआ है वे कहती हैं, "जहां सड़क साफ करने वाले वाहनों ने धूल को नियंत्रित करने में मदद की है, वहीं हमारा 90 फीसदी डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण इलेक्ट्रिक वाहनों द्वारा किया जा रहा है. अगले छह महीनों में, हम घर-घर कचरा संग्रहण करने वाले शेष 10 फीसदी वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहनों से बदल देंगे. हमें विश्वास है कि इससे वायु गुणवत्ता में और सुधार होगा."

सार्वजनिक परिवहन में भी इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़ाई गई है. शहर में इस समय 140 इलेक्ट्रिक बसें चल रही हैं. इनके संचालन के लिए 916 चार्जिंग पॉइंट वाले 12 चार्जिंग स्टेशन तैयार किए गए हैं. यानी प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति केवल निजी वाहनों को इलेक्ट्रिक बनाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि सार्वजनिक परिवहन और नगर निगम की सेवाओं को भी इसमें शामिल किया गया. 

लखनऊ का छोटा इमामबाड़ा
लखनऊ का छोटा इमामबाड़ा

सड़क की धूल को नियंत्रित करने के लिए 97 इलेक्ट्रिक मशीनीकृत सफाई मशीनें तैनात की गई हैं. नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि नियमित मशीनरी से सफाई और सड़कों को पक्का करने से धूल के दोबारा हवा में जाने की समस्या को कम करने में मदद मिली. 

शहर में करीब 559.85 किलोमीटर सड़कों को पूरी तरह पक्का किया गया है. इससे खुली सतहों का क्षेत्र घटा और वाहनों के गुजरने से उड़ने वाली धूल को नियंत्रित करने में मदद मिली. सुषमा खर्कवाल के मुताबिक, "सड़क की धूल को दोबारा हवा में उड़ने से रोकने में पक्की सड़कें बनाने और नियमित रूप से मशीनों से सफाई करने का काम अहम रहा है."

कचरा नहीं जलेगा

शहरी हवा को खराब करने वाले स्रोतों में खुले में कचरा जलाना एक ऐसा कारण है जिसे अक्सर स्थानीय स्तर की समस्या माना जाता है, लेकिन इसका असर सीधे हवा की गुणवत्ता पर पड़ता है. लखनऊ में इस चुनौती से निपटने के लिए कचरे के संग्रहण से लेकर उसके वैज्ञानिक निस्तारण तक की व्यवस्था पर जोर दिया गया. 

नगर निगम के मुताबिक, शहर में अब म्युनिसिपल कचरे की 100 फीसदी वैज्ञानिक प्रोसेसिंग की व्यवस्था है. इसकी क्षमता 2,550 टन प्रतिदिन है. इसका उद्देश्य घरों से निकलने वाले कचरे को खुले प्लॉट, सड़क किनारे या दूसरी जगहों पर फेंकने और फिर उसे जलाने की स्थिति को खत्म करना है. 

वार्ड स्तर पर भी खुले में कचरा जलाने पर रोक लगाने की कोशिश की गई. अधिकारियों के मुताबिक, घरों से इकट्ठा होने वाला कचरा अगर नियमित रूप से उठे और वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस हो तो उसके खुले में जलने की संभावना कम होती है. इससे धुआं और बारीक कण सीधे वातावरण में जाने से रोके जा सकते हैं.

लखनऊ की वायु गुणवत्ता सुधारने की रणनीति में यही छोटे-छोटे कदम अहम माने जा रहे हैं. इस मॉडल में शहर की सफाई को सिर्फ सौंदर्यीकरण की कवायद न मानकर प्रदूषण नियंत्रण से जोड़ा गया. यानी सड़क पर कचरा न दिखे, यह लक्ष्य जरूर था, लेकिन उसके पीछे दूसरा लक्ष्य हवा में धुएं और पार्टिकुलेट मैटर की मात्रा को कम करना भी था.

ला मार्टिनियर कॉलेज लखनऊ
ला मार्टिनियर कॉलेज लखनऊ

इसी तरह वाहनों के उत्सर्जन को कम करने के लिए इलेक्ट्रिक बसों और इलेक्ट्रिक कचरा वाहनों को बढ़ावा दिया गया. शहर के कुल वायु प्रदूषण में अलग-अलग स्रोतों की हिस्सेदारी अलग हो सकती है, लेकिन सर्वेक्षण में नगर निकाय के प्रयासों को कई मानकों पर परखा गया. यही वजह है कि लखनऊ की उपलब्धि किसी एक प्रदूषण स्रोत पर निर्भर नहीं रही.

मियावाकी मॉडल

लखनऊ जैसे तेजी से फैलते महानगर में हरियाली बढ़ाना आसान नहीं है. जमीन की उपलब्धता सीमित है और शहरी विस्तार के साथ खाली स्थान लगातार कम होते जा रहे हैं. ऐसे में नगर निगम ने पारंपरिक बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के साथ मियावाकी पद्धति और वर्टिकल गार्डन को भी शहर की स्वच्छ हवा की रणनीति में शामिल किया. 

वर्टिकल गार्डन यानी ऐसी जगहों पर दीवारों के सहारे पौधे लगाना जहां जमीन पर बड़ा हरित क्षेत्र विकसित करना मुश्किल हो. इसी तरह मियावाकी पद्धति में सीमित जगह में घना पौधरोपण किया जाता है. अधिकारियों के मुताबिक, इन प्रयासों का मकसद सिर्फ शहर को सुंदर बनाना नहीं था, बल्कि शहरी क्षेत्र में हरित आवरण बढ़ाना भी था.

तेजी से बढ़ते लखनऊ में यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शहर का विस्तार सड़क, आवासीय क्षेत्रों और व्यावसायिक गतिविधियों के साथ हो रहा है. ऐसे में जहां बड़े पार्क या बड़े वृक्षारोपण क्षेत्र विकसित करना संभव नहीं है, वहां छोटे लेकिन घने हरित क्षेत्रों को विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. 

हालांकि केवल हरियाली के आधार पर लखनऊ को पहला स्थान नहीं मिला. सर्वेक्षण में कई दूसरे मानकों को भी शामिल किया गया. इनमें कचरा प्रबंधन, सड़क की धूल पर नियंत्रण, निर्माण और विध्वंस से निकलने वाले कचरे से होने वाले धूल प्रदूषण का प्रबंधन, वाहन प्रदूषण में कमी और औद्योगिक प्रदूषण में कमी जैसे मानक शामिल हैं. 

यानी लखनऊ की रणनीति में एक तरफ इलेक्ट्रिक वाहन हैं तो दूसरी तरफ कचरा प्रबंधन, सड़क की सफाई और हरित क्षेत्र. यही मिश्रित रणनीति शहर की रैंकिंग में सबसे अहम पहलू बनकर सामने आई.

अब असली परीक्षा

लखनऊ की उपलब्धि का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वायु गुणवत्ता सुधार की कवायद को शहर के बड़े स्तर से वार्ड स्तर तक ले जाने की कोशिश की गई. पहली बार वायु गुणवत्ता में सुधार करने वाले नगर निगम के वार्डों को भी सम्मानित किया गया. लखनऊ के जोन-4 में आने वाला वार्ड-70 30 हजार से अधिक आबादी वाले शहरी वार्डों की श्रेणी में राष्ट्रीय स्तर पर नंबर एक रहा. 

इससे यह संकेत मिलता है कि शहर की वायु गुणवत्ता केवल बड़े प्रोजेक्टों से नहीं सुधरती. स्थानीय स्तर पर कचरा जलने से रोकना, सड़क और आसपास के हिस्सों को धूल मुक्त रखना तथा कचरे का ढेर नहीं लगने देना भी हवा की गुणवत्ता सुधारने में भूमिका निभा सकता है.

लखनऊ के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह उपलब्धि बरकरार रखना है क्योंकि ‘सबसे साफ हवा वाला शहर’ का खिताब और राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं. नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम यानी NCAP के पोर्टल के मुताबिक, लखनऊ अभी भी PM10 कणों के लिए निर्धारित राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर को हासिल नहीं कर पाया है. फिर भी पिछले कुछ वर्षों में बदलाव जरूर हुआ है.

NCAP के आंकड़ों के अनुसार, कार्यक्रम शुरू होने से पहले 2017-18 में लखनऊ की वार्षिक PM10 सांद्रता 250 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर थी, जो घटकर 137 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गई है. यानी इसमें करीब 45.2 फीसदी की कमी दर्ज की गई है. 

यहीं लखनऊ की मौजूदा उपलब्धि का सबसे बड़ा विरोधाभास भी सामने आता है. सर्वेक्षण में शहर ने 47 बड़े शहरों को पीछे छोड़कर पहला स्थान हासिल कर लिया, लेकिन PM10 का स्तर अभी भी राष्ट्रीय मानक से दोगुने से ज्यादा है. इसका मतलब साफ है कि रैंकिंग में सुधार हुआ है, लेकिन प्रदूषण की समस्या खत्म नहीं हुई है.

स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में PM10 की सांद्रता में कमी को कुल मूल्यांकन में सिर्फ 2.5 फीसदी भार दिया गया है. बाकी मूल्यांकन में नगर निकाय के उन प्रयासों को महत्व दिया गया है जो प्रदूषण के स्रोतों को नियंत्रित करने में मदद करते हैं. शहरों को आबादी के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है: 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहर, 3 से 10 लाख आबादी वाले शहर और 3 लाख से कम आबादी वाले शहर.

इस लिहाज से लखनऊ की 198 अंकों की जीत एक उपलब्धि जरूर है, लेकिन इसे अंतिम मंजिल मानना जल्दबाजी होगी. इंदौर से सिर्फ एक अंक आगे रहकर मिली यह जीत बताती है कि बड़े शहरों के बीच मुकाबला बेहद करीबी है. वहीं PM10 के आंकड़े बताते हैं कि हवा को वास्तव में साफ बनाने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है.

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